The Mysterious Bell750 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 750

7 min read November 5, 2026

मैंने उनकी तरफ़ देखा। माँ का चेहरा पहले कभी ऐसा नहीं दिखा था।

"उस्ताद।" माँ ने कहा। "आप आइए। आपने पचास साल इस नाम को चुपचाप रखा है। आप ही बोलिए।"

उस्ताद ने सिर उठाया। उनकी आँखें भरी हुई थीं।

"सुशीला बेटी।" उन्होंने कहा। "मैं बोलूँ, या ये बोले?"

"आप।" माँ ने कहा। "क्योंकि जो नाम ये आज तक नहीं बोल पाए, वो नाम इनके गले में आज ही नहीं, पच्चीस साल से फँसा हुआ है।"

उस्ताद ने एक लंबी साँस ली।

"अंकुश।" उन्होंने कहा। "तेरे दादा जगदीश यादव का एक और नाम था।"

मैंने देखा कि पापा की आँखों से पानी बह रहा है, पर वो होश में हैं। वो सुन रहे हैं।

"जो काग़ज़ तूने जली रसीद में देखा।" उस्ताद ने कहा। "उस पर तेरे पापा का अंगूठा था। पर नाम उस आदमी का लिखा था जो दुकान का मालिक था, और जिसकी दुकान तेरे दादा ने ज़िम्मेदारी में ली थी। और उस आदमी का नाम…"

उस्ताद ने एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं।

"…उस आदमी का नाम शंकरलाल था।"

मैं जम गया।

"शंकरलाल?" मैंने दोहराया। "मेरे पापा का नाम शंकर है।"

"हाँ।" उस्ताद ने कहा। "और यही उस घर का सबसे बड़ा झूठ है। तेरे पापा का नाम उस आदमी के नाम पर रखा गया था, ताकि जब कभी काग़ज़ पर वो नाम आए, तो लोग समझें कि ये उसी घर का नाम है। जबकि सच यह था कि शंकरलाल तेरे दादा का बड़ा भाई था, और उसने अपना नाम तेरे दादा के नाम पर लिखवा रखा था, हर काग़ज़ पर, हर जगह।"

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

उन्होंने आँखें बंद कर लीं।

"तो पापा…" मैंने धीरे कहा। "तो आपका नाम आपका नहीं है?"

पापा ने आँखें खोलीं। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर साफ़।

"मेरा नाम मेरा है।" उन्होंने कहा। "पर वो मेरा नहीं है। वो उस आदमी का है जिसने हमारी दुकान ली, हमारा हिसाब रखा, और फिर हमें उस काग़ज़ पर अंगूठा लगवाया जिसमें लिखा था कि दुकान उसकी है।"

मैंने माथा अपनी हथेली पर रख लिया।

मेरे अंदर एक बहुत पुरानी चीज़ हिल रही थी। कोई इमारत नहीं, कोई काग़ज़ नहीं, कुछ और। मेरे अपने नाम की जड़। मैं चौबीस साल से अंकुश यादव था, और मुझे कभी पता ही नहीं था कि मेरा उपनाम किसी और के नाम से चिपका है।

"तो कल सुबह जो औरत आएगी…" मैंने कहा।

"वो तेरे पापा की बहन है।" माँ ने कहा। यह बात उन्होंने पापा की तरफ़ देखकर कही, जैसे उनसे पूछ रही हों — मैं बोल सकती हूँ ना? "और उसका नाम तेरे पापा के सामने आज तक कोई नहीं बोला, क्योंकि उस दिन से उनकी ज़ुबान पर ताला लगा हुआ है।"

"पर वो शंकरलाल से क्या जुड़ी है?" मैंने पूछा।

उस्ताद ने सिर हिलाया।

"यही तो वो बात है।" उन्होंने कहा। "जो आज रात बोली जानी है। शंकरलाल सिर्फ़ बड़ा भाई नहीं था। उसने तेरे दादा की बहन…"

उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।

"…उसने तेरे दादा की बहन से ब्याह कर लिया था।"

आँगन में सन्नाटा छा गया।

"तो फिर वो औरत…" मैंने धीरे कहा।

"वो औरत मेरी बहन है।" पापा ने कहा। उनकी आवाज़ ज़मीन से आ रही थी। "और वो शंकरलाल की बीवी थी।"

मुझे लगा मेरे सिर के ऊपर से पूरा आसमान हट गया।

"तो कल जो औरत आएगी, वो आपकी बहन है… और वो शंकरलाल की बीवी है?"

"हाँ।"

"और आपने उसका नाम पच्चीस साल से क्यों नहीं लिया?"

