The Mysterious Bell – Chapter 776
मैंने छोटे ताले को उठाया। ठंडा था। भारी। अपनी छोटी सी शक्ल में उतना ही वज़नी जितना कोई पत्थर हो।
"पापा," मैंने कहा। "आपने कहा था कि यह ताला उस रात उस औरत के कमरे में उस लकड़ी के बक्से पर था।"
"हाँ।"
"तो आप जानते हैं इसके अंदर क्या है।"
"मैंने कभी खोला नहीं," पापा ने कहा।
"पर आप जानते हैं।"
पापा रुके। फिर उन्होंने कहा, "मैंने खुरचते हुए सुना है। बाईस साल से। रात में। जब घर में सब सो जाते हैं।"
मेरी रीढ़ में कुछ ठंडा उतरा।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा और सिर्फ़ इतना कहा, "अंकुश।"
मैंने ताले को मेज़ पर रख दिया और अपने घुटने के बल बैठ गया, पापा के सामने।
"पापा।" मेरी आवाज़ धीमी थी। "अब मैं आपसे एक बात पूछूँगा और आपको जवाब देना है। सच। सिर्फ़ सच। अगर आज झूठ होगा, तो ये ताला नहीं खुलेगा। पर अगर आप अपना डर बोल देंगे, तो ये ताला खुद खुलेगा।"
पापा ने आँख बंद कर ली।
"पूछ।"
"उस रात। जब काजल को आपने भारद्वाज भवन में देखा। आपने चंद्रेश सक्सेना के दफ़्तर में अंगूठा लगाया। क्यों?"
कमरा पूरी तरह चुप हो गया।
मैंने सुना, दूर कहीं, मशीन की आवाज़ जैसे रुक गई हो। या मेरे कानों ने उसे रोक दिया हो। पर उस वक़्त मेरे कानों में सिर्फ़ पापा की आवाज़ थी।
"क्योंकि मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था।" उनकी आवाज़ काँप रही थी, और शुरू में वो फटी जैसी थी, फिर वो साफ़ होती गई। "तेरी माँ की जाँच बंद हो गई थी। काजल के स्कूल की फ़ीस बाकी थी। तेरे दुकान के काग़ज़ अटके थे। और उस आदमी ने मुझे बैठाकर बहुत शांति से कहा कि तुम्हारे पास सिर्फ़ एक अंगूठा है जो सब ठीक कर सकता है।"
उन्होंने आँखें खोलीं।
"मैंने उसे नहीं पढ़ा। मैंने सिर्फ़ नीचे पट्टी पर अपना अंगूठा लगाया। और मुझे पता था यह ग़लत है। मुझे बड़ी बी का चेहरा याद था, जिसने मुझे बचपन में कहा था — इस घर में कभी कोई काग़ज़ बिना पढ़े मत छूना। और मैंने छुआ। और उस रात के बाद मैं हर रोज़ उस अंगूठे के निशान से मरता रहा।"
Уसका शरीर काँपने लगा।
"मैंने अपने बेटे को ईमानदारी सिखाई थी, अंकुश। और मैंने खुद सबसे पहला काग़ज़ गंदा किया। इसलिए बाईस साल मैं चुप रहा। क्योंकि जब आदमी का अपना अंगूठा उसकी सबसे ऊँची सीख को झूठा कर दे, तो वो बोलना छोड़ देता है। डर से नहीं। शर्म से।"
वो मेरे सामने झुक गए। और उनका माथा मेरे कंधे पर आ गया।
और उसी पल — जब उनका माथा मेरे कंधे पर था, और माँ का हाथ उनकी पीठ पर था, और घर की सारी हवा एक साथ रुकी हुई थी — छोटा लोहे का ताला मेज़ पर `खट` से खुल गया।
ना किसी ने चाबी डाली।
ना किसी ने हाथ बढ़ाया।
वो अपने आप खुला। जैसे बाईस साल से साँस रोके बैठा हो और अब आख़िरकार उसे छोड़ दिया गया हो।
माँ ने दीये की बाती उँगली से दबाई और रोशनी कुछ बड़ी हो गई। पापा का माथा मेरे कंधे से हटा, हम तीनों ने झुककर देखा।
ताले के ढक्कन के नीचे, पतली सी जगह में, कुछ था।
सिर्फ़ दो चीज़ें।
एक मोटी, पीली पड़ी, किसी ज़माने की डायरी — जिसकी जिल्द बीच से उखड़ी हुई थी और पन्ने कोनों से मुड़े हुए थे।
और उस डायरी के नीचे एक लोहे का छोटा डिब्बा।
न कोई सोना, न कोई हीरा, न कोई काग़ज़। सिर्फ़ ये दो।
टिंकू, जो अब तक दरवाज़े के बाहर था, अंदर आ गया था और उसने झाँककर कहा, "बस यही? मुझे तो लगा कोई खज़ाना होगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
मैंने डायरी उठाई। मोटी, भारी। हाथ में पकड़ते ही लगा जैसे कोई इंसान हथेली पर बैठ गया हो।
पापा ने छोटा डिब्बा उठाया और उसे खोला।
डिब्बे में काग़ज़ नहीं था। डिब्बे में एक फोटो थी — काली-सफ़ेद, मुड़ी, पीली पड़ी। फोटो में एक आदमी खड़ा था, एक पुरानी साइकिल के साथ। साइकिल का हैंडल पकड़े हुए। कोट पहने हुए। मुँछें बड़ी। आँखें तेज़। और उस साइकिल के हैंडल पर — एक पीतल की घंटी।
और वो घंटी मेरी जेब में रखी घंटी से, बिल्कुल, न ऐसी दिख रही थी, न अलग। एक ही आकार। एक ही रंग। एक ही फूल का निशान।
पापा ने फोटो हाथ में लेकर देखी और उनकी आवाज़ निकल गई, बस एक शब्द में, जैसे अंदर से कोई बच्चा बोल रहा हो —
"दादा।"
मेरे पैरों तले ज़मीन चरमराई। मैंने फोटो को ध्यान से देखा। वो आदमी। वो साइकिल। वो घंटी।
और दीये की पीली रोशनी में मुझे कुछ और दिखा — उस आदमी के सीने पर, बाईं तरफ़, एक छोटी सी चीज़ लटकी थी।
"ये क्या है?" मैंने फोटो पर उँगली रख दी।
पापा ने नज़दीक से देखा और उन्होंने धीरे से कहा, "चाबी।"
"चाबी?"
