The Mysterious Bell – Chapter 691
"क्योंकि तार दो तारों को जोड़ता है," घंटी ने कहा। "आदमी दो आदमियों को जोड़ता है। ये तार जुड़ गया है। पर इसमें बैठा आदमी अभी पूरा नहीं जुड़ा।"
"कौन सा आदमी?"
"जो अंदर बैठा है," घंटी ने कहा, "और जो बाहर खड़ा है। एक ही आदमी हैं।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा। "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"जो उस काग़ज़ पर मेरा नाम है," मैंने कहा। "वो मेरा नाम नहीं है। मैंने कभी उस पर अंगूठा नहीं लगाया। और जब सुबह सात बजे मशीन आएगी, तो मैं उस काग़ज़ को मानूँगा भी नहीं। पर…"
"पर?"
"पर मैं ये भी जानता हूँ," मैंने कहा, "कि आपने मेरा नाम वहाँ नहीं लिखवाया। मुझे पता है। मुझे यह भी पता है कि आपने अपना नाम लिखवाया था। और अभी मैं ये नहीं पूछूँगा कि क्यों। बस एक बात कहता हूँ।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"जब भी आप बोलेंगे," मैंने कहा, "मैं सुनूँगा। और जब मैं सुनूँगा, तो मैं आपको अकेले नहीं छोड़ूँगा। बस इतना।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
फिर उन्होंने रेडियो को गोद में रखा और अपना हाथ उस पर रख दिया, जैसे किसी के सिर पर रखा जाता है।
और रेडियो से एक हल्की घरघराहट निकली।
बहुत हल्की। कमरे की मक्खी जैसी। किसी दूर रेडियो स्टेशन के ज़िंदा होने जैसी।
मैंने साँस रोक ली।
घरघराहट बढ़ी। फिर अंदर से आवाज़ आई — पुरानी, सूखी, दबी हुई, जैसे किसी ने धूल में बोला हो।
"…तीसरी बार कह रहा हूँ," आवाज़ ने कहा। "ये नाम उधार का है। उधार का नाम कभी मज़बूत नहीं होता…"
फिर सरसराहट।
फिर आवाज़ बदल गई। पतली हो गई।
"…सात अंगूठे… सात, और एक…" फिर एक खटाका। "…और एक आठवाँ, जिसका कोई नाम नहीं…"
फिर एक लंबी सीटी जैसी आवाज़। और फिर शांत।
घरघराहट बनी रही।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा का चेहरा सफ़ेद था।
"पापा?"
"ये आवाज़," उन्होंने कहा, "मेरी नहीं है।"
"फिर किसकी है?"
"ये…" पापा ने रेडियो को कसकर पकड़ा। "ये शंकरलाल की है।"
बाहर से सीटी बजी।
मीरा दौड़कर आई।
"काली गाड़ी के साथ एक और गाड़ी। बड़ी। कुछ लोग उतर रहे हैं। गाड़ी का पीछा छत की तरफ़ है, उस्ताद — कुछ ऊँचा है उस पर।"
मैं उठा।
"माँ," मैंने कहा। "आप अंदर।"
"मैं अंदर नहीं जाऊँगी," माँ ने कहा। "मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, अंकुश। घर जलाने का ऐलान हो तो चूल्हे पर बैठी औरत भी उठकर बाल्टी लाती है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा और मुझे कहना पड़ा कि मैं हार गया।
"ठीक है। पीपल के नीचे ले जाओ उन्हें," मैंने काजल से कहा। "और तुम उनके पास रहो। माँ, ये शर्त है।"
"शर्त नहीं," माँ ने कहा। "वादा।"
बाहर जाते वक़्त मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो उठे थे। रेडियो उनके हाथ में था और उनकी आँखें सीधी गली के मुँह पर टिकी थीं।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
"हाँ?"
"तेरे पास सफ़ेद चॉक है?"
"है।"
"तो जाकर गली की दीवार पर लिख दे — 'अंकुश यादव यहाँ रहता है। सात नंबर दुकान। अंकुश यादव।' चार बार।"
मैं रुका।
"क्यों?"