पापा ने आँखें बंद कर लीं।

"क्योंकि अंकुश, मेरे हाथ से उसका नाम आख़िरी बार तब हटा था जब उसके सामने मैंने अपने ही हाथ से उसी काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था।" उन्होंने कहा। "और उसके बाद वो घर से चली गई। और मैं उसे मरा हुआ मानकर जीने लगा। क्योंकि मरा हुआ मानकर जीना, ज़िंदा रहने वाले के चेहरे को रोज़ देखने से आसान था।"

उनकी आवाज़ टूट गई।

माँ उनके पास बैठ गईं और उनका सिर अपनी गोद में ले लिया।

"अब तू चुप नहीं रहेगा।" माँ ने कहा। "सुन रहा है, शंकर? अब तू चुप नहीं रहेगा। अब तेरा बेटा तेरे सामने बैठा है और वो आज तेरा नाम उस काग़ज़ से नहीं, उस औरत के सामने से वापस लाएगा।"

पापा ने अपना हाथ ऊपर करके माँ का हाथ पकड़ा।

और तभी मेरी जेब में घंटी फिर बजी।

इस बार एक बार। सिर्फ़ एक बार। और जब बजी, तो उसकी आवाज़ मुझे उस्ताद के घर से आती सुनाई दी — दूर से, हल्की, जैसे किसी पुरानी सिलाई मशीन के पास कोई घंटी अपने आप बज गई हो।

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।

उस्ताद ने भी देखा।

उनका चेहरा एकदम से बदल गया।

"ये क्या था?" मैंने पूछा।

"वो दूसरी घंटी थी।" उन्होंने कहा। "और ये तभी बजती है जब…"

वो बोलने ही वाले थे कि आँगन के बाहर, गली से, टिंकू की आवाज़ आई।

"उस्ताद! उस्ताद!"

हम सब दौड़कर गेट पर आए।

टिंकू हाँफ रहा था। उसके जूते में कीचड़ था और उसके माथे पर खून की एक पतली लकीर थी, जैसे दौड़ते हुए किसी पत्थर से छू गया हो।

"उस्ताद।" उसने कहा। "पीपल के नीचे, बें… बेंच पर कोई बैठा है।"

"कौन?" मैंने पूछा।

टिंकू ने अपनी आँखें बड़ी करके मेरी तरफ़ देखा।

"कोई औरत है।" उसने कहा। "बूढ़ी औरत। सिर पर ओढ़नी है और… और कलाई पर हरी चूड़ी है। वो बैठी है और… और वो तुम्हारा नाम पूछ रही है।"

मेरा पूरा शरीर ठंडा हो गया।

"मेरा नाम?"

"हाँ।" टिंकू ने कहा। "और उसने कहा है कि मैं यहाँ बैठकर रोज़ सुबह रोटी रखती थी। उसने कहा है कि उसका हिसाब पूरा है अब।"

मैंने पीछे पलटकर देखा।

पापा आँगन में खड़े थे। उनके चेहरे पर पहली बार कुछ ऐसा था जो मैंने कभी नहीं देखा — जैसे उनकी आँखों में कोई चीज़ टूट रही हो।

"माँ।" मैंने कहा। "मैं जा रहा हूँ।"

"अंकुश।" पापा ने कहा।

मैं रुक गया।

"मैं आ रहा हूँ।" उन्होंने कहा। "पर…"

"अभी नहीं।" मैंने कहा। "आप अभी यहीं बैठिए। माँ के पास। काजल, पापा का हाथ मत छोड़ना।"

काजल ने सिर हिलाया। उसकी आँखों में आँसू थे, पर वो रो नहीं रही थी। उसने पापा का हाथ पकड़ा और मुझे देखा।

"भैया।" उसने कहा। "छह बजे तक लौट आना। वरना माँ को पता है कि मैं क्या करूँगी।"

मैं हँसा। उस वक़्त हँसना सबसे मुश्किल काम था, पर मैंने किया।

"चार बजे तक आ जाऊँगा।" मैंने कहा।

मैं गेट से बाहर निकला। उस्ताद पीछे थे। मीरा ने कैमरा उठा लिया था, इस बार उसने मुझसे कुछ नहीं पूछा। नदीम भी साथ आया और वो अपना बंडल सीने से नहीं हटा रहा था।

टिंकू आगे-आगे चल रहा था।

गली में हवा अचानक ठंडी हो गई थी, जैसे किसी ने पीछे से पानी का छींटा मार दिया हो।

और मेरी जेब में घंटी फिर बजी।

बहुत धीरे।

और फिर भी ऐसे, जैसे मेरे ही कान में कोई बोल रहा हो।

"घर का सच बाहर आएगा।" घंटी ने कहा। "और जो बाहर आएगा…"

वो रुक गई।

मैंने अपना कदम रोक लिया।

"…वो सबका होगा।" घंटी ने कहा।

और फिर चुप हो गई। इतनी चुप कि मुझे लगा जैसे उसने पच्चीस साल की बात कहकर ताला लगा दिया हो।

मैंने सामने देखा।

गली के आख़िर में पीपल का पेड़ खड़ा था, और उसकी जड़ के पास बनी चबूतरी पर एक साया बैठा था। लालटेन की पीली रोशनी उसके ऊपर पड़ रही थी।

और मैं दौड़ पड़ा। नहीं, दौड़ा नहीं। मैं चला, तेज़ चला, क्योंकि अगर मैं दौड़ता तो मेरी जेब से घंटी गिर पड़ती। और उस वक़्त मुझे घंटी नहीं खोनी थी।

उस वक़्त मुझे सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए थी — उस साये के चेहरे पर नज़र डालनी थी, और देखना था कि क्या वही औरत बाईस साल से रोज़ सुबह मेरे बिजलीघर के पीछे की झोपड़ी में रोटी रख जाती थी।

क्योंकि अगर वो वही थी, तो मेरे पास उससे एक ही सवाल था।

और वो सवाल यह नहीं था — तुम कौन हो।

सवाल यह था — तुमने इतनी देर क्यों लगा दी।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho