The Mysterious Bell827 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 827

7 min read November 5, 2026

उन्होंने वो तस्वीर — भारद्वाज साइकिल मरम्मत के बोर्ड वाली — मेरी तरफ़ नहीं बढ़ाई।

वो उसे पलट गए।

मैंने देखा। उसकी पीठ पर भी एक और तस्वीर चिपकी थी। पुराने गोंद से। दोनों तस्वीरें जुड़ी हुई थीं — जैसे कोई चीज़ बंद करके रखी हो अंदर।

ज़ुबैर चाचा उसे देखने लगे, जैसे बरसों बाद कोई पुरानी साँप खोल रहा हो।

“उस दिन से…” उन्होंने धीरे से कहा। “उस दिन से मैं ये तस्वीर नहीं देख पाया। हर बार मैं सोचता — काश मैंने उस दिन अपने हाथ नहीं उठाए होते। काश वो मेरे पास नहीं आया होता।”

“कौन सा दिन, चाचा?” मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ पहले से धीमी थी।

ज़ुबैर चाचा ने वो तस्वीर मेरी तरफ़ बढ़ाई।

मैंने देखा।

रात थी। काली। भारी धुआँ। पीछे बिजलीघर था — वो पुराना बिजलीघर, जो आज बंद पड़ा है। उसकी दीवार के टुकड़े गिरे थे। आग बुझ रही थी, पर कुछ लकड़ियाँ अब भी दहक रही थीं। और उसी सामने — घुटनों के बल बैठा एक लड़का। रणवीर।

उसका कुर्ता फटा था। हाथ पर कुछ जला था। और उसकी हथेली में एक चीज़ चमक रही थी। कोई चीज़, छोटी, पीतल की — जो उस राख और अंधेरे में भी रोशनी दे रही थी।

और उसके ठीक पीछे।

सफ़ेद कुर्ता। सफ़ेद जूते। बिना चेहरा।

बस एक आदमी खड़ा था। सिद्धा। हाथ नीचे। कोई हरकत नहीं।

मेरी रीढ़ में ठंड उतरी।

“ये…” मैंने शुरू किया।

“ये वो रात है,” ज़ुबैर चाचा ने कहा। “जब वो बिजलीघर से बाहर आया। जला हुआ ताबीज़ हाथ में था। उसके हाथ की दो उँगलियाँ जल गई थीं। उसने मुझे बुलाया। मैं वहीं रहता था — उस गली में, थोड़ी दूर। मैं आया।”

वो रुके। साँस भरी।

“मैंने पूछा — ये क्या हुआ? उसने कहा कुछ नहीं। बस मुझे उस ताबीज़ से रोशनी दिखाई, और अपनी हथेली पर जले हुए हिस्से पर अँगुली रखी — जैसे दर्द पर से किसी और का हाथ फेर रहा हो।”

“फिर?” मीरा ने पूछा।

“फिर मैंने कहा — रणवीर, मैं तेरी तस्वीर लूँ? उसने मुस्कुराया। मुस्कुराया नहीं — जैसे हँसी उसके चेहरे पर नई चीज़ थी, वो पहली बार पहन रहा था।”

ज़ुबैर चाचा ने उस तस्वीर को अपने हाथ में उठाकर देखा।

“मैंने कैमरा निकाला। तस्वीर ली। उस रात के बाद मैंने वो नेगेटिव अपने पास रखा — बाक़ी सब तस्वीरें मैंने बाद में जला दीं। पर वो एक रात मेरे सामने घुटनों पर बैठी रही। और उसके पीछे वो खड़ा रहा। नाम नहीं पूछा उसने। मैंने भी नहीं पूछा। मैं डर गया था।”

मैंने तस्वीर को करीब से देखा। वो आदमी — सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद जूते — बस खड़ा था।

ज़ुबैर चाचा ने अपनी आवाज़ धीमी कर दी। लगभग फुसफुसाते हुए।

“उस रात वो बिजलीघर से जला हुआ ताबीज़ लेकर आया था। और उसके पीछे यह सफ़ेद कुर्ते वाला खड़ा था।”

वो रुके।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बरसों से दबी हुई थी — डर, पर उससे भी बड़ा कुछ और। एक सवाल।

“और अंकुश,” उन्होंने कहा, “ये आदमी — ये आज भी उतना ही बूढ़ा दिखता है जितना बीस साल पहले दिखता था।”

मैंने तस्वीर को देखा।

सफ़ेद कुर्ता। बिना चेहरा।

मेरा हाथ अपनी जेब में गया। घंटी वहाँ थी। ठंडी, चुप।

मैंने उसे पकड़ा।

और मुझे लगा — बहुत हल्का सा — कि उसके भीतर कहीं गहरे, जहाँ अभी तक कुछ नहीं था, एक तार सा खिंचा।

ज़ुबैर चाचा ने तस्वीर को अपने सीने से लगाया। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

“मैं तुम्हारे साथ चलूँगा,” उन्होंने कहा। “बीस साल से मैं इस तस्वीर को लेकर अकेला हूँ। अब मैं इसे अकेला नहीं रखूँगा।”

मीरा ने अपना कैमरा उठाया।

और मैंने मोटरसाइकिल की तरफ़ देखा।

समय बहुत कम था। बारह बजे से पहले सीढ़ी पर पहुँचना था। कल सुबह सात बजे मशीन। और कल सुबह दस बजे वकील के दफ़्तर में वो नक़्शा।

मेरी जेब में घंटी थी — ठंडी, चुप।

पर मैंने उसे दोबारा पकड़ा, और इस बार मुझे लगा कि वो एक इंच भी मेरे साथ चल रही है।

“चलिए, चाचा,” मैंने कहा। “रास्ते में बताइए — उस सफ़ेद कुर्ते वाले ने उस रात कुछ कहा था?”

