The Mysterious Bell – Chapter 722
यह आवाज़ किसी और की नहीं थी। यह मेरी ही आवाज़ थी। मेरी ही, बस थोड़ी दबी हुई, थोड़ी पुरानी, जैसे किसी ने मेरी आवाज़ पच्चीस साल की उम्र में रिकॉर्ड करके इस बक्से में बंद कर दी हो।
मेरे हाथ से टॉर्च फिसलकर ज़मीन पर गिरी और वो एक तरफ़ घूमकर पड़ी रही, और उसकी रोशनी अब बक्से की दीवार पर पड़ रही थी।
और उस रोशनी में मुझे कुछ दिखा।
बक्से के अंदर, दीवार पर, किसी नुकीली चीज़ से कुछ खुरचा हुआ था। धूल में भरा हुआ, पुराना।
मैंने घुटनों के बल झुककर टॉर्च उठाई और उसे अंदर की तरफ़ की।
दो लकीरें थीं।
और बीच में एक बिंदु।
वही निशान। जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था। जो उस्ताद की घंटी के छल्ले पर था।
मेरे पीछे, बहुत दूर, गली की तरफ़ से मीरा की आवाज़ आई, पर वो धुँधली थी और मैं उसे ठीक से सुन नहीं पाया।
और बक्से के अंदर से फिर वही आवाज़ आई, और इस बार ज़्यादा साफ़, जैसे कोई मेरे ठीक पीछे खड़ा हो और मेरे कान में बोल रहा हो।
"अंकुश…"
रुकी।
"मैं तेरा साया हूँ। अब बाहर आना है।"
॥
"मैं तेरा साया हूँ। अब बाहर आना है।"
आवाज़ रुकी और बक्से के अंदर कुछ हिला। बहुत हल्का। जैसे कोई बैठा आदमी करवट बदलता हो और फिर चुप हो जाए।
मेरे हाथ में टॉर्च थी और टॉर्च काँप रही थी। उसकी पीली रोशनी बक्से की दीवार पर ऊपर-नीचे हो रही थी और मैं उसे एक जगह टिका नहीं पा रहा था।
"अंकुश।"
पीछे से आवाज़ आई। मीरा की।
मैं पलटा। वो फाटक की दहलीज़ पर खड़ी थी, कैमरा हाथ में, उसकी लाल बत्ती जल रही थी। उसने कहा था कि कैमरा अंदर नहीं ले जाएगी। वो अंदर नहीं आई थी, पर कैमरा बाहर से अंदर की तरफ़ घुमा रखा था, जैसे कोई आँख बाहर खड़ी हो और सब देख रही हो।
"तू अंदर मत आ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सूखी निकली।
"मैं नहीं आ रही," उसने कहा। "पर कैमरा बंद नहीं करूँगी। तू जो करेगा, वो रहेगा। किसी के पास भागने का रास्ता नहीं बचेगा।"
"अच्छा," मैंने कहा। "कम से कम एक आवाज़ ऐसी है जो मेरी आवाज़ में नहीं बोल रही।"
"तू मज़ाक कर रहा है?" उसकी आवाज़ में गुस्सा था, पर उसके हाथ में कैमरा हिल नहीं रहा था।
"मज़ाक नहीं," मैंने कहा। "डर के मारे बोल रहा हूँ। डर में भी आदमी को कुछ तो बोलना पड़ता है, वरना पागल हो जाएगा।"
बक्से से ठंडी हवा निकली।
अजीब बात यह थी कि रात गर्म थी। बाहर गली में मच्छर भी नहीं बैठ रहे थे, ऐसी उमस थी। पर उस बक्से की दरार से जो हवा निकली, वो जाड़े की थी। मेरी बाँहों के बाल खड़े हो गए और मेरी साँस जब बाहर निकली, तो वो धुँधली दिखी। जैसे सर्दी में निकलती है।
टॉर्च की रोशनी में वो धुँधलापन एक पल को तैरा और फिर फैल गया।
और फिर मैंने देखा कि बक्से की अंदर वाली दीवार पर कुछ हो रहा है।
धूल। बारीक, सूखी, भूरी धूल। वो दीवार पर जमी हुई थी, और अब वो धीरे-धीरे खिसक रही थी। नीचे की तरफ़ नहीं, एक तरफ़ से दूसरी तरफ़, जैसे किसी ने बहुत हल्की उँगली से उसे सहलाया हो।
मैंने टॉर्च दीवार के और करीब की।
धूल के खिसकने से दीवार पर लकीरें बन रही थीं। पहले एक सीधी लकीर, फिर उससे मुड़कर दूसरी, फिर ऊपर, फिर नीचे।
मैंने घुटने टेक दिए। घुटनों में कच्ची मिट्टी और लोहे का चूरा चुभा।
मेरे पीछे मीरा ने कैमरा थोड़ा और आगे किया और उसकी साँस की आवाज़ आई — वो भी रोक रही थी।
धूल और खिसकी और लकीरें पूरी हुईं।
और मैंने पढ़ा।
"शंकरलाल।"
मैंने बहुत धीरे पढ़ा, फिर ज़ोर से।
"शंकरलाल।"
मेरी जेब में घंटी गरम थी और अब मैंने महसूस किया कि वो गरम नहीं, जल रही है। मैंने अपनी जाँघ पर हाथ रखकर उसे दबाया और घंटी ने धीरे से कहा, बहुत धीरे, जैसे हवा से बोल रही हो।
"ये नाम मेरा नहीं। ये नाम तेरे घर का है।"
"मेरे घर का?" मैंने फुसफुसाकर पूछा।
"दरवाज़े के पार वाला नाम नहीं," घंटी ने कहा। "उससे पुराना। जो मिट गया, पर काग़ज़ पर नहीं।"
मैंने उस नाम को देखा और मेरा दिमाग़ उन सब बातों में भागने लगा जो मैंने सुनी थीं। शंकरलाल। शंकर। मेरे पापा का नाम शंकर यादव है। इन दोनों में क्या कोई रिश्ता है?
