The Mysterious Bell – Chapter 748
कमरे में सन्नाटा छा गया।
और मेरी जेब में घंटी ने उस वक़्त एक शब्द कहा — बहुत धीरे, लगभग फुसफुसाकर, जैसे कहीं दूर से कोई बोल रहा हो।
"दो।"
मैंने घंटी को जेब से बाहर निकाला। वो मेरी हथेली में ठंडी थी और उसकी सतह पर एक ऐसा निशान उभरा था जो पहले नहीं था — दो छोटे गोले, एक-दूसरे से सटे हुए।
"दो।" मैंने दोहराया।
"दो क्या?" मीरा ने पूछा।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"दो औरतें।" मैंने कहा।
पापा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"बाप रे।" उन्होंने धीरे कहा।
उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी और खींचकर अपने पास बैठा लिया।
"अंकुश।" उन्होंने कहा। "अब ध्यान से सुन। जो बात मैं पच्चीस साल से नहीं बोला, वो आज बोलता हूँ। और बोलने के बाद मैं तुझसे एक वादा माँगूँगा।"
"क्या?"
"जो औरत कल सुबह रणवीर के साथ आएगी, उसका नाम मेरे सामने कोई नहीं लेगा। मेरे होते हुए नहीं।"
उनकी आँखों में पानी आ गया था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"क्योंकि अंकुश, वो औरत मर चुकी है। पच्चीस साल पहले मेरे सामने मर गई थी। और जो औरत कल सुबह आएगी, वो उसकी परछाई है। और परछाई से नाम माँगना, अपने ही घर को उजाड़ना है।"
तभी बाहर से आवाज़ आई।
नदीम ने फाटक की तरफ़ देखा।
"उस्ताद।" उसने कहा। "बाहर कुछ है।"
हम दौड़कर फाटक तक गए।
बाहर की गली में, काली गाड़ी वहाँ नहीं थी। कोई सफ़ेद गाड़ी वहाँ नहीं थी। रात का अंधेरा था, और उस अंधेरे में, ज़मीन पर, पाँच-छह पीले पन्ने एक सीध में रखे हुए थे — जैसे किसी ने रास्ता बनाया हो।
पहला पन्ना उठाया तो उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, बड़ी सी और साफ़ लिखाई में।
"कल सुबह नाम नहीं, औरत आएगी। देख लेना, तुम्हारी गली किसका नाम लेती है।"
दूसरे पन्ने पर लिखा था — "तेरे पापा का नाम भी इसी चबूतरी पर मिटेगा।"
तीसरे पन्ने पर सिर्फ़ दो शब्द थे और वो दो शब्द मेरी रीढ़ की हड्डी में उतर गए।
"माँ मरेगी।"
मैंने वो पन्ना मरोड़कर जेब में डाल दिया।
"टिंकू।" मैंने पुकारा।
टिंकू दौड़कर आया।
"अभी गली में जा। जो कुछ पता चले, उस्ताद से कहना। भाग।"
वो भागा।
मीरा ने कैमरा बंद कर दिया और सीधे मुझे देखा।
"अंकुश।"
"हूँ।"
"वो माईक और कैमरा मेरा है। और मेरी आवाज़ भी मेरी है।" उसने कहा। "कल सुबह मैं चुप नहीं रहूँगी।"
उस्ताद पीछे से आए और उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा।
"अंकुश।" उन्होंने कहा। "घंटी ने आज रात दो कहा है। तेरी घंटी में अंक नहीं जुड़े। और जब अंक नहीं जुड़ते, तब घंटी अकेले नहीं बोलती।"
उन्होंने मेरी हथेली खोली और उसमें देखा।
"इसका मतलब ये है कि तेरी जेब में अब भी कुछ ऐसा है जो तेरे पास है, पर तेरा नहीं।"
मैंने अपनी जेब टटोली।
उसमें घंटी के अलावा एक और चीज़ थी — पीतल का वो छोटा टुकड़ा जो ट्रंक से मिला था, जिस पर वही दो लकीरें और बीच में बिंदु था।
और अब उस टुकड़े पर एक नई लकीर उभर आई थी।
मैंने उसे उस्ताद को दिखाया।
उस्ताद ने देखा। फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा और उनकी आँखें भर आईं।
"ये…" उन्होंने धीरे कहा। "ये मेरी माँ की अँगूठी का निशान है।"
वो झुककर बैठ गए।
"आज रात हमें बहुत जागना पड़ेगा।" उन्होंने कहा। "क्योंकि कल सुबह सात बजे जो आएगा, वो सिर्फ़ मशीन नहीं होगी।"
॥
बिजलीघर की लोहे की छत से टपकती पानी की आवाज़ भी अचानक बंद हो गई थी। रणवीर की सफ़ेद गाड़ी की गड़गड़ाहट दूर तक गई, गली के मोड़ से भी आगे निकली, और फिर कुछ नहीं। बस एक ऐसी चुप्पी बची जो कानों में हल्की सी सीटी जैसी बजती है। मैं वहाँ खड़ा था और मुझे अपनी साँस बहुत तेज़ सुनाई दे रही थी।
