The Mysterious Bell – Chapter 789
मीरा ने धीरे से कहा, “आंटी, तो क्या करना है?”
“पहले ये बताओ,” माँ ने कहा, “उसने सभा क्यों बुलाई है?”
“माँ, यही तो मैं सोच रहा था,” मैंने कहा। “वो सभा नहीं बुला रहा। वो मंच बना रहा है। वो चाहता है कि गली देखे कि मैं उसके सामने कैसे झुकता हूँ।”
माँ ने कहा, “तो फिर तू वही कर जो वो नहीं चाहता।”
“वो क्या?”
“उसे झुकने की जगह न दे। तू उसके सामने खड़ा हो — पर तेरे पीछे गली खड़ी हो। वो किसी एक आदमी के सामने ताक़त दिखा सकता है। पर पूरी गली के सामने वो वही करेगा जो वो सबसे ज़्यादा जानता है — मुस्कुराएगा।”
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने मुझे देखा। और मीरा की आँखों में एक चमक आई, जो मैंने पहले भी कई बार देखी थी — जब कोई चीज़ फ़ाइल में बैठने की जगह काग़ज़ पर उतरने लगती है।
“आंटी ठीक कह रही हैं,” मीरा ने कहा। “वो सभा में अकेला है। और हम गली में सब हैं। अगर हम उसकी सभा को अपनी सभा बना दें, तो वो हार जाएगा। पर…”
“पर?” मैंने पूछा।
“पर ये सिर्फ़ तभी होगा,” मीरा ने कहा, “जब हमारे पास कुछ ऐसा हो जो वो सबके सामने खोल न सके। वरना वो हमें वहीं तोड़ देगा।”
मैंने कहा, “क्या है वो?”
मीरा ने अपना बैग खोला। अंदर से उसने एक पुरानी तस्वीर निकाली — वो तस्वीर जिसमें रणवीर के गले में गोल पीतल का ताबीज़ दिख रहा था।
“ये है वो,” उसने कहा।
मैंने तस्वीर देखी। फिर मैंने घंटी जेब से निकाली। उसकी ठंडक मेरी हथेली से रीढ़ तक गई।
“घंटी जब सही हिस्से के पास होती है, तो गरम होती है,” मैंने कहा। “ये ठंडी है। मतलब, उसका हिस्सा रणवीर के गले में है, पर घंटी वहाँ तक नहीं पहुँच रही।”
“क्यों?” टिंकू ने पूछा।
मैंने कहा, “क्योंकि रणवीर ने उसे खुद से दूर रखा है। कपड़े के नीचे। किसी और चीज़ में लपेटकर। शायद किसी ताबीज़ के अंदर। जो चीज़ दिखे नहीं, वो घंटी नहीं पहचान पाती।”
मीरा ने कहा, “तो फिर हमें उसे कैसे लाना है?”
मैंने कहा, “हम उसे लाएँगे नहीं। वो खुद आएगा।”
काजल ने कहा, “कैसे?”
“जब घंटी के दोनों हिस्से एक जगह होंगे,” मैंने कहा, “तब उसे ज़बरदस्ती उतारने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। वो खुद उतरेगा। क्योंकि उस आदमी के गले में लटकी चीज़ भी गली का हिस्सा है। और गली जितना चाहेगी, उतना ही वो ताक़त देगी।”
माँ ने कहा, “तो जो चीज़ गली की है, वो उस आदमी के गले में कैसे पहुँची?”
कमरे में फिर वही सन्नाटा आया।
“किसी ने दी,” मैंने कहा। “कौशल्या दादी ने कहा — इलाही बक्श ने आग की रात अपने रखवाले को दिया। तो सवाल ये है — वो रखवाला कौन था?”
मीरा ने कहा, “और वो रखवाला अगर रणवीर को नहीं, किसी और को दिया होता, तो रणवीर तक नहीं पहुँचता। मतलब — रखवाला खुद रणवीर तक पहुँचा। या तो वो रणवीर का आदमी था। या उसने रणवीर को वो चीज़ बेची। या दी।”
“या,” मैंने कहा, “वो रखवाला खुद रणवीर का बाप था।”
कमरे में हवा रुक गई।
मीरा ने धीमे से कहा, “अंकुश…”
“मैं नहीं कह रहा,” मैंने कहा। “मैं सिर्फ़ सोच रहा हूँ। कौशल्या दादी ने कहा — इलाही बक्श ने अपने रखवाले को दिया। पचास साल पहले। रणवीर अब अड़तालीस का है। तो पचास साल पहले रणवीर का बाप जवान रहा होगा। और आग की रात वो कहीं आसपास था, तभी उसे वो चीज़ मिली।”
माँ ने कहा, “अगर ये सच है, तो ये बात बहुत बड़ी है।”
“और इसीलिए,” मैंने कहा, “मुझे उस आदमी के सामने खड़े होकर ये नहीं पूछना — तेरे गले में क्या है? मुझे खड़े होकर ये पूछना है — तुझे ये किसने दिया? और जब वो नाम लेगा, तो उसी नाम से गली का पूरा हिसाब खुलेगा।”
उस वक़्त बाहर से एक आवाज़ आई। चप्पल की।
हम सब फिर चौंके। इस रात में कोई भी आवाज़ अब हमें चौंकाने लगी थी — जैसे गली खुद साँस लेना भूल गई हो और हर आवाज़ उसकी साँस हो।
दरवाज़े पर उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनके हाथ में एक पुराना काग़ज़ था, जो मुड़ा हुआ था। उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — शांत, पर ऐसा शांत जैसे तूफ़ान से पहले की शाम।
“उस्ताद,” मैंने कहा, “अंदर आइए।”
“नहीं,” उन्होंने कहा। “मैं दरवाज़े पर ही ठीक हूँ। मुझे कुछ बताना है, और बताने के बाद मुझे वापस जाना है। मेरी मशीन खुली है।”
“इतनी रात मशीन?” काजल ने पूछा।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
“मशीन नहीं खुली,” उन्होंने कहा। “मैं खुद खोलकर आया हूँ। पचास साल से वो मशीन बंद थी मेरे भीतर। आज वो उस रात की बात याद करके फिर चलने लगी है, और मैं उसे रोक नहीं पा रहा।”
टिंकू ने धीमे से पूछा, “क्या बात?”
