The Mysterious Bell – Chapter 746
"मैंने तुम्हारा बुलावा नहीं माना।" उन्होंने कहा। आवाज़ रुंधी हुई, पर साफ़। "मैं खुद आया था। अपना नाम मिटाने।"
रणवीर ने एक पल के लिए उनकी तरफ़ देखा।
फिर उसने धीरे से सिर हिलाया, जैसे कोई बच्चे की ज़िद सुनकर हामी भरता है।
"शंकर भाई।" उसने कहा। "नाम मिटाने से कुछ नहीं होता। नाम तो वो मिटाता है जिसके पास काग़ज़ होता है। और काग़ज़ मेरे पास हैं।"
वो आगे बढ़ा।
मैं बीच में आ गया।
उसने मेरी तरफ़ देखा — इस बार नरमी नहीं थी। इस बार सिर्फ़ हिसाब था। जैसे कोई दुकानदार तराज़ू पर चीज़ रखकर सोचता है कि ये कितने की है।
"अंकुश।" उसने कहा। "अभी तुम्हारी उम्र कम है, इसलिए तुम्हें लगता है कि सच बोलना बहादुरी है। बड़े होकर पता चलेगा कि सच बोलना सबसे सस्ता काम है। महँगा काम है — किसी को बचाना।"
फिर वो मेरे कंधे के पास से झुका।
पापा उसके सामने घुटनों के बल बैठे थे। रणवीर ने झुककर अपना हाथ पापा के कंधे पर रख दिया।
मैंने उसका हाथ हटाने के लिए अपना हाथ बढ़ाया —
पर रुक गया।
क्योंकि मेरी जेब में घंटी ने उस वक़्त कुछ कहा। बहुत धीरे। इतना धीरे कि सिर्फ़ मैंने सुना।
"सुन।"
बस एक शब्द। और मैं रुक गया।
रणवीर ने पापा के कंधे पर हाथ रखा और उनके कान के पास झुककर कहा —
"अब बोलिए शंकर भाई। उस औरत का नाम। और मैं सब काग़ज़ आपके हाथ में रख दूँगा।"
॥
पापा चुप थे।
और उस कमरे में वो चुप्पी सबसे तेज़ आवाज़ थी।
लोहे के बक्सों की गूँज, दूर गली से आती किसी कुत्ते की आवाज़, मीरा की दबी हुई साँस, उस्ताद के हाथ में पकड़ी कैंची की धीमी खटक — सब उस चुप्पी के नीचे दब गए थे। मैंने पापा की तरफ़ देखा। घुटने ज़मीन पर, हाथ बक्से के ठंडे किनारे पर, पीठ झुकी हुई, और आँखें — आँखें उस आदमी के जूतों पर टिकी थीं।
जूते बिल्कुल साफ़ थे। इतने साफ़ कि लगता था इस बिजलीघर की राख उन्हें छू ही नहीं सकती।
रणवीर ने पापा के कंधे पर अपना हाथ रखा हुआ था। उँगलियाँ हल्की थीं, जैसे कोई बीमार आदमी को सहारा दे रहा हो। और पापा — पापा कुछ नहीं बोले।
मैंने अपना एक कदम आगे बढ़ाया।
फिर दूसरा।
और मैं उन दोनों के बीच में आ गया। मेरी पीठ पापा की तरफ़ थी और मेरा सीना रणवीर की तरफ़।
मैं उससे बहुत छोटा था। कद में, उम्र में, कपड़ों में, पैसों में — हर चीज़ में। पर उस वक़्त मुझे लगा कि जो चीज़ मेरे अंदर खड़ी थी, वो उसके सफ़ेद कपड़ों से बड़ी थी।
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दिया।
वो मुस्कुराहट उसका सबसे बड़ा हथियार थी। मैं यह जानता था। पूरी गली जानती थी। वो कभी गुस्सा नहीं करता था। वो कभी आवाज़ नहीं उठाता था। वो बस मुस्कुराता था, और उस मुस्कुराहट में इतना ज़हर घुला होता था कि आदमी खुद अपने ही हाथ देखने लगता था।
"बेटा।" उसने कहा। आवाज़ में मक्खन। "तेरे पिता को कुछ नहीं होगा। मैं तो बस उनका बोझ हल्का करना चाहता हूँ।"
"बोझ?" मैंने कहा।
"हाँ।" उसने कहा। "देख, ये पच्चीस साल से इस बोझ को उठाए बैठे हैं। अकेले। किसी से कहा नहीं, किसी को दिखाया नहीं। माँ को नहीं, बेटे को नहीं, बेटी को नहीं। आदमी अकेला जब इतना उठाता है, तो उसकी कमर टूट जाती है। और कमर टूटने के बाद आदमी ठीक से खड़ा नहीं हो पाता। तू तो देख ही रहा है — ये घुटनों पर हैं।"
उसने पापा के कंधे पर हाथ से हल्का दबाया।
"मैं इनसे कुछ बुरा नहीं माँग रहा।" उसने कहा। "बस एक नाम। एक नाम, जो इन्होंने कभी किसी को बताया ही नहीं। जिसका बोझ इनके सीने में पच्चीस साल से पड़ा है। नाम बाहर आ जाएगा तो बोझ हल्का हो जाएगा। और मैं इनके सारे काग़ज़ इनके हाथ में रख दूँगा। सारे। एक भी नहीं रोकूँगा।"
मैंने पीछे हाथ बढ़ाया। मेरी हथेली पापा के कंधे पर पड़ी।
"पापा।" मैंने धीरे कहा। "मैं हूँ ना।"