और सबसे अजीब बात यह थी कि नाम में "शंकर" था। वही शंकर, जो मेरे घर में बैठा है और बैठकर चुप रहता है।
तभी मेरे पीछे दौड़ते पैरों की आवाज़ आई।
मैं उठा, मुड़ा, और हाथ में टॉर्च लेकर सामने की।
टिंकू।
वो फाटक से लगभग गिरता हुआ अंदर आया। उसकी साँस फूली हुई थी और उसके घुटने पर बँधी पट्टी फिर खुल गई थी। वो रुका और झुककर हाँफने लगा।
"तू यहाँ क्यों आया?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ में गुस्सा भी था और डर भी। "तेरी माँ ने…"
"माँ को सच बता दिया," टिंकू ने हाँफते हुए कहा।
"क्या सच?"
"सब।" उसने अपना चेहरा उठाया। उसकी आँखें लाल थीं। "कहा कि उस्ताद के पास जा रहा हूँ। कहा कि वहाँ कुछ ऐसा है जो बताना मुझ पर भी ज़रूरी है। कहा कि झूठ बोलकर निकलता तो कल फिर झूठ बोलता और बाद में बहाना बनाता।"
"और वो बोलीं क्या?"
टिंकू ने अपना होंठ काटा।
"वो बैठ गईं," उसने कहा। "पहले कुछ नहीं बोलीं। फिर मेरे बालों में हाथ फेरा और बोलीं — जा।" उसने रुककर हाँफा। "पर वापस आना। हाँ, इतना ही बोलीं। जा, पर वापस आना।"
मैं कुछ देर उसे देखता रहा। गली में लोग कहते हैं कि बच्चे सब समझते हैं। झूठ यह है कि बच्चे सब समझते हैं। सच यह है कि बच्चे उतना ही समझते हैं जितना हम उन्हें बताते हैं, और बाक़ी वो अपने डर से भर लेते हैं।
"अच्छा किया," मैंने कहा। "अब यहाँ रह, और मेरी बात मान।"
"क्या बात?"
"जब मैं कहूँ भाग, तो बिना पूछे भाग।"
"और तू कब कहेगा वो कैसे पता चलेगा?"
"मैं ज़ोर से कहूँगा," मैंने कहा। "अब चुप।"
हम तीनों उस बक्से के सामने खड़े थे। मीरा दहलीज़ पर, टिंकू मेरे पीछे, और मैं उस खुली दरार के सामने।
और तभी मैंने बाहर, गली की तरफ़, गाड़ी की आवाज़ सुनी।
नहीं, गाड़ी नहीं।
सिर्फ़ पैर।
धीमे, बराबर, बिना जल्दी। जैसे कोई उस जगह आ रहा हो जहाँ उसे हर दिन आने की आदत हो।
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ी।
"उस्ताद…"
"सुन रहा हूँ," मैंने कहा।
फाटक पर एक आदमी खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पाजामा, सफ़ेद जूते। उसके जूते इतने साफ़ थे कि उस जगह की धूल उन पर लग ही नहीं रही थी। उसके पीछे कोई नहीं था। न सक्सेना, न बबलू, न कोई काग़ज़ उठाने वाला, न कोई लाठी वाला।
रणवीर भारद्वाज अकेला आया था।
मैंने टॉर्च की रोशनी उसकी तरफ़ की।
वो अपनी आँखें बंद नहीं कीं, सिर्फ़ हल्का-सा मुस्कुराया, जैसे टॉर्च की रोशनी उसके लिए नई बात न हो।
"अंदर आऊँ?" उसने पूछा।
"आपको रोक कौन सकता है," मैंने कहा।
"आज तू रोक सकता है," उसने कहा। "आज तेरे पास वजह है।"
वो अंदर आया। उसके जूतों की आवाज़ उस फ़र्श पर अलग तरह से हुई — जैसे वो फ़र्श जानता हो। वो सीधा मेरे पास आया, पर मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो बक्से की तरफ़ देख रहा था।
वो चार कदम पर रुका और बक्से को देखने लगा, जैसे कोई पुराना दोस्त देख रहा हो।
"मैंने सोचा था तू इसे ढूँढ लेगा," उसने कहा। "पर इतनी जल्दी नहीं।"
"आपको पता था मैं यहाँ आऊँगा?"
"मुझे पता था तू यहाँ नहीं आएगा," उसने कहा। "तेरी घंटी तुझे यहाँ भेजेगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "आपको घंटी के बारे में क्या पता?"
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