The Mysterious Bell – Chapter 616
डर।
डर जो किसी शब्द में बसता है, किसी चाकू में नहीं।
"जोड़ना बंद करो," एक औरत ने धीरे से पढ़ा। "ये क्या है? किसने लिखा?"
"मैंने नहीं," बंसीलाल ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई।
"मैंने भी नहीं," मैंने कहा।
"तो किसने?" वही औरत बोली। "यहाँ तो कोई — मैं रात भर यहीं थी — किसी को — "
"इसीलिए," शबनम आपा ने कहा, और उसकी आवाज़ में जो था वो मुझे जाना-पहचाना लगा। वो डर नहीं था, वो गुस्सा था। "इसीलिए हमें सुबह सब कुछ हटाना पड़ेगा। ये लोग डराते हैं। बस यही उनका काम है।"
"ये कोई लोग नहीं," एक आदमी ने कहा। "ये जिन्नात — "
"चुप करो," शबनम आपा ने कहा। "जिन्नात काग़ज़ से नहीं जलाते। आदमी जलाते हैं।"
मीरा ने अपना कैमरा उठाया, देखा, और उसका चेहरा चला गया।
"बंद है," उसने कहा। "मैंने रात में चार्ज किया था। सोलह — "
उसने फिर देखा। इस बार ज़्यादा ज़ोर से।
"अंकुश, बैटरी है। मैंने बारह में आया था, पूरी थी।"
"अब?"
"अब बंद है।"
मैंने अपना फ़ोन निकाला — कुछ नहीं। मुझे लगा फ़ोन मरा पड़ा है, पर फॆ। नहीं — स्क्रीन जल रही थी। सिर्फ़ नेटवर्क गया था। एक लकीर भी नहीं।
तभी पीछे से कोई आया।
लाठी की आवाज़। ठक। ठक। धीमी, पर हर ठक पर पूरा बरामदा सुन रहा था।
डॉक्टर निहाल इसरानी।
सफ़ेद कोट, जो रात में भी उन्होंने पहन रखा था। हाथ में लाठी। और चेहरे पर वो भाव जो मैंने उनके चेहरे पर हमेशा देखा है — थकान, पर हार नहीं।
सबने उनके लिए रास्ता छोड़ दिया।
वो आगे आए। दीवार के सामने रुके।
उन्होंने दीवार देखी। लंबे समय तक।
फिर मुड़े।
"कोई जाने नहीं रहा है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो धीमापन था जो साठ साल के आदमी की आवाज़ में तभी आता है जब वो पूरी तरह साफ़ बोल रहा हो। "फ़र्श पर जो बैठा है, वो यहीं सोएगा। जो बच्चा है, वो यहीं करवट लेगा। जो दवा चल रही है, वो यहीं — "
"डॉक्टर साहब," वो बूढ़ी औरत बोली जो पहले पीछे हटी थी। "ये दीवार कह रही है — "
"दीवार नहीं बोलती," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "दीवार पर कोई लिख देता है।"
"मगर फिर भी — "
"अम्मा," उन्होंने कहा, और उन्होंने उस औरत का हाथ पकड़ लिया, "इस शहर में चालीस साल से मैं यहाँ हूँ। मुझे यहाँ बारिश में छत गिरने से लोग मरे हैं। मुझे रोगियों ने अंदर से ताला लगाकर अपने आप को बंद कर लिया है। मुझे वो रातें भी याद हैं जब गली में आग लगी थी और कोई अपने घर से बाहर नहीं आया। डर हमेशा आया है। और वो हर बार यही कहता है — भागो।"
उन्होंने चारों तरफ़ देखा।
"डर इलाज से बड़ा नहीं हो सकता," उन्होंने कहा। "मैं यहाँ हूँ। दवा यहाँ है। और मैं साफ़ कहता हूँ — आज रात यहाँ से कोई नहीं जाएगा।"
कुछ लोग चुप हो गए। कुछ नहीं। मगर डर की आवाज़ थोड़ी धीमी हुई। बस थोड़ी।
तभी हबीब चाचा आए। मुझे नहीं पता वो कब आए, कब रुके। वो सीधे दीवार के सामने गए और ज़मीन पर अपना हाथ टिकाकर खड़े हो गए।
"इमरान," उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ भारी नहीं थी। वो धीमी थी।
"इमरान," वो फिर बोले। "मेरा बेटा। तू जो भी है, जो भी है — "
उनका गला रुक गया।
"मैं जानता हूँ तू मेरे बेटे को रखे हुए है। मैं जानता हूँ तू मुझसे कुछ चाहता है। दे दे। जो चाहिए।"
वो थोड़ा झुके और उन्होंने अपनी हथेली दीवार पर रख दी। ठीक उन अक्षरों के नीचे।
"पर बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में अब कुछ और आ गया, "बच्चा माँ-बाप के हाथ से छीनकर नहीं लिया जाता। वो सिखाया नहीं जाता। वो पूछकर लिया जाता है।"
कुछ पल कुछ नहीं हुआ।
फिर घंटी बोली।
धीमे से। मेरी जेब में।
"ये स्याही नहीं है।"
मैंने हाथ जेब में डालकर उसे दबाया।
"फिर क्या है?"