"जैसी तेरे गले में है।" पापा ने मेरी तरफ़ देखा। "बिल्कुल वैसी।"
मैंने अपनी गले की पुरानी चाबी छुई। ठंडी थी। और फिर मैंने फोटो पर वो छोटी चीज़ फिर देखी और मुझे लगा ज़िंदगी में पहली बार मेरे पास कुछ है जो अपना रास्ता खुद बता रहा है।
"अंकुश," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ खुश थी, क्योंकि टिंकू का डर अच्छी तरह से मज़ाक में छिप जाता है। "ये डायरी भी मेरी कॉपी जैसी है। आधी अधूरी। पीछे के पन्ने फटे हुए हैं।"
मैं हँसा नहीं।
टिंकू ने मुझे देखा और उसकी हँसी धीमी हो गई और उसने अपना मुँह बंद कर लिया। क्योंकि जब बड़ों के चेहरे पर वो भाव हो जो मैं अभी नहीं बता सकता, तो बच्चे अपने आप चुप हो जाते हैं।
मैंने डायरी खोली।
जिल्द चरमराई। पन्ने बहुत पुराने थे, किसी ने उन्हें छुआ भी नहीं था। हर पन्ना अलग तरह का सूखा, अलग तरह की पीली। मैंने उसे धीरे-धीरे पलटा।
पहला पन्ना।
किसी ने नीली स्याही से लिखा था, और लिखाई साफ़ थी — जैसी कोई आदमी अपनी ज़िंदगी की सबसे ज़रूरी बात लिखता है और उसे काँपने नहीं देता।
"घंटी दो नहीं थी।
घंटी एक थी।
उसका दूसरा हिस्सा उसके गले में धड़कता है जिसे वो सबसे ज़्यादा चाहता था।"
मैंने होंठ हिलाए पर आवाज़ नहीं निकली। मैंने वो लाइन दोबारा पढ़ी। तीसरी बार। फिर मैंने आगे पढ़ा।
"अगर तुम यह पढ़ रहे हो, तो मतलब घंटी तुम्हारे पास पहुँच गई। तुम मेरे वंश में से हो। और तुम्हें जानना चाहिए कि यह घंटी कभी एक ही रही। मैंने उसे दो नहीं किया। मैंने उसका एक हिस्सा अपने सीने पर बाँधकर ज़िंदा रखा और दूसरा हिस्सा—"
लिखाई यहाँ घसीटती जैसी हो गई थी, और नीली स्याही फैल गई थी, जैसे पुरानी आँखों की तरह। और मुझे लगा वो लिखने वाले का हाथ काँप और कलम रुक गई हो।
"कहाँ?" टिंकू ने पूछा, मेरे पीछे पाँव उठाकर झाँकते हुए।
"नहीं लिखा," मैंने कहा।
"क्यों नहीं लिखा?"
"पता नहीं।"
और फिर मैंने डायरी का दूसरा पन्ना पलटा। उस पर भी लिखा था, पर सिर्फ़ एक लाइन। और वो लाइन मेरे दिल में चुभ गई —
"अगर कभी दोनों हिस्से अलग होकर भी न मिलें, तो भी उनका एक होना बंद नहीं होता। सिर्फ़ उनकी आवाज़ धीमी हो जाती है। और धीमी आवाज़ सबसे ज़्यादा चुभती है।"
मैंने आँखें ऊपर कीं। दीवार पर दीये की लंबी परछाईं नाच रही थी। पापा मेरे बगल में खड़े, माँ उनके पीछे। काजल दरवाज़े पर। मीरा सीढ़ी के पास। टिंकू मेरे पीछे।
और मैं — मैं डायरी में पन्ने पलट रहा था। तीसरा। चौथा। पाँचवाँ।
कुछ पन्ने फटे थे। कुछ पन्नों पर सिर्फ़ तारीख़ थी और लिखने की जगह खाली। कुछ पर अधूरे वाक्य थे — "आज बाज़ार में हल्ला था…" और आगे कुछ नहीं। "याकूब आया था और मैंने उससे—" और फिर सिर्फ़ नीली स्याही का धब्बा।
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