पापा अब भी ज़मीन पर थे। घुटनों के बल। उनकी उँगलियाँ लोहे के बक्से का किनारा पकड़े हुई थीं, जैसे कोई डूबता आदमी किनारा पकड़ता है। उनके हाथ काँप रहे थे — नहीं, काँप नहीं रहे थे, वो काँपने से भी आगे की चीज़ थी। जैसे हाथों ने बहुत देर तक बहुत भारी चीज़ उठाई हो और अब जब छोड़ी है तो उन्हें अपनी ही हड्डियाँ याद नहीं रहीं।
मैं उनके पास बैठ गया।
"पापा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।
"पापा।" मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। ठंडा था। इतना ठंडा कि मुझे लगा मैं किसी औज़ार का हत्था पकड़ रहा हूँ, इंसान का हाथ नहीं।
"यहाँ नहीं रुकेंगे।" मैंने कहा। "उठो। घर चलेंगे।"
मुझे उम्मीद थी कि वो कहेंगे — नहीं, पहले यह करना है, पहले वो करना है। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने इतनी बार मेरी बात काटी थी कि मुझे आदत हो गई थी। पर इस बार उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया। एक छोटा सा सिर हिलाना। और मैं अंदर से काँप गया, क्योंकि मैंने पहली बार देखा कि पापा थक गए हैं। बहुत थक गए हैं।
नदीम ने पीछे से उनका दूसरा हाथ पकड़ा। उस्ताद फाटक पर खड़े थे और उन्होंने बाहर गली में एक नज़र डाली, फिर अंदर आकर कहा, "अंधेरा घना है, पर गली खाली है। चलो।"
हम उन्हें उठाकर बाहर लाए। फाटक के पास वो पीले पन्ने अब भी ज़मीन पर पड़े थे। मैंने उन्हें पैर से नहीं छुआ। मैंने उन्हें वैसे ही छोड़ दिया, जैसे कोई साँप को छोड़ देता है — छूना नहीं, बस नज़र रखना।
बाहर निकलते वक़्त टिंकू दौड़कर आया था, गली से लौटकर, हाँफता हुआ। उसके हाथ में एक पुरानी रिम थी जो उसे रास्ते में पड़ी मिली थी, और उसने मुझे वो पकड़ाने के लिए हाथ बढ़ाया, पर फिर उसकी नज़र पापा पर पड़ी और उसका हाथ बीच में ही रुक गया।
टिंकू पीछे हट गया।
"उस्ताद…" उसने धीरे कहा। "पापा जी का चेहरा…"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
फाटक की लालटेन की रोशनी में उनका चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके चेहरे से खून ही निकाल दिया हो। होंठ सफ़ेद। आँखें खुली, पर कहीं और देख रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे उनकी आँखें किसी ऐसी जगह टिकी हैं जो हम सबको दिखती ही नहीं।
"कुछ नहीं हुआ।" मैंने टिंकू से कहा। "बस थक गए हैं।"
और मैं खुद उस वक़्त झूठ बोल रहा था, ये मुझे पता था। पर उस वक़्त मुझे लगा कि ये झूठ अभी ज़रूरी है। कभी-कभी इंसान को सच के बीच आधा मिनट का झूठ चाहिए होता है, बस इतना कि वो साँस ले सके।
हम गली की तरफ़ चले। रात का अंधेरा गाढ़ा था। पीपल की छाया रास्ते पर ऐसे पड़ी थी जैसे कोई बड़ा हाथ ज़मीन पर रखा हो। शबनम आपा की गुमटी बंद थी, पर उसके बाहर की बेंच पर एक लालटेन जल रही थी, जो किसी ने जान-बूझकर जलाकर छोड़ी थी। मुझे लगा शबनम आपा इस वक़्त भी कहीं जाग रही हैं और हमारा इंतज़ार कर रही हैं।
आधी गली आते-आते पापा रुक गए। अचानक। इतने अचानक कि मीरा उनसे टकरा गई और उसका कैमरा हिल गया।
"पापा?"
उन्होंने मेरा हाथ नहीं छोड़ा, पर मुड़कर मेरी तरफ़ देखा। उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे झुककर सुनना पड़ा।
"अंकुश।" उन्होंने कहा। "उस रात। उस बक्से के सामने। सिर्फ़ मैं और एक औरत थी।"
मैं चुप रहा।
"और उस औरत ने…" पापा की आवाज़ रुक गई। उन्होंने गला साफ़ करने की कोशिश की, पर आवाज़ फिर भी फटी हुई निकली। "उस औरत ने मेरा हाथ पकड़कर काग़ज़ पर अंगूठा लगवाया था। ज़ोर से। मेरी उँगली दबाकर। उसने मुझसे कहा था कि रोओ मत, तुम्हारी औरत का इलाज चल रहा है।"
मेरा सीना भारी हो गया।
"कौन थी वो?" मैंने पूछा।
पापा ने नीचे देखा। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और थोड़ा कसकर पकड़ा।
"वो नाम मैं अब भी नहीं ले सकता।" उन्होंने कहा।
"क्यों?"
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