The Mysterious Bell – Chapter 778
"मैं सोच रही थी," उन्होंने कहा, "कि इस घर में बोलने की हिम्मत किसी में बची है या नहीं।"
तभी मैंने वो छोटा लोहे का डिब्बा उठाया, जो छोटे ताले के अंदर से निकला था, और उनके सामने खोल दिया। अंदर वो काली-सफ़ेद फोटो थी — दादा पुरानी साइकिल के साथ खड़े, हैंडल पर वही पीतल की घंटी, गले में वही चाबी जो अब मेरे गले में लटकी है।
दादी ने फोटो देखी।
और उनका हाथ रुक गया। मैंने कई लोगों को चुप होते देखा है। पर ऐसी चुप्पी पहली बार देखी। वो चुप्पी शोर से भारी थी। उनकी उँगली फोटो के कोने पर टिकी रही, और उनके होंठ दो बार हिले और दोनों बार कुछ नहीं निकला।
"ये," उन्होंने आख़िरकार कहा, और आवाज़ जैसे किसी और की थी, "ये उस दिन की फोटो है जिस दिन भाई ने ये साइकिल खरीदी थी। पहली साइकिल। पहले तो वो सिर्फ़ दो पैरों पर चलता था — साइकिल के दो पैरों पर। दिन भर उसे गली में घुमाता, और जब रात होती तो उसे अपने बिस्तर के पास खड़ा करके सोता था। कहता था — ये मेरी दौलत है।"
उन्होंने फोटो मेरी तरफ़ घुमाई।
"और ये घंटी," उन्होंने कहा, "ये अकेली कभी उस साइकिल पर नहीं लगी। इसे पहले उसने अपनी जेब में रखा, फिर साइकिल पर लगाया। क्यों? क्योंकि जेब में घंटी चुप रहती है, और साइकिल पर लगे तो कभी न कभी बजती है। भाई को यही पसंद था। वो कहता था — जो चीज़ बनी हो सच और मेहनत से, वो चुप नहीं रहती।"
काजल ने धीरे से पूछा, "दादी, पर घंटी तो अपने आप बजती है। बोलती है। इंसान की तरह। ये कैसे—"
दादी ने उनकी तरफ़ देखा और फिर बहुत धीरे से कहा, "बिटिया, मैंने कभी ये नहीं कहा कि इसमें जादू है। मैंने कहा कि इसमें मेहनत है।"
और फिर टिंकू आगे आया। वो अब तक दरवाज़े के पीछे खड़ा था, आधा अंदर आधा बाहर, जैसे कोई चूहा दूध की रखवाली पर तैनात हो।
"दादी," उसने कहा, और मुझे उसकी हिम्मत पर गर्व भी हुआ और डर भी, "फिर घंटी बोलती क्यों है?"
दादी ने उसे देखा। उनकी नज़र उसके घुटने पर बँधी पट्टी पर गई, फिर उसके मैले कुर्ते पर, फिर उसके चेहरे पर।
"तू कौन है?" उन्होंने पूछा।
"टिंकू। उस्ताद का शागिर्द।"
"उस्ताद?" दादी ने भौंें चढ़ाईं।
"अंकुश भैया," टिंकू ने गर्व से कहा।
दादी ने मेरी तरफ़ देखा और फिर से वही आधी मुस्कान आई।
"तो तू उस्ताद के नाम से चलता है," उन्होंने कहा। "अच्छा। तू सुन, टिंकू। घंटी खुद नहीं बोलती। घंटी में जो बोलता है, वो है वो हिस्सा जो इंसान अपने अंदर दबाकर रखता है। जब दो आदमी आपस में सच बोलते हैं, तो उनके बीच की हवा बदल जाती है, और जो चीज़ बहुत पुरानी और बहुत ईमानदार हो, उसे वो बदलाव सुनाई देता है। हमारे पुरखों ने ये घंटी बनाई थी। उनका मानना था कि अगर ताले में, पीतल में, मशीन में सच्चाई सुनने की ताक़त हो, तो इंसान में क्यों नहीं होगी? और हमारे पुरखों का ये मानना आज भी सच निकला। क्योंकि तू आज तक किसी मशीन को नहीं सुनता, तू अपने भैया को सुनता है। यही तो चमत्कार है।"
टिंकू ने मुँह खोला, आँखें बड़ी करके, और वो सवाल पूछने ही वाला था तभी मैंने उसका कंधा दबाया और उसे पीछे खींच लिया।
"बाद में, टिंकू," मैंने कहा। "अभी के लिए सिर्फ़ सुन।"
उसने हाँ में सिर हिलाया, पर मुझे पता था कि उसके दिमाग़ में अभी बीस सवाल चक्कर काट रहे होंगे — और आधे तो ऐसे होंगे जिनका जवाब मेरे पास भी नहीं है।
मैंने दादी के सामने डायरी रखी।
"दादी," मैंने कहा, "ये डायरी दादा की है। इसमें लिखा है कि घंटी एक थी, दो नहीं। और दूसरा हिस्सा किसी के गले में है। मुझे लगता है—"
मैं रुक गया। मैंने बहुत सोच समझकर शब्द चुने, फिर भी जब बोला तो वो शब्द मुँह से निकलते ही मुझे मेरे ही कानों में अजीब लगे।
