The Mysterious Bell – Chapter 822
हाँ, यही तरीक़ा है। यही तरीक़ा रणवीर का है — और सक्सेना उसका हाथ है। यही तरीक़ा मैंने रणवीर की आँखों में देखा था जब वो दुकान पर आया था। डराओ मत — थकाओ। थका दो। हर बार एक नई तारीख़ दो, जब तक आदमी खुद हार न मान ले।
मैदान छँटने लगा। कुर्सियाँ खिसकने लगीं। बच्चे भागने लगे।
एक बूढ़ी औरत मेरे पास आई, अपना छोटा दुपट्टा ठीक करती हुई, और बोली, “बेटा, तूने आज अच्छी बात कही। पर सच्ची बात कहने वाले का पेट भी भरना पड़ता है। तू अपना ध्यान रख।”
“आपका भी,” मैंने कहा।
“मैं तो आ रहूँगी कल,” वो बोली। “दस बजे। थाने।”
“आपको ज़रूरत नहीं—”
“मेरा नाम भी तो उस सूची में था,” वो बोली, और चली गई।
मैं वहीं खड़ा रहा।
मेरे चारों तरफ़ भीड़ बह रही थी, जैसे बारिश में पानी नाली की तरफ़ बहता है। शबनम आपा अपनी थाली लेकर गईं, पर जाते वक़्त उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा — बिना कुछ कहे। उस्ताद ट्रंक के पास खड़े थे, याकूब लाठी पर झुके थे। सानिया और गुड्डू काग़ज़ बाँटते रहे, हालाँकि अब बाँटने का कोई मतलब नहीं था — लोग बिना लिए जा रहे थे। पर बच्चे बाँटते रहे। यही बच्चों की खूबी है — जब तक कहो, बाँटते हैं। सोचते नहीं कि फ़ायदा होगा या नहीं।
मीरा ने कैमरा बंद किया और मेरे पास आई।
“मैंने कहा था,” वो बोली, “सीधा प्रसारण। दो हज़ार लोगों ने देखा। किसी ने बीच में कैमरा बंद नहीं किया। ये पूरा है।”
“आपने इसे इतना बड़ा क्यों बना दिया?” मैंने पूछा।
“क्योंकि,” उसने कहा, और उसने अपना कैमरा बैग में रखा, “अगर ये आज रात भर बंद कमरे में रहेगा, तो कल तक इसका आधा सच मर जाएगा। और मुझे आधा सच से नफ़रत है।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा, “मुझे पता है मैं किस बारे में बोल रही हूँ। तुम्हें किसी ने बताया होगा, या नहीं बताया होगा। रमा मैडम वाली बात।”
“मीरा—”
“आज नहीं,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एकदम वो सख़्ती आई जो सिर्फ़ थकान से आती है। “आज हिसाब तुम्हारा है। मेरा आज नहीं।”
वो चली गई।
और फिर रणवीर आया।
वो चुपचाप आया। इतनी चुपचाप कि मुझे पता ही नहीं चला। मुझे तब पता चला जब उसका हाथ मेरे कंधे पर पड़ा — और वो हाथ गरम था।
बहुत गरम।
और फिर उसकी आवाज़ आई, बहुत प्यार से, बिल्कुल वैसे जैसे कोई चाचा भतीजे को अपने साथ चाय पर ले जाता है।
“बेटा,” उसने कहा, “दो मिनट मेरे साथ चल। तंबू के पीछे। बैठकर बात करें। बस दो मिनट।”
मैंने पीछे देखा।
सभा लगभग खत्म थी। टिंकू उस्ताद के पास खड़ा था। मीरा दूर जा रही थी। पुलिस वाले गाड़ी की तरफ़ बढ़ रहे थे। सक्सेना जा चुका था। शबनम आपा गुमटी की तरफ़।
कोई भी मेरी तरफ़ नहीं देख रहा था। कोई भी सुन नहीं सकता था।
मेरी जेब में घंटी — घंटी ने कुछ नहीं कहा।
बिल्कुल कुछ नहीं।
और यही सबसे बड़ी बात थी। क्योंकि उस घंटी ने आज पूरे दिन मुझे हर छोटी बात पर चेतावनी दी थी। “चुप मत रहना” से लेकर “अब हिसाब शुरू” तक। और अब — जब रणवीर का हाथ मेरे कंधे पर था — वो चुप थी।
या तो वो कुछ नहीं कहना चाहती थी।
या वो भी सुन रही थी।
“बेटा,” रणवीर ने दोबारा कहा, और उसकी उँगलियाँ मेरे कंधे पर थोड़ी सी कस गईं। “चलो। दो मिनट। तुम्हारी माँ की बात करनी है।”
माँ की बात।
वो दो शब्द थे जो मुझे रोक नहीं सकते थे — पर फिर भी कुछ कर गए। क्योंकि अगर कोई आदमी मेरे सामने मेरी माँ का नाम ले, तो मैं सुनना चाहता हूँ। चाहे वो मेरी माँ की दुश्मन ही क्यों न हो। यही मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी है। मैं अब तक नहीं सुधरा।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उस्ताद ने देखा कि मैं रणवीर के साथ जा रहा हूँ। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस अपना ट्रंक उठाया और धीरे से याकूब के पास चले गए — और मैंने देखा कि उन्होंने ट्रंक को वैसे ही पकड़ा जैसे कोई मिस्त्री औज़ारों का बक्सा पकड़ता है। मज़बूती से। तैयारी के साथ।
