The Mysterious Bell – Chapter 809
ज़ुबैर चाचा ने सिर हिलाया।
"वो ताबीज़," उन्होंने कहा, "मैंने उसी रात उसे पहनते देखा था। उसके हाथ पर छाले थे, और वो कह रहा था — चाचा, ये मेरे बाप को ठीक कर देगा। फिर वो चला गया। फिर पंद्रह दिन बाद लौटा। उसी ताबीज़ के साथ। पर उसके हाथ पर छाले नहीं थे। कोई निशान नहीं। बस एक सफ़ेद रेखा थी — गले में, ताबीज़ की जगह।"
मैंने झुककर अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी थी।
गुनगुनी।
चुप।
"चाचा," मैंने कहा, "उसका ताबीज़ कैसा दिखता था?"
"गोल। पीतल का।"
"उस पर क्या बना था?"
"मुझे ठीक याद नहीं," चाचा ने कहा। "उस रात मैंने उसे बस एक पल देखा था।"
"तो कोई तस्वीर? कोई निशान?"
ज़ुबैर चाचा चुप हो गए।
फिर उनकी आँखें बदलीं।
वो उठे। स्टूल के नीचे से एक पुरानी लकड़ी की पेटी निकाली। पेटी पर धूल थी, और पेटी का एक कोना चटका हुआ था। उन्होंने ढक्कन उठाया।
अंदर काग़ज़ों के पुराने पन्नों की गंध उठी।
"उस रात," चाचा ने कहा, "मैंने उसे एक तस्वीर खींचने को कहा था — बस हँसी-मज़ाक में। उसने कहा — चाचा, अब मैं नहीं खिंचवाता। फिर भी मैंने कैमरा उठा लिया था। उस वक़्त तक वो दुकान से बाहर जा चुका था। पर मैंने झटपट एक तस्वीर उसकी ली — दरवाज़े पर खड़े हुए, पीठ घुमाए। उस वक़्त मुझे नहीं पता था कि उसकी तस्वीर लेना क्या होगा।"
उन्होंने पेटी से एक नेगेटिव की पट्टी निकाली।
पट्टी पुरानी थी, किनारों से पीली पड़ी थी, और उस पर कुछ धुंधले अक्षर मिटे हुए से थे।
"ये सिर्फ़ उसकी तस्वीर नहीं," चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक धीमी हो गई। "यहाँ उसके पीछे कोई और था।"
मेरा मुँह सूख गया।
"कौन?"
"मैंने वो नेगेटिव तब धोया था," चाचा ने कहा। "बाद में, दो दिन बाद। जब मैंने तस्वीर देखी, तो मेरे हाथ से कैंची गिर गई थी।"
"क्या था उसमें?"
ज़ुबैर चाचा ने मेरी तरफ़ देखा।
और उनकी आँखों में वो सन्नाटा था जो बीस साल से इस दुकान में टँगा हुआ था।
"वो नेगेटिव मैंने आज तक किसी को नहीं दिखाया," उन्होंने कहा। "न धोया, न दिखाया। सिर्फ़ कभी-कभी रात को उठकर देखता हूँ कि दराज़ में अब भी है या नहीं।"
"चाचा —"
"रुक जाओ," चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मुझे चुप करा गया।
उन्होंने अपना हाथ पेटी में डाला। मैंने देखा उनकी उँगलियाँ उस नेगेटिव पर रुक गईं।
फिर वो रुक गए।
हाथ पेटी के अंदर जम गया।
नेगेटिव वहीं पड़ा रहा।
और ज़ुबैर चाचा ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"तुम तीन लोगों में से," उन्होंने धीरे से कहा, "कौन वो आदमी है जो आज रात उससे मिलने जा रहा है?"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
"मैं," मैंने कहा। "पर —"
"पर कुछ नहीं," चाचा ने कहा। उन्होंने आँखें खोल दीं। उनकी आँखें अब उस मोटे चश्मे के पीछे से भी साफ़ थीं। "मैंने बीस साल पहले इस बाज़ार में बैठकर देखा है कि ये शहर किस तरह का है। यहाँ हर आदमी जो किसी बड़े आदमी से लड़ता है, आख़िर में मर जाता है। बीमार हो जाता है। कर्ज़ में डूब जाता है। उसका बच्चा स्कूल छोड़ देता है। उसकी बीवी बीमार पड़ जाती है।"
वो रुके।
"या वो खुद उस बड़े आदमी जैसा बन जाता है," उन्होंने धीरे से कहा।
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं पूछता हूँ," चाचा ने कहा। "तुम उस आदमी के दुश्मन हो, या उसके अगले शिकार?"
कमरे में सन्नाटा था।
मीरा ने अपनी तरफ़ से कोई शब्द नहीं निकाला।
टिंकू ने भी नहीं।
और मैं?
