The Mysterious Bell – Chapter 773
और उस चुप्पी में मुझे एक बात साफ़ सुनाई दी, जो किसी ने नहीं कही थी — कि हम अब तक एक ही चीज़ के चारों तरफ़ घूम रहे थे, और वो चीज़ नाम नहीं थी। वो चीज़ डर थी। हर आदमी यहाँ अपना-अपना डर छिपाए बैठा था — माँ काग़ज़ का, पापा अंगूठे का, याकूब चाचा लिफ़ाफ़े का, उस्ताद आग की रात का, और मैं…
मैं? मेरा डर क्या था?
मेरा डर ये था कि सब कुछ जुड़ जाने के बाद भी कुछ बचेगा नहीं। कि मैं सब जोड़ दूँगा और फिर भी ये घर वैसा नहीं होगा जैसा एक बार था। और मुझे ये बात किसी को नहीं बतानी थी, खासकर खुद को।
"अब मैं कुछ कहूँ?" मीरा ने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो खड़ी थी, एक हाथ कूल्हे पर, दूसरे में अपनी पुरानी कलम। कमरे की लाइट उसके चेहरे पर पड़ रही थी और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले भी कई बार देखी थी — जल्दबाज़ी। सिर्फ़ जल्दबाज़ी नहीं। बेचैनी।
"कहो," मैंने कहा।
"ये नाम," उसने कहा और मेज़ पर रखे ताले की तरफ़ इशारा किया, "अब हमें पता है। पर नाम से क्या होगा? सुबह सात बजे मशीन आ रही है। मशीन नाम नहीं पढ़ती। मशीन दीवार पढ़ती है। बच्चों, हमारे पास सवा घंटा है — नहीं, इससे भी कम। मुझे घड़ी देखने की ज़रूरत नहीं, मेरे पेट में गड़बड़ हो रही है।"
"मीरा," काजल ने कहा, "तुमने अभी-अभी खाया नहीं था।"
"भूख नहीं है," मीरा ने कहा। "ये डर है जो पेट में बैठकर घड़ी का काम कर रहा है।"
मैंने अपना मोबाइल उठाया। स्क्रीन पर समय था — सवा छह बजे के आसपास। मैंने स्क्रीन बंद कर दी।
"मीरा ठीक कह रही है," उस्ताद ने कहा। "नाम मिल गया। पर नाम से ताला नहीं खुलता। ताला खुलने के लिए ताले का असली मालिक चाहिए।"
"ताले का असली मालिक तो हमारे परदादा हैं," काजल ने कहा। "और वो नहीं हैं।"
"तो मालिक का हक़ किसके पास है?" याकूब चाचा ने पूछा।
माँ ने धीरे से कहा, "औरत के पास।"
सब फिर उनकी तरफ़ देखने लगे।
"बाईस साल मैंने सोचा," माँ ने कहा, "कि वो काग़ज़ मेरे ससुर ने किसी को दिया था, और वो किसी ने मेरे संदूक के नीचे दबा दिया। पर आज जब मैंने देखा कि ताले पर वही नाम खुदा है, तो समझ आया — काग़ज़ नीचे नहीं पड़ा था, अंकुश। काग़ज़ जान-बूझकर नीचे रखा गया था। जिसने रखा, वो चाहता था कि कोई उसे ढूँढे — पर ऐसा कोई न ढूँढे जो उसे समझ न सके।"
"औरत," मैंने कहा।
"हाँ," माँ ने कहा।
मैंने मेज़ से घंटी उठाई। वो ठंडी थी। मैंने उसे हाथ में लिया और कान के पास लाया, जैसे कोई उसे बजाए बिना सुन सकता हो।
और मैंने घंटी से पूछा, बहुत धीरे से, इतना धीरे कि कमरे में सिर्फ़ माँ ने सुना।
"अब क्या?"
घंटी कुछ देर चुप रही। और फिर, बिना बजे, बिना हिले, उसके भीतर से एक आवाज़ आई — रूखी, छोटी, तीन शब्दों से ज़्यादा नहीं।
"सामने वाला हाथ।"
मैंने घंटी नीचे की। मुझे समझ आ गया था।
"अंकुश?" काजल ने कहा। "तू क्या सोच रहा है?"
"मैं पहले उस औरत से मिलूँगा," मैंने कहा, और अपनी जैकेट उठाई, "जो रोज़ सुबह झोपड़ी के बाहर पत्थर पर पाँच रोटियाँ रख जाती है।"
"क्यों?" याकूब चाचा ने कहा।
"क्योंकि पचास साल से वो उन्हीं हाथों से रोटी रख रही है," मैंने कहा, "जिन हाथों ने उस रात कुछ उठाया था। और आज वो पीपल के नीचे बैठी हमारी राह देख रही है।"
मैंने घंटी अपनी जेब में रखी। फिर रुका, पलटा, और माँ की तरफ़ देखा।
"माँ," मैंने कहा, "आज से जो भी सच होगा, वो सबके सामने होगा। सबके सामने। अब अलमारी में नहीं। ठीक है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर मैंने उनकी आँखों में वो चीज़ पहली बार देखी जो मैंने बीस साल में कभी नहीं देखी थी — हल्की सी मुस्कान। बहुत थकी हुई, बहुत छोटी, पर मुस्कान।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "पर एक बात सुन ले। जो काग़ज़ मेरी कॉपी के पिछले हिस्से में है — उसे मैं लाई हूँ। यहाँ। मेरी कमर में।"
मैं चौंका।
"अभी?"