हम तंबू के पीछे गए।
तंबू के पीछे अंधेरा था। घुप्प अंधेरा। ऐसा अंधेरा जो सफ़ेद कपड़े के पीछे हमेशा होता है — क्योंकि तंबू के अंदर रोशनी होती है, और पीछे कुछ नहीं। बस ज़मीन, पुराने खूँटे, और टूटे हुए प्लास्टिक की कुर्सियाँ।
मैंने अपनी जेब में एक बत्ती महसूस की — वो माचिस, जिसमें बबलू ने तीन बत्तियाँ दी थीं। मैंने उसे पकड़ा।
रणवीर ने अपना हाथ मेरे कंधे से हटाया।
और फिर उसने अपना कॉलर खोला।
बस एक बटन। ऊपर का बटन। धीरे से।
उसकी कमीज़ के अंदर से एक चीज़ चमकी।
मैंने देखा।
मैंने पहले सिर्फ़ पीतल का गोल ताबीज़ देखा था — छोटा सा, किनारे जला हुआ, ऊपर कुछ अक्षर। पिछले हफ़्ते टिंकू ने छुआ और उसकी हथेली जल गई थी।
पर अब मैं अंधेरे में देख रहा था।
और अंधेरे में वो ताबीज़ वैसा नहीं दिख रहा था।
वो दहक रहा था।
कोयले की तरह। जैसे किसी ने अंधेरे में आग की छोटी सी लाल डली पकड़ी हो। उसका किनारा लाल था, बीच में कोई ठंडा पीला बिंदु था, और उसके चारों तरफ़ — उसकी धातु के नीचे — एक लकीर दौड़ रही थी, जैसे किसी के सिर की नस एक बार फूलकर बैठ जाए।
और उस ताबीज़ की रोशनी में रणवीर का चेहरा — कुछ अलग था।
वो मुस्कुरा नहीं रहा था।
वो बस खड़ा था।
और उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा था।
डर।
असली डर।
“देख रहा है?” उसने धीरे से कहा। “तो अब सुन। मैं तुझे कुछ देने नहीं आया। मैं तुझसे एक चीज़ माँगने आया हूँ।”
ताबीज़ की रोशनी उसकी गर्दन पर पड़ रही थी, और उसकी छाया उसके पीछे ज़मीन पर पड़ रही थी — लंबी, टेढ़ी, और उस छाया में कोई दूसरा सिर भी था।
मेरी जेब में घंटी अब भी चुप थी।
“माँग क्या है?” मैंने कहा। मेरी आवाज़ सुनकर मुझे खुद हैरानी हुई — वो शांत थी। अंदर से बिल्कुल नहीं, पर बाहर से शांत।
रणवीर ने एक लंबी साँस ली।
और फिर उसने वो कहा, जो मैंने सोचा भी नहीं था।
“तेरी घंटी,” उसने कहा। “मुझे तेरी घंटी चाहिए। सिर्फ़ एक रात के लिए। और बदले में — मैं तुझे तेरी माँ का काग़ज़ दे दूँगा। साफ़ काग़ज़। जिस पर कोई अंगूठा नहीं, कोई शर्त नहीं। जिससे कल सुबह मशीन नहीं आएगी।”
अंधेरा और गहरा हो गया।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला — घंटी को छूने के लिए नहीं। माचिस को छूने के लिए।
और घंटी ने, उसी पल, बहुत धीरे से, बहुत दबी आवाज़ में, बस एक शब्द कहा:
“पूछ।”
॥
“पूछ।”
वो शब्द मेरी जेब से आया। इतना धीमा कि जैसे घंटी ने मुँह फेरकर कहा हो, किसी और से नहीं, खुद से।
मैंने माचिस की डिब्बी उँगलियों में दबायी और वहीं खड़ा रहा।
तंबू के पीछे हवा नहीं चल रही थी। आगे मैदान में लाउडस्पीकर बज रहा था — कोई गाना, जिसके बोल मुझे समझ नहीं आ रहे थे। दूर कहीं बच्चे हँस रहे थे, कोई रो रहा था, और जनरेटर लगातार घुरघुरा रहा था जैसे किसी के सीने में कुछ फँसा हो।
सफ़ेद कपड़े की दीवार मेरी पीठ के पीछे थी। उस पार रोशनी थी, तालियाँ थीं, मिठाई थी। और इस तरफ़ — सिर्फ़ ज़मीन, पुराने खूँटे, टूटी प्लास्टिक की कुर्सियाँ, और सूखी घास जो पैर के नीचे चरमरा रही थी।
रणवीर ने अपनी कमीज़ का कॉलर बंद कर दिया। एक ही बटन, धीरे से। पर उसके पहले जो चीज़ मैंने देखी थी, वो अंधेरे में भी मेरी आँखों के अंदर जल रही थी।
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