The Mysterious Bell808 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 808

7 min read November 5, 2026

"वो लड़का," उन्होंने कहा, "इस दुकान के सामने साइकिल ठीक करता था। अपनी दुकान नहीं थी, बस एक चटाई बिछाकर बैठ जाता था। पहले उसके पास एक पुरानी साइकिल थी, फिर वो भी चली गई, तो उसने किसी और का पंचर ठीक करना शुरू किया। हँसता रहता था। मुझसे तस्वीरें खिंचवाता था, मुफ़्त में। कहता था, चाचा, आप मेरी एक तस्वीर ऐसी खींचो जिसमें मैं बड़ा आदमी लगूँ।"

मेरी साँस कहीं लंबी हो गई।

"और मैंने एक दिन खींची भी," ज़ुबैर चाचा ने कहा। "उसने अपनी कमीज़ ठीक की, बाल हाथ से सवारे, और मेरे सामने खड़ा हो गया। मैंने कहा — बेटा, शेर की तरह दिखता है तू। और वो हँसकर बोला — चाचा, दिखने से पेट नहीं भरता।"

टिंकू ने अपनी तरफ़ से कोई धीमी आवाज़ निकाली।

"फिर," ज़ुबैर चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ थोड़ी धीमी पड़ गई, "उसके पिता बीमार पड़े। कोई बड़ी बीमारी। अस्पताल में दो महीने। कर्ज़ चढ़ता गया। वो लड़का अपनी दुकान से सुबह उठकर सीधे अस्पताल जाता, वहाँ से लौटकर फिर साइकिलें ठीक करता। और रात को मेरी दुकान के सामने आकर बैठ जाता।"

"क्यों?"

"क्योंकि मेरी दुकान में लाइट थी," ज़ुबैर चाचा ने कहा। "वो घर नहीं जाना चाहता था, क्योंकि घर में कोई नहीं होता था। यहाँ बत्ती जलती रहती थी, और वो उस बत्ती में हिसाब लिखता रहता — कितना कमाया, कितना दिया। कभी-कभी इतनी रात तक बैठा रहता कि मैं बत्ती बंद कर देता। फिर वो जाता, और मैं उसके पीछे दरवाज़ा बंद करता।"

मैंने उसी वक़्त अपनी जेब में घंटी छुई।

वो गुनगुनी थी।

पर इस बार कुछ नहीं बोली। जैसे वो भी सुन रही हो।

"फिर वो रात आई," ज़ुबैर चाचा ने कहा।

मीरा ने अपनी कलम निकाली। वो कुछ लिखने लगी — पर मैंने देखा उसका हाथ काँप रहा है, और कलम काग़ज़ पर चलने से पहले कुछ पल हवा में रुकी रही।

"कौन सी रात?" मैंने पूछा।

"बरसात की रात थी," चाचा ने कहा। "बिजली गिर रही थी। मैं दुकान बंद कर रहा था। तभी वो आया।"

"कैसा लग रहा था?"

"अजीब।" चाचा ने कहा। "उसका एक हाथ जला हुआ था — दाहिना। पूरा हथेली पर छाले। और वो हँस रहा था।" चाचा की आवाज़ अचानक टूट गई। "तुम जानते हो, वो हँस रहा था? ऐसा नहीं जैसे कोई खुश हो — ऐसा जैसे कोई डर के पीछे हँसी रखकर छिपा रहा हो।"

"फिर?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ भी सूखी आई।

"वो अंदर आया। अपनी जेब से एक ताबीज़ निकाला। पीतल का, गोल। उसके गले में बाँधने की ज़िद करने लगा।"

"क्यों?"

"कहने लगा — चाचा, मेरे बाप के लिए दुआ करो। मैंने कहा, बेटा, तेरे बाप के लिए तो मैं रोज़ दुआ करता हूँ। फिर यह क्या है? तो वो बोला — ये बिजलीघर से लाया हूँ। ये मेरा है अब।"

मैंने अपना हाथ मेज़ पर रखा।

हाथ की उँगलियाँ अपने आप कस गईं।

"बिजलीघर से," मैंने धीरे से कहा।

"हाँ," चाचा ने कहा। "मैंने पूछा — बिजलीघर से क्या मतलब? वो वहाँ क्या करने गया था? तो वो बोला — चाचा, वहाँ कुछ है। जो बंद पड़ा है, जो ठंडा पड़ा है। जिसने मुझे बुलाया है।"

"और आपने क्या कहा?"

"मैंने कहा — बेटा, वहाँ मत जा। वो जगह अच्छी नहीं है। मैंने कितने लोगों को देखा है जो वहाँ गए और वापस नहीं आए।"

"तो?"

"तो वो हँसा।" चाचा ने कहा। "और उसने कहा — नहीं चाचा, मुझे वो चीज़ मिल गई है जो मेरे बाप को ठीक कर देगी।"

मेरे अंदर कुछ बैठ गया।

तुम सोच रहे होगे कि रणवीर भारद्वाज — वो ठेकेदार, वो आदमी जो पूरी गली को खा जाना चाहता है — उसकी कहानी क्या है।

मैं बताता हूँ।

वो कहानी यहीं से शुरू होती है।

और ये कहानी मुझे अंदर से खोखला कर रही थी, क्योंकि हर शब्द के साथ मुझे अपना बाप याद आ रहा था। शंकर यादव। जिसने बिना पढ़े काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था। जिसने पच्चीस साल चुप रहकर अपनी सज़ा खुद काटी थी। जिसने आज सबके सामने कबूल किया कि उसने डर से ग़लती की।

अगर शंकर यादव को कोई पुराना ताबीज़ मिल जाता उस रात, तो क्या वो भी बदल जाता?