"तूने सोचा मैं बाईस साल सिर्फ़ छिपाती रही?" उन्होंने कहा। "मैं हर रोज़ उसे देखती थी, अंकुश। हर रोज़। हर बार जब कोई बाहर से दरवाज़ा खटखटाता, मैं उसे छूकर देखती कि वो अभी भी है। अब वो मेरी कमर में है और मैं उसे लेकर तेरे साथ चलूँगी।"
"माँ, वहाँ मशीन है—"
"मैं मशीन से नहीं लड़ने जा रही," उन्होंने कहा। "मैं उनके सामने वो काग़ज़ खोलने जा रही हूँ जिसे मैंने बाईस साल छिपाया। और अगर वो मुझे रोकने आए, तो मैं उन्हें ये बताऊँगी कि मैं वो औरत नहीं हूँ जो डर के मारे अंगूठा लगाती है। मैं सुशीला यादव हूँ।"
काजल ने कहा, "माँ, मैं भी चलूँगी।"
"नहीं," माँ ने कहा। "तू काजल की तरफ़ मत देख, अंकुश। तू उसके साथ अस्पताल जाएगी।"
"माँ—"
"काजल," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो सख़्ती थी जो सिर्फ़ माँ की आवाज़ में होती है — और साथ में कुछ और भी, जो सिर्फ़ उस रात में होता है जब माँ को पता हो कि बेटी की ज़िद जानलेवा है। "तेरे पास चार गोली हैं। दो दिन। नई खेप रुकी है। तू अस्पताल जाएगी, डॉक्टर इसरानी के पास बैठेगी, और वहाँ से हिलेगी नहीं। अगर मैं सुनूँ कि तू गली में आई, तो मैं उसी वक़्त वहाँ से उठकर घर आ जाऊँगी। और तू जानती है कि मैं ऐसा कर सकती हूँ।"
काजल की आँखें भर आईं। पर वो माँ की बेटी थी। उसने गर्दन हिलाई, और उस हरकत में हाँ से ज़्यादा ठीक है था।
मैंने अपना हाथ बढ़ाया और माँ की कमर से लिपटा कपड़े का पुलिंदा लिया। बहुत हल्का था। मैंने उसे जेब में रखा।
फिर मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा।
उस्ताद मेरे साथ आए। याकूब चाचा उठे, फिर रुक गए।
"तुम नहीं चाचा," मैंने कहा। "आप यहाँ रहिए। माँ के साथ।"
"मैं किसी की रखवाली नहीं करता," याकूब चाचा ने कहा कड़क आवाज़ में, और उनकी आवाज़ में पचास साल पुरानी वो हठ थी जो कोई नहीं बदल सकता था। "मैंने पचास साल अपने सीने पर वो पोटली रखी है। आज रात वो खुलेगी, और मैं उस वक़्त किसी के पीछे नहीं बैठूँगा।"
मैं उन्हें देखता रह गया।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर एक शर्त है। आप अपनी लाठी उठाइए। और अगर मैं कहूँ कि रुक जाइए, तो आप रुक जाइएगा। भाई की बात तो माननी पड़ती है।"
याकूब चाचा ने पलक नहीं झपकी।
"किसका भाई?" उन्होंने कहा।
"मेरा," मैंने कहा, और मुस्कुरा दिया। "अभी-अभी बना हूँ। पचास साल की देरी है, पर देर आए दुरुस्त आए।"
कमरे में पहली बार हल्की हँसी फैली। उस्ताद ने कहा, "ये लड़का तंत्र से नहीं, बकबक से काम निकालेगा।" और माँ ने कहा, "उसके बाप का ही बेटा है।" पापा ने कुछ नहीं कहा, पर उनके चेहरे पर वो थकी हुई सुकून थी जो आदमी के चेहरे पर तब आती है जब वो बहुत दिनों बाद अपने ही घर में घुटनों के बल बैठा हो और कोई उन्हें उठने को न कह रहा हो।
मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर आधी शाम थी। गली में पीली रोशनी आ रही थी — पीपल के नीचे जलती तपेरी की, जो कोई बूढ़ा रोज़ जलाता था। हवा में मिट्टी की गंध थी और दूर कहीं मशीन की धीमी घरघराहट।
मैंने एक कदम निकाला और रुक गया।
क्योंकि पीपल के नीचे, चबूतरी के ठीक सामने, वो खड़ी थी।
ओढ़नी वाली बूढ़ी औरत। उसी ओढ़नी में, वही झुर्रियों भरा चेहरा, पर आज उसके हाथ खाली नहीं थे। आज उसने अपना हाथ ऊपर उठाया हुआ था — और उस उठे हुए हाथ की कलाई पर मुझे वो दिखी जो मैंने पहले कभी इतनी साफ़ नहीं देखी थी।
हरी शीशे की चूड़ी।
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