"मुझे लगता है कि वो हिस्सा आपके गले में है।"
दादी ने हथेली पर रखी पीतल की चीज़ को उठाया। वो छोटी थी, एक अँगूठे के जितनी, और उस पर वही फूल खुदा था — वही फूल जो मेरी घंटी पर है। फर्क सिर्फ़ इतना था कि इसमें भीतर वो जीभ नहीं थी जो आवाज़ करती है। ये आधा था। और अगर टुकड़ों को देखें तो ये ठीक वैसे ही पहाड़ी खड़ी थी जैसे मेरी घंटी, बस आधी।
"ये सिर्फ़ गले में है," दादी ने कहा, "ताकि मैं चुप न रहूँ। भाई ने कहा था — तेरे पास आधी रख, मेरे पास आधी। जिस दिन दोनों बोलेंगे, उस दिन हिसाब का पन्ना भी बोलेगा। पर भाई नहीं बोला। भाई ने अगली सुबह ही सब बोलना बंद कर दिया।"
उन्होंने डायरी की तरफ़ देखा। उनकी उँगली उस फटे पन्ने पर गई, जहाँ बीच से काग़ज़ फटा हुआ था, और फिर वो पन्ने को बहुत धीरे से सहलाने लगीं।
"ये पन्ना," उन्होंने कहा, "जिस दिन फटा, उस दिन मुझे ज़ाहिर में भी एक आदमी ने बुलाया था। कहा था — बहू, ये काग़ज़ अच्छे से नहीं रखे गए। और मैं — मैं उन सब बातों में पड़ गई।"
"कौन बुलाया था, दादी?" मीरा ने पूछा। वो अब तक दरवाज़े के पास खड़ी थी, कैमरा नीचे रखकर, हाथ उलटे पीछे बँधे। "नाम याद है?"
दादी ने मीरा की तरफ़ देखा। फिर कमरे की तरफ़। फिर पापा की तरफ़।
"नाम याद है," उन्होंने कहा। "लेकिन नाम बोलने से पहले मैं चाहती हूँ कि तुम लोग एक बात समझो।"
वो उठीं। लाठी ज़मीन पर टिकाई और वो फोटो उठाकर कमरे के कोने में गईं, जहाँ दीवार पर बाईस साल से एक पीतल की पट्टी टँगी थी — जो मुझे बचपन से सिर्फ़ पुरानी सजावट लगती थी।
उन्होंने अपनी हथेली पर रखी पीतल की चीज़ उस पट्टी के करीब लाई।
और मेरे जीवन में पहली बार मैंने देखा कि पट्टी पर बने फूल और उनकी हथेली पर बने फूल एक ही हैं। वो एक ही साँचे में ढले हुए थे। एक ही हाथ ने दोनों को बनाया था।
"तेरे परदादा शिवनारायण यादव," दादी ने कहा, और अब उनकी आवाज़ में काँपन नहीं, सिर्फ़ एक अजीब-सी सफ़ाई थी, "सिर्फ़ मिस्त्री नहीं थे। वो सपने देखने वाले आदमी थे। उस ज़माने में, जब गली में साइकिल ठीक करने वाला हर आदमी अपनी मज़दूरी गिनकर घर जाता था, भाई ने उस पुराने बाज़ार में एक दुकान खोली थी — और उसके साथ था इलाही बक्श।"
उस्ताद, जो अब तक दरवाज़े के बाहर खड़े थे, अंदर आ गए। याकूब उनके पीछे थे, सीने पर बँधी वो पोटली अब भी उनके साथ थी, और उनकी लाठी फ़र्श पर टक-टक नहीं कर रही थी — वो रुकी हुई थी।
"इलाही बक्श," याकूब ने धीरे से कहा, "मेरे अब्बा।"
"हाँ," दादी ने कहा। "तेरे अब्बा। और मेरे भाई। दोनों ने उस दुकान पर एक काम शुरू किया था, जो उस ज़माने में पागलपन लगता था। बड़े बाज़ार की दुकानें कहती थीं — टूटी साइकिलें गलियों में छोड़ दो, लोग नई खरीद लेंगे। पर ये दोनों कहते थे — टूटी चीज़ फेंकने से कब तक भागोगे? साइकिल के टूटे पहिये को जोड़ना, किसी के बारह रुपये बचाना, और उसके साथ एक बात जोड़ना — कि अगर आज तूने किसी टूटी चीज़ को दोबारा चलाया, तो ज़िंदगी में भी कुछ टूटा हो तो उसे जोड़।"
वो अपनी कुर्सी पर लौटीं और बैठ गईं।
"घंटी," उन्होंने कहा, "उन दोनों ने नहीं बनाई थी। ये तो बहाना था। घंटी तेरे परदादा ने अपने हाथ से ढाली थी, रात-रात भर जागकर, और उस पर ये फूल भी उसी ने खोदा था। पर वो मानते थे कि घंटी असली तब होगी जब उस पर कोई भरोसा टिका हो। इसीलिए जिस दिन दुकान पर पहला ग्राहक आया, जिसने कहा कि मेरी साइकिल तो ठीक हो जाएगी पर मेरा बेटा पढ़ेगा कि नहीं — उस दिन तेरे परदादा ने ये घंटी उसके सामने मेज़ पर रखी और कहा — देख, ये बजी तो तेरा काम होगा, नहीं बजी तो मेरा भरोसा झूठा।"
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