ज़ुबैर चाचा ने अपना कैमरा उठाया।

“कहा था,” उन्होंने कहा। “उसने रणवीर से एक ही बात कही थी — अब तू मेरा है।”

हवा चल रही थी। बस अड्डे की बत्तियाँ पीली थीं। और मैं, मीरा और ज़ुबैर चाचा — तीन लोग, एक मोटरसाइकिल, एक पुरानी तस्वीर।

और गुमटी की तरफ़ जाते हुए मुझे लगा कि गली में जो सबसे बड़ी चीज़ होने वाली है — वो किसी काग़ज़ में नहीं, किसी मोहर में नहीं, किसी तारीख़ में नहीं — वो इस पुरानी तस्वीर में है।

और मैंने अपनी जेब में हाथ डालकर घंटी को थोड़ा और कसकर पकड़ा।

आज रात हिसाब बराबर होगा। कम से कम एक हिसाब तो।

॥

मोटरसाइकिल की सीट पर ज़ुबैर चाचा बीच में बैठे थे, और मैं समझ गया था कि यह इंतज़ाम ग़लत है। चाचा की गोद में कैमरा, चाचा के सीने से चिपकी वो पुरानी तस्वीर कपड़े में लिपटी, और चाचा के पीछे मीरा अपना कैमरा ऊपर उठाए हुए, जैसे कोई तीरंदाज़ चलती गाड़ी पर निशाना ले रहा हो।

“चाचा, आप ज़रा दाईं तरफ़ झुक जाइए,” मैंने कहा। “गाड़ी को मोड़ना है।”

“मैं तो पहले से झुका हुआ हूँ, बेटा,” चाचा ने कहा। “मेरी तो पूरी ज़िंदगी ही झुकी हुई है।”

मीरा पीछे से हँस पड़ी।

बस अड्डे की पीली बत्तियाँ पीछे छूट रही थीं। सड़क खाली थी। ठंडी हवा में पुराने बाज़ार की गंध आ रही थी — तेल, धूल, और कहीं से जलती लकड़ी की।

मैंने गाड़ी थोड़ी धीमी की और जेब में हाथ डाला।

घंटी वहाँ थी। ठंडी। चुप। जैसे कोई बच्चा बुखार के बाद सो गया हो — साँस चल रही है, पर आवाज़ नहीं।

मुझे आदत नहीं थी। इतने दिनों में मैं इसका उल्टा आदी हो गया था — जैसे कोई रोज़ सुबह आकर तुम्हारे कान में दो बातें कह जाए और एक दिन न आए, तो तुम्हें भूख लगती रहती है, और तुम्हें पता भी नहीं होता कि भूख किस चीज़ की है।

“अंकुश,” मीरा ने कहा, “गली का मोड़ आ गया।”

मैंने गाड़ी मोड़ी।

और गली में घुसते ही मुझे लगा कि आज गली ने अपनी साँस रोक ली है।

पीपल के नीचे इतने लोग खड़े थे कि चबूतरी दिख ही नहीं रही थी। कोई बोल नहीं रहा था। एक भी आवाज़ नहीं। सिर्फ़ पीपल के पत्तों की खड़खड़ाहट और किसी के हाथ में जलती मोमबत्ती की हल्की फड़फड़ाहट।

मैंने गाड़ी रोकी। ज़ुबैर चाचा उतरे — पहले एक पैर, फिर दूसरा, जैसे किसी पुराने जहाज़ से किनारे पर उतर रहे हों। उन्होंने अपने सीने से वो कपड़े में लिपटी तस्वीर निकाली और दोनों हाथों से पकड़कर सामने रख ली।

उस्ताद अली बक्श आगे आए। उनके हाथ में कैंची थी — वही जो सुबह से उनके हाथ में थी और दुकान में होनी चाहिए थी। याकूब उनके पीछे थे, लाठी के सहारे, और उनकी हथेली पर वो पतली लाल लकीर अब भी उतनी ही ताज़ा लग रही थी जितनी दोपहर में लगी थी।

“लाओ,” उस्ताद ने कहा। सिर्फ़ दो अक्षर। कोई जल्दी नहीं, कोई घबराहट नहीं। जैसे पचास साल से वो इस एक कपड़े को खुलते हुए देख रहे हों।

चाचा ने कपड़ा खोला।

तस्वीर पीपल की लालटेन के नीचे आई।

और मुझे लगा कि हवा रुक गई।

पीछे से कोई बोला — “ये तो…”

और फिर एक आवाज़ आई, ऐसी आवाज़ जो सत्तर साल की चुप्पी को एक झटके में तोड़ दे।

“ये मुझे दो।”

कौशल्या दादी।

वो अपनी मोटी लाठी के सहारे उठीं — और उठीं ही नहीं, उछलकर उठीं, जैसे कोई बूढ़ी औरत नहीं, कोई पुरानी तलवार म्यान से निकली हो। शांति देवी ने उनका हाथ पकड़ना चाहा, पर दादी ने हाथ झटक दिया।

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