मैं बैठा रहा। मेरी जेब में घंटी थी, और वो गुनगुनी थी, और वो चुप थी। जैसे वो भी जवाब सुनने के लिए रुकी हो।
मैंने सोचा।
मैंने अपनी गली सोची — पीपल, चबूतरी, शबनम आपा की गुमटी, उस्ताद की सिलाई मशीन। मैंने अपनी माँ सोची — अस्पताल के बेड पर, आधी साँस में, जिसकी दवा कल खत्म है। मैंने अपना बाप सोचा — चुप्पी में डूबा हुआ, जिसने आज सबके सामने खुद को खोला। मैंने काजल सोची, टिंकू सोचा, याकूब सोचा, कौशल्या दादी सोचीं।
फिर मैंने रणवीर सोचा।
वो लड़का, जो मंदिर के सामने खड़ा हुआ था। जिसके बाप ने तीन महीने उसे ढूँढा और मर गया। जो अपने बाप की अर्थी पर नहीं आया। जिसने एक रात ताबीज़ पहना और उसके बाद जो बना — वो क्या बना?
मैंने अपने हाथ अपनी जाँघों पर रखे।
मेरे हाथों में ग्रीस के निशान थे।
हमेशा रहते हैं।
मैंने ज़ुबैर चाचा की आँखों में देखा।
"चाचा," मैंने कहा, "मैं उसका दुश्मन नहीं हूँ।"
चाचा चुप रहे।
"और मैं उसका शिकार भी नहीं हूँ," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ उस लड़के की गली का आदमी हूँ जो मंदिर के सामने खड़ा था। उस लड़के की गली, जिसके बाप ने उसके लिए दुआ माँगी थी।"
मैंने अपनी जेब में घंटी को छुआ।
"मैं उससे नहीं लड़ता," मैंने कहा। "मैं उसे लौटाना चाहता हूँ।"
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा।
उनके चेहरे पर कुछ पिघला।
"मैंने बीस साल में एक बात सीखी है," उन्होंने धीरे से कहा। "जो आदमी खुद को बचाने के लिए किसी दूसरे को खो दे, वो आदमी कभी नहीं बचता।"
फिर उन्होंने पेटी से नेगेटिव निकाल लिया।
उन्होंने मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"जब तक तुम्हारे हाथ में यह है," उन्होंने कहा, "यह किसी भी आदमी की सबसे बड़ी गवाही है। जो इस तस्वीर में है, वो आज भी उसके पीछे खड़ा है।"
मैंने नेगेटिव पकड़ा।
उसकी सतह ठंडी थी। पर मेरे हाथ में आते ही थोड़ी गुनगुनी लगी — शायद मेरी हथेली से, शायद कुछ और से।
"चाचा," मीरा ने कहा। "आपने कहा आपने तस्वीर धोई थी।"
"हाँ," चाचा ने कहा। "एक ही बार। और उसके बाद मैंने उसे जला दिया।"
"तो फिर —"
"फिर भी तस्वीर मेरे पास है," चाचा ने कहा।
उन्होंने पेटी से एक और काग़ज़ निकाला।
एक पुरानी तस्वीर।
सफ़ेद-काली।
और उस तस्वीर में — एक आदमी, पीठ घुमाए, दरवाज़े की तरफ़ जाते हुए। उसके एक हाथ में जला हुआ ताबीज़ था।
और उसके पीछे…
उसके पीछे, अंधेरे में, एक कदम पीछे, कुछ खड़ा था।
का आकार इंसान जैसा, पर आँख नहीं, नाक नहीं, मुँह नहीं। बस एक काला, धुएँ जैसा शरीर — और उस शरीर में एक चीज़ थी जो मैंने तुरंत पहचान ली।
वो एक मुस्कान थी।
बिना मुँह की मुस्कान।
मेरे हाथ काँपे।
और मेरी जेब में घंटी — पहली बार उस दिन — बजी।
खुद बजी।
बिना मेरे हाथ लगाए।
और उसकी आवाज़ पहले से ज़्यादा ठंडी थी। इतनी ठंडी कि मेरी रीढ़ से सिर तक सुई सी चुभी।
"देख लिया," उसने कहा। "अब तू इसे नहीं छोड़ सकता।"
मैंने नेगेटिव अपनी जेब में रखा।
मैंने ज़ुबैर चाचा की तरफ़ देखा।
"चाचा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ पहले से सख़्त थी, "आज रात वो मेरी गली में आ रहा है। अपना ताबीज़ फेंकने। और उसके पीछे —"
"उसके पीछे वो है," चाचा ने कहा। "जो बीस साल पहले भी था। اور जो अब भी है।"
"आपने उसे कभी नाम नहीं दिया," मीरा ने कहा।
"मैंने नहीं दिया," चाचा ने कहा। "क्योंकि उसका नाम पता करना खतरनाक है। जो उसका नाम लेता है, वो अगली रात अपनी दुकान बंद कर देता है।"
टिंकू ने अपनी तरफ़ से धीरे से कहा, "पर हमें तो दुकान बंद करनी ही है, चाचा।"
चाचा उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुराए।
पहली बार उस दिन।
"तो बेटा," उन्होंने कहा, "तुम सही जगह आए हो।"
फिर चाचा उठे।
उन्होंने दीवार के उस कोने से एक बंद पड़ी साइकिल उतारी।
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