मुझे नहीं पता।

और यही सबसे डरावना सवाल है — कि हम सबके अंदर वो आदमी बैठा है जो एक चीज़ के लिए सब कुछ बदल सकता है।

"उस रात के बाद," ज़ुबैर चाचा ने कहा, "वो लड़का नहीं आया। पाँच दिन। दस दिन। मैंने उसके बारे में पूछा, कोई नहीं जानता था। फिर पंद्रहवें दिन वो आया।"

"कैसा आया?"

"नए कपड़ों में," चाचा ने कहा, और उनकी आवाज़ में जैसे कुछ कड़वा घुल गया। "सफ़ेद कुर्ता, बाल साफ़ कटे। और वो चल रहा था — मेरे सामने से — और उसने मुझे देखकर सिर हिलाया, जैसे कोई नया आदमी किसी पुरानी दुकान के पास से गुज़रता है और मालिक को नमस्ते कहना ज़रूरी नहीं समझता।"

"आपने उसे पहचाना?"

"मैंने उसे पहचाना," चाचा ने कहा। "पर उसने खुद को नहीं पहचाना। उसकी आवाज़ बदल गई थी। उसकी चाल बदल गई थी। पहले वो झुककर चलता था, अब सीना तानकर।" चाचा रुके, फिर बोले — "और उसकी आँखें।"

"आँखें?"

"पहले उसकी आँखों में हमेशा कुछ बेचैनी थी। जैसे कोई कहे — मुझे कुछ चाहिए, पर मैं कह नहीं सकता। अब उन आँखों में सिर्फ़ एक चीज़ थी।"

"क्या?"

"यक़ीन।" चाचा ने कहा। "और यक़ीन वाली आँखें सबसे खतरनाक होती हैं, बेटा। क्योंकि उन्हें कोई रोक नहीं सकता।"

टिंकू ने धीरे से कहा, "चाचा, उस ताबीज़ का क्या हुआ?"

ज़ुबैर चाचा ने उसकी तरफ़ देखा, जैसे पहली बार उसे देखा हो।

"वही जो तुम्हारे गले में है, बेटा, पर तुम्हारा कुछ नहीं।"

"मतलब?"

"मतलब — उसने उसे कभी उतारा नहीं। बारात में, मंदिर में, दुकान के उद्घाटन में — हर तस्वीर में वो गले में लटका रहता। मैंने कितनी तस्वीरें देखीं उसकी, बीस साल में, अख़बार में, टीवी में। हर तस्वीर में वो एक जैसा — हाथ जोड़े हुए, मुस्कुराते हुए। पर उस मुस्कान के नीचे ताबीज़ की पीली चमक हमेशा बनी रहती।"

"और उसके बाप?" मीरा ने पूछा।

ज़ुबैर चाचा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर उसकी तरफ़।

और उनका चेहरा पहली बार बदला।

"उसका बाप," उन्होंने कहा, "तीन महीने अपने बेटे को ढूँढता रहा।"

मैंने अपना सिर थोड़ा झुका लिया।

"अस्पताल से उठकर, जब तक उसके पैर चले, वो आदमी इस बाज़ार में आता रहा। रोज़। मुझसे पूछता — ज़ुबैर भाई, वो आया? तो मैं कहता — नहीं खली साहब, आज नहीं आया। और वो चला जाता।"

"उसका नाम खली साहब था?" मीरा ने पूछा।

"हाँ," चाचा ने कहा। "खलील भारद्वाज। साइकिल मिस्त्री था — अच्छा मिस्त्री, गली के हर घर में उसका हाथ पहचाना जाता था। वो हर बच्चे को अपने बेटे जैसा मानता था। और उसका बेटा — उसका बेटा उसे ढूँढते-ढूँढते रह गया।"

"क्या मतलब रह गया?"

"मतलब — वो मर गया," चाचा ने कहा। "अस्पताल में। उसके बेटे को पता चला। और वो अपने बाप की अर्थी पर नहीं आया।"

मेरी साँस रुक गई।

"नहीं आया?" मैंने कहा।

"नहीं आया," चाचा ने दोहराया। "मैं खुद गया था। क़ब्र के पास खड़ा था। गली के बीस-तीस लोग आए थे। पर उसका बेटा नहीं आया।"

"उसका नाम?"

"उस वक़्त तक वही रणवीर था," चाचा ने कहा। "पर वो नहीं आया। उसने सिर्फ़ कुछ पैसे भिजवाए थे, एक आदमी के हाथ से। और वो आदमी बोला — साहब ने कहा है, बाकी काम आगे।"

गली में हवा चल रही थी, पर मुझे वो नहीं सुनाई दे रही थी।

मैं सिर्फ़ सुन रहा था वो शब्द। "बाकी काम आगे।"

जैसे कोई बाप मरे और कोई बेटा उसकी मौत को भी टाल दे। जैसे कोई बाप अर्थी पर भार बन जाए। जैसे कोई बाप मरे हुए भी किसी का काम रोक रहा हो।

"और," मीरा ने धीरे से कहा, "उस रात के बाद से वो आदमी बदल गया। आपने तो देखा — एक ही शाम में?"

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