The Mysterious Bell – Chapter 790
कमरे में सन्नाटा छा गया। उस्ताद ने धीरे से अपना चश्मा उतारा। उनके हाथ काँप रहे थे।
“मेरे पिता ने लिखा — जो सबसे बड़ी मुस्कान लेकर आया था,” उन्होंने कहा। “पर उन्होंने नाम नहीं लिखा। जान-बूझकर नहीं लिखा। क्योंकि उन्हें पता था कि अगर नाम लिखा तो काग़ज़ खुद जल जाएगा।”
मैंने कहा, “तो नाम कहाँ है?”
उस्ताद ने कहा, “मेरे पास। पचास साल से। मेरी मशीन की दराज़ में। एक पन्ने पर। जिसे मैंने एक बार भी खोलकर नहीं देखा।”
मैंने कहा, “क्यों नहीं देखा?”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भीगी थीं।
“क्योंकि डर था,” उन्होंने कहा। “अगर उसमें उसका नाम होता जिसे मैं अपना भाई मानता हूँ, तो मैं उसे ज़िंदा नहीं रख पाता।”
मैं चुप हो गया।
माँ ने कहा, “उस्ताद, आप आज रात ये बात क्यों लाए?”
उस्ताद ने कहा, “क्योंकि आज शाम शबनम ने मुझे बताया कि अंकुश कल रणवीर के सामने जा रहा है। और मुझे लगा कि अगर मैंने ये पन्ना कल तक रोका, तो अंकुश उस आदमी के सामने ऐसे खड़ा होगा जैसे हाथ में तलवार लेकर निहत्था खड़ा हो।”
मैंने कहा, “उस्ताद, वो पन्ना लाइए।”
“कल लाऊँगा,” उन्होंने कहा। “आज रात मेरी मशीन खुली है। मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता।”
वो मुड़े और चल दिए। उनके जाने के बाद कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा रह गया — जैसे कोई घर का बुज़ुर्ग चला गया हो और उसकी जगह उसकी लाठी पड़ी रह गई हो।
काजल ने धीमे से कहा, “अंकुश, सुबह क्या करना है?”
मैंने कहा, “सुबह नौ बजे उसकी सभा है।”
“तो?”
“तो हम आठ बजे पहुँचेंगे,” मैंने कहा। “सभा से पहले। जब मंच तैयार हो और कोई भीड़ न हो।”
माँ ने कहा, “क्यों?”
“क्योंकि सभा में वो भीड़ के सामने मुझे छोटा करेगा,” मैंने कहा। “पर सभा से पहले, वहाँ सिर्फ़ वो और मैं होंगे। उस वक़्त उसके पास भीड़ नहीं होगी। और जो आदमी भीड़ के बिना खड़ा हो, वो अपनी असली शक्ल दिखा देता है।”
मीरा ने कहा, “पर अगर वो तुझे अकेले घेर ले?”
“मैं अकेला नहीं जाऊँगा,” मैंने कहा। “मैं तुझे लेकर जाऊँगा। और टिंकू को। और उस्ताद को। और काजल को। और माँ को।”
माँ ने कहा, “मैं नहीं जाऊँगी। मैं अस्पताल में रहूँगी।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“क्यों?” मैंने पूछा।
“क्योंकि अगर वो तुम लोगों को घेर ले,” माँ ने कहा, “तो किसी को बाहर रहना पड़ेगा जो दरवाज़ा खोल सके। मैं वही रहूँगी।”
कमरे में फिर चुप्पी आई। और इस बार चुप्पी में कुछ ऐसा था जो मुझे समझ नहीं आया। माँ की आवाज़ में वो बात थी जो आमतौर पर बहुत बुज़ुर्ग लोगों की आवाज़ में होती है — जैसे उन्होंने कुछ तय कर लिया हो जो वो अब नहीं बताएँगी।
मैंने कहा, “ठीक है माँ। तू अस्पताल में रहेगी। पर एक शर्त पर।”
“क्या शर्त?”
“अगर तीन बजे तक हम न लौटें,” मैंने कहा, “तो तू काजल को लेकर अस्पताल के डॉक्टर इसरानी के पास जाएगी और उन्हें सब बताएगी।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर वो धीरे से हँसीं।
“तेरे पापा की बात याद है?” उन्होंने पूछा।
“कौन सी?”