उस्ताद ने काग़ज़ खोला। वो काग़ज़ फटा हुआ था, किनारों से जला हुआ, और उस पर नीली स्याही में कुछ लिखा था जो धुँधला पड़ चुका था।
“ये,” उन्होंने कहा, “मेरे पिता की दुकान के उस रजिस्टर का पन्ना है जो आग में जल गया था। पर ये बच गया। क्योंकि ये मेरे पिता ने अपनी जेब में रखा था, रजिस्टर में नहीं।”
“उस्ताद, इसमें क्या है?” मैंने पूछा।
“इसमें,” उन्होंने कहा, “उस रात का हिसाब है। मेरे पिता ने आग से पहले जो आख़िरी चीज़ लिखी — वो ये है।”
उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने उसे पकड़ा — बहुत हल्का था, इतना हल्का जैसे बस काग़ज़ का नाम बचा हो और असली चीज़ अपने साथ ले जा चुकी हो।
मैंने पढ़ा। मेरे हाथ काँपने लगे।
“क्या लिखा है?” मीरा ने पूछा।
मैंने उसे दिया। मीरा ने पढ़ा। उसकी भौंहें सिकुड़ीं। फिर उसने काग़ज़ टिंकू को दिया। टिंकू ने पढ़ा — जितना पढ़ सका — और माँ की तरफ़ बढ़ा दिया।
माँ ने काग़ज़ लिया। उन्होंने एक बार पढ़ा। फिर दूसरी बार। फिर उन्होंने काग़ज़ मेरे हाथ में रखा और अपनी आँखें पोंछीं।
काजल ने पूछा, “माँ, क्या लिखा है?”
माँ ने कहा, “जो बात मैं पच्चीस साल से मानती आई थी, वो झूठ थी। और जो बात मैं बाईस साल से छिपाती आई थी, वो आधी सच थी।”
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों में पकड़कर पढ़ा — तीसरी बार, धीरे-धीरे, हर लफ़्ज़ को उँगली से छूते हुए।
उस्ताद के पिता ने लिखा था — “आज रात शिवनारायण भाई ने कहा कि घंटी का दूसरा हिस्सा उनके पास है, और उन्होंने उसे किसी को दिया है जो उनसे बड़ा है। मैंने पूछा — किसको? उन्होंने कहा — जो सबसे बड़ी मुस्कान लेकर आया था। मैंने कहा — तुमने अपना हिस्सा बेच दिया? उन्होंने कहा — नहीं बेचा। रखवाली के लिए दिया। पर आज मुझे लग रहा है कि रखवाली करने वाला रखवाली नहीं, रखने का इरादा रखता है। कल मैं उसे वापस ले आऊँगा।”
बस। इतना ही। उसके नीचे तारीख़ थी — आग से पाँच दिन पहले की।
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रखा। मेरे हाथ ज़मीन की तरफ़ लटक गए।
“मतलब,” टिंकू ने धीमे से कहा, “परदादा ने हिस्सा किसी को दिया था। वो किसी को बेचा नहीं था। और उसने सोचा था कि वो उसे वापस ले आएँगे।”
“और वो वापस लेने नहीं पाए,” मैंने कहा। “क्योंकि पाँच दिन बाद आग लगी।”
मीरा ने कहा, “तो वो रखवाला कौन था जो सबसे बड़ी मुस्कान लेकर आया था?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“मीरा,” मैंने कहा, “आज के शहर में सबसे बड़ी मुस्कान किसकी है?”
मीरा ने कहा, “रणवीर भारद्वाज की।”
“और पचास साल पहले?” मैंने पूछा। “जब रणवीर पैदा भी नहीं हुआ था? तब सबसे बड़ी मुस्कान किसकी थी?”
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