"क्योंकि जो नाम मिटाना हो," पापा ने कहा, "उसे पहले दीवार पर लिखना पड़ता है। काग़ज़ छिपाने वाले उसे जला देते हैं। दीवार पर लिखा नाम जलता नहीं। उसे देखना पड़ता है। और जिसे देखना पड़े, वो भूल नहीं सकता।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा। "आपने पाँच साल में इतना सोचा था और कभी नहीं बोले।"
"सोचने में हिम्मत नहीं लगती," पापा ने कहा। "बोलने में लगती है।"
फिर वो गली की तरफ़ चल पड़े।
पीपल के नीचे पूरी गली जमा हो रही थी। उस्ताद अली बक्श अपनी सिलाई मशीन की कुर्सी उठा लाए थे और उसे चबूतरी के किनारे रख रहे थे। शबनम आपा गुमटी का चूल्हा जला रही थीं — मैंने कहा था चूल्हा बंद, पर वो मेरी तरफ़ देखकर बोलीं, "चाय नहीं, पानी गरम हो रहा है। ज़ख्म धोने के लिए। और अगर ज़ख्म न हो, तो चाय बन जाएगी। दोनों एक ही चूल्हे पर होते हैं।"
भोला भाई अपनी दुकान से लंबी पटिया उठा लाए। दुबे अंकल थाने से अपनी पुरानी कुर्सी ले आए — नीली शर्ट में, छड़ी हाथ में — और बोले, "आज ये कुर्सी यहाँ रहेगी। अब थाने में क्या करेगी।"
बच्चे दौड़ रहे थे। टिंकू हर बच्चे के हाथ में गली का नक़्शा पकड़ा रहा था — नक़्शा मेरा नहीं था, उसका बनाया हुआ था, पेंसिल से, खाली काग़ज़ पर, जिसमें गली के चार कोने नंबर से लिखे थे।
मैंने सफ़ेद चॉक निकाला और गली के मोड़ की दीवार पर लिखा।
अंकुश यादव। सात नंबर दुकान।
फिर तीन बार और।
रफ़ीक़ ने देखा और बोला, "उस्ताद, ये तो तीन रात से मिट रहा है, ये नहीं मिटेगा?"
"मिटेगा," मैंने कहा। "पर मिटाने वाले को हर बार झुकना पड़ेगा। और झुकने वाले की पीठ पर बोझ रहता है।"
टिंकू ने चॉक उठाया और मेरे नाम के नीचे अपना नाम लिख दिया — टिंकू कुमार।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि अब मैं भी उसी दुकान पर हूँ," उसने कहा, बिलकुल सीधे। "और अगर मेरा नाम मिटाएँगे, तो मुझे भी मिटाना पड़ेगा। और मैं दौड़ता बहुत तेज़ हूँ।"
मैं हँसा।
फिर सानिया ने लिखा — सानिया। फिर गुड्डू। फिर रफ़ीक़। फिर चिंटू। फिर उस्ताद आए और उन्होंने अपनी पतली सीधी लिखाई में लिखा — अली बक्श, दर्ज़ी, इस गली का।
फिर शबनम आपा ने लिखा — शबनम, जो किसी की बहन नहीं रही, पर इस गली की है।
फिर माँ ने कहा — मेरा नाम भी लिख।
और मैंने लिखा — सुशीला यादव।
और फिर मैं रुक गया।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो दूर खड़े थे। रेडियो उनके सीने से चिपका हुआ था।
"पापा," मैंने कहा। "आपका?"
पापा कुछ देर चुप रहे। फिर आए। चॉक लिया। और बहुत धीरे, बहुत छोटे अक्षरों में लिखा —
शंकर यादव। मैंने नहीं जलाया।
गली में सन्नाटा हो गया।
किसी ने कुछ नहीं पूछा। किसी ने "क्या जलाया" नहीं पूछा। बस सब देखते रहे।
और मुझे लगा कि पापा ने आज पहली बार गली के सामने अपना पूरा नाम लिखा है।
उसी वक़्त बत्ती गई।
पूरी गली अंधेरे में डूब गई। पीपल, चबूतरी, दुकानें, काली गाड़ी, गुमटी, सब एक साथ। जैसे किसी ने एक तार खींच दिया हो।
बच्चों में से किसी ने चीख नहीं मारी। यही सबसे अच्छी बात थी। बस चिंटू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, मैंने मोमबत्ती जलाने की शपथ ली थी, अब जलाऊँ?"
"अभी नहीं," मैंने कहा। "दो मिनट। सब अपनी जगह। कोई हिलेगा नहीं।"
हम सब अंधेरे में खड़े रहे।
और फिर रेडियो बोला।
घरघराहट नहीं, आवाज़। साफ़। जैसे कोई बहुत करीब बैठा हो।
"अंकुश," आवाज़ ने कहा।
मेरा खून जम गया।
"अंकुश यादव," आवाज़ ने फिर कहा। "तेरे पापा की बात सुन। बत्ती गई है, तो सुन। अब जो दरवाज़ा खटकेगा, वो तेरे घर का दरवाज़ा नहीं है। वो उस घर का दरवाज़ा है जो तेरे घर से जुड़ा है। और उसके पीछे जो खड़ा है…"
आवाज़ रुकी।
सरसराहट हुई।
"…वो तेरा ही है," आवाज़ ने कहा। "वो तेरा ही है। और वो तुझसे पहले मर चुका है।"
रेडियो चुप हो गया।
पूरी गली में सिर्फ़ साँसों की आवाज़ बची।
मैंने घंटी हाथ में ली।
"घंटी," मैंने धीरे से कहा। "क्या ये सच है?"
"आधा सच है," घंटी ने कहा।
"आधा क्यों?"
"क्योंकि मरने वाला," घंटी ने कहा, "अभी यहाँ खड़ा है।"
और ठीक उसी पल गली के पुराने दरवाज़े पर दस्तक हुई।
एक। दो। तीन।
धीरे। बिलकुल धीरे। जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी उँगली से लकड़ी पर टपका रहा हो।
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