“वो कहते थे — जो आदमी अपने बेटे के लिए शर्त रखता है, वो खुद उस शर्त पर खरा नहीं उतरता।”
मेरी आँखें भर आईं। मैंने उनकी तरफ़ पीठ कर ली, ताकि मेरा चेहरा न दिखे। क्योंकि मेरा चेहरा अब मज़ाक का नहीं था।
उस वक़्त मेरी जेब में फोन काँपा।
मैंने निकाला। स्क्रीन जल रही थी। एक अनजाना नंबर था। पर जब मैंने खोला, तो मुझे पता चल गया कि नंबर अनजाना नहीं है। नंबर के आगे लिखा था — भारद्वाज भवन।
रात के ग्यारह बज रहे थे।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने भी स्क्रीन देखी। उसके चेहरे का रंग उतर गया।
“मत खोल,” उसने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि जो आदमी रात में फोन करता है,” मीरा ने कहा, “वो अपनी बात मनवाने के लिए फोन करता है। और तेरे पास अभी उस बात को रोकने का कोई तरीक़ा नहीं है।”
“तो मैं उसे सुनूँगा,” मैंने कहा। “और जो वो कहेगा, उसे सुनकर मैं वही करूँगा जो मैं चाहता हूँ।”
मैंने फोन खोला।
मैसेज था।
सिर्फ़ एक लाइन में —
“जो सुबह सभा दस बजे थी, वो अब नौ बजे होगी।”
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भी पढ़ रही थी।
दूसरा मैसेज आया।
“और अगर तुम घंटी लेकर नहीं आए, तो सीढ़ी बारह बजे से पहले बंद हो जाएगी।”
तीसरा मैसेज आया।
“और हाँ — एक बात और। तुम्हारी अधूरी घंटी मेरे ताबीज़ से मिलना चाहती है। ये बात सिर्फ़ मुझे पता है, तुम्हें पता है, और उस चीज़ को पता है जो उस दोनों के बीच में ठंडी पड़ी है।”
मैंने फोन बंद कर दिया। मेरे हाथ में वो पत्थर जैसा भारी हो गया।
“क्या लिखा?” काजल ने पूछा।
मैंने उसे फोन दिया। उसने पढ़ा। फिर उसने मीरा को दिया। फिर माँ को।
माँ ने पढ़ा। फिर उन्होंने फोन बंद करके मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
“क्या करेगा?” उन्होंने पूछा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“माँ,” मैंने कहा, “सभा सुबह नौ बजे है।”
“मैं जानती हूँ।”
“और सीढ़ी बारह बजे बंद होगी।”
“मैं जानती हूँ।”
“तो,” मैंने कहा, “मुझे नौ और बारह के बीच उसके गले से ताबीज़ उतरवाना है।”
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “तुझे नौ और बारह के बीच ये करना है — उस आदमी से उसका गला खुलवाना। ताबीज़ खुद उतरेगा।”
मैंने फोन जेब में रखा। फिर जेब से घंटी निकाली।
वो अब भी ठंडी थी। पर जब मैंने उसे हथेली पर रखा, तो एक पल को लगा — बहुत हल्की सी — जैसे कोई भीतर से धड़क रहा हो।
“सुन,” मैंने धीमे से कहा, घंटी से। “वो कह रहा है कि तू उसके ताबीज़ से मिलना चाहती है।”
घंटी चुप रही।
“मैं तुझे ले जाऊँगा,” मैंने कहा। “सुबह नौ बजे। पर एक बात याद रख — तू जिसके गले में है, वो तेरा नहीं है। वो तेरा रखवाला है। और रखवाला बदला जा सकता है। लेकिन घंटी नहीं।”
घंटी गरम हुई — एक पल के लिए। फिर वापस ठंडी हो गई।
टिंकू ने धीमे से कहा, “अंकुश भैया, वो क्यों गरम हुई?”
“क्योंकि उसने सुन लिया,” मैंने कहा। “घंटी सिर्फ़ बजती नहीं। वो सुनती भी है।”
काजल ने कहा, “तो अब सो जाओ। सुबह जल्दी उठना है।”
पर सोना किसी को भी नहीं आया।
उस रात मैं दुकान के पीछे के कमरे से बाहर आया। गली में चाँदनी पड़ी थी — ऐसी चाँदनी जो सब कुछ चाँदी जैसा दिखाती है और कुछ भी सच नहीं दिखाती।
पीपल के नीचे कोई बैठा था।
मैं दौड़ा। पर जब पास पहुँचा, तो वो बबलू था।
वो चबूतरी पर अकेला बैठा था, पान नहीं चबा रहा था। उसके हाथ खाली थे। गले में सोने की चेन थी, पर उसमें वो चौकोर लॉकेट नहीं था। वो हटा हुआ था।
वो मेरी तरफ़ देखकर हँसा। पर उसकी हँसी में वो बात नहीं थी जो दोपहर में थी। उसकी हँसी में एक अलग चीज़ थी — जैसे कोई बच्चा रात में अकेला बैठा हो और हँसकर बताना चाहता हो कि वो रो रहा है।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“अंकुश,” उसने कहा, “मैं आज रात सो नहीं पाया। और जानता है क्यों?”
“क्यों?”
“क्योंकि आज दोपहर साहब ने मुझे बुलाया। और मुझे वही बात बताई जो उसने उस औरत को बताई थी।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“कौन सी बात?” मैंने पूछा।
“ये कि उसने सब ठीक किया है,” बबलू ने कहा। “और ये कि अब गली उसकी है। पर फिर उसने मुझसे वो पूछा जो उसने पहले कभी नहीं पूछा।”
“क्या पूछा?”
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