पापा ने कुछ नहीं कहा। पर उनका कंधा मेरी हथेली के नीचे थोड़ा सा ऊपर उठा। जैसे कोई डूबता आदमी सहारा मिलने पर साँस भरता है।
रणवीर ने यह देखा। उसकी आँखों में कुछ बदला — बहुत थोड़ा, बहुत जल्दी। फिर वो वापस वैसा ही हो गया।
"अंकुश।" उसने कहा। "तू अच्छा लड़का है। मैंने तेरे बारे में सुना है। तेरी दुकान है, तेरी मेहनत है, तेरा नाम है गली में। मैं तुझे बुरा नहीं चाहता। मैं तो चाहता हूँ कि तेरा काम बढ़े, तेरा नाम बढ़े। पर तू इन बातों में पड़ गया जो तेरी उम्र की नहीं हैं।"
"मेरी उम्र की क्या बात है साहब?" मैंने पूछा।
"तेरी उम्र में आदमी साइकिल ठीक करता है।" उसने कहा। "बाप की परछाई नहीं ढोता।"
मैं हँस पड़ा। सच में हँस पड़ा। और मेरी हँसी उन लोहे के बक्सों के बीच अजीब लगी, जैसे किसी श्मशान में कोई गाना गा दे।
"साहब।" मैंने कहा। "मैं साइकिल ठीक करता हूँ। यही मेरा काम है। और मेरा काम मुझे सिखाता है कि जो चीज़ टूटी है, उसे छुपाने से वो जुड़ती नहीं। उसे खोलना पड़ता है। पहले उसकी ज़ंग साफ़ करनी पड़ती है, फिर उसे जोड़ना पड़ता है।"
रणवीर ने सिर हिलाया, जैसे कोई बड़ा आदमी बच्चे की बात सुनकर हामी भरता है।
"अच्छी बात कही।" उसने कहा। "पर एक बात सुन ले। जो चीज़ पच्चीस साल से ज़ंग खा रही है, उसे अगर ज़ोर से खोलेगा, तो वो टूट जाएगी। हाथ में कुछ नहीं बचेगा।"
"तो टूटने दीजिए।" मैंने कहा। "टूट कर ही तो जुड़ेगी।"
उसकी मुस्कुराहट एक पल को पतली हो गई।
और ठीक उसी पल, मेरे पीछे से पैरों की आवाज़ आई।
मैंने पलटकर देखा।
नदीम हकीम आ रहा था। उसके हाथ में काग़ज़ों का बंडल था — तीन गाँठों वाली रस्सी से बँधा, सीने से चिपकाया हुआ, जैसे कोई माँ अपने बच्चे को चिपकाए चलती है। उसका चमड़े का बैग कंधे पर था, और उसकी आँखें — उसकी आँखें डरी हुई नहीं थीं। उनमें वो चीज़ थी जो मैंने बहुत कम लोगों में देखी थी। गुस्सा नहीं। सिर्फ़ एक सीधी, साफ़, ठंडी बात।
वो आकर मेरे बगल में खड़ा हो गया। मेरे और रणवीर के बीच। और उसने रणवीर को देखा — सीधा, आँख से आँख।
"साहब।" उसने कहा। आवाज़ नीची थी, धीमी थी, पर उसमें एक ऐसी सफ़ाई थी कि कमरे की हवा रुक गई। "मेरा नाम नदीम हकीम है। हकीम अली का पोता।"
रणवीर ने उसे देखा।
"हकीम अली?" उसने कहा। "पुराना नाम है।"
"पुराना नाम है।" नदीम ने कहा। "पर पुराना नाम मरा नहीं है। मेरे दादा की डायरी में इस ज़मीन के तीन नाम लिखे हैं। तीन। और तीनों में से एक नाम ऐसा है, जो आज किसी काग़ज़ में नहीं है।"
उसने रुककर रणवीर की तरफ़ देखा।
"वो नाम किसी के सीने में ज़िंदा है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने रणवीर की तरफ़ देखा।
और उस वक़्त, उस एक पल के लिए, रणवीर भारद्वाज मुस्कुराना भूल गया।
बस एक पल। आधी साँस जितना। उसकी आँखों में कुछ ऐसा खुला जो बंद रहना चाहिए था — जैसे किसी बंद कमरे का दरवाज़ा हवा से खुल जाए और अंदर का अंधेरा बाहर दिख जाए। उसकी उँगलियाँ पापा के कंधे पर कस गईं। उसका जबड़ा थोड़ा सा आगे आया।
मैंने सुना। मैंने देखा। और मैंने अपनी जेब में घंटी को ठंडा होते महसूस किया, जैसे उसने भी देखा हो।
और फिर —
"मीरा।" मैंने धीरे कहा।
मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं थी। मीरा ने मेरी आवाज़ सुनी और उसने अपना कैमरा उठा लिया।
लाल बत्ती जली।
उसकी छोटी सी आवाज़ आई — बस एक क्लिक। पर उस बिजलीघर में वो क्लिक बंदूक की आवाज़ जैसा लगा।
रणवीर ने कैमरे की तरफ़ देखा।
और उसका चेहरा बदल गया — एक पल के लिए, एक ही पल के लिए, वो सारी नरमी, सारी मिठास, वो हाथ जोड़ने वाला समाजसेवी चेहरा — सब उतर गया। जो बचा, वो सिर्फ़ हिसाब था। ठंडा, साफ़, बिना रंग का हिसाब।
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