"आग की राख। जली हुई। और राख कभी झूठ नहीं बोलती। स्याही बोलती है। तेल बोलता है। पेंट बोलता है। राख — राख सिर्फ़ अपना सच बोलती है।"
"मतलब?"
"मतलब — जो यहाँ जला है, वो यहाँ से गया नहीं है। अभी भी यहाँ है।"
मैंने मुड़कर देखा।
बंसीलाल की चारपाई। वो उस पर बैठ गया था, और उसकी बगल में, धूल में, कुछ पड़ा था।
मैं वहाँ गया। झुका।
पीले रंग के छोटे-छोटे टुकड़े। बहुत छोटे। जैसे किसी ने काग़ज़ को जलाकर, फिर उसकी राख को रगड़कर यहाँ छोड़ दिया हो। पर चूरा नहीं — टुकड़े। जले हुए, पर पहचानने लायक। मैंने एक उठाया।
उसका किनारा कटा हुआ था — सीधा, चाकू से कटा हुआ, जैसे फाइल से निकाला गया हो।
"मीरा," मैंने कहा।
वो आई। उसने मेरे हाथ में वो टुकड़ा देखा और उसका चेहरा बदल गया।
"ये काग़ज़ है," उसने कहा। "मगर जला हुआ।"
"हाँ।"
"अंकुश — "
"मीरा, वो काग़ज़ जलाकर, उसकी राख से दीवार पर लिखा है।"
उसने मेरी आँखों में देखा।
"मतलब वो काग़ज़ चाहता नहीं?"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। मेरी हथेली पर भी वो कालिख लग गई।
"नहीं," मैंने कहा। "मतलब वो काग़ज़ अब जल चुका है। उसने जो कुछ जलाया, वो अब काग़ज़ नहीं रहा। वो अब सिर्फ़ याद है। और याद सिर्फ़ उसे होती है जिसने जलाया हो।"
तभी सानिया ने चीख़ मारी।
"अंकुश भैया — दीवार — दीवार पर — "
हम सब भागकर दीवार के पास गए।
मैंने दीवार ढंग से देखी। मैंने "जोड़ना बंद करो" के नीचे वाला हिस्सा देखा। वहाँ हल्की सी धूल थी — कोई नहीं छूता उसे।
मैंने अपनी आस्तीन से उस कोने को पोंछा।
कालिख निकल आई। स्याह कालिख मेरी आस्तीन पर। और उसके नीचे —
उसके नीचे कुछ और था।
एक पतली लाइन। अक्षर छोटे। पर साफ़।
मैंने उसे पढ़ा।
"अगली बार तुम्हारा घर।"
मैंने एक कदम पीछे रखा।
क्योंकि वो कालिख मेरी आस्तीन पर थी — ताज़ी। गीली। मैंने उसे पोंछा — वो फैली। वो सूखी नहीं थी। जबकि उसके नीचे के अक्षर पुराने लग रहे थे, ऊपर वाली लाइन के।
किसी ने वो नीचे वाली लाइन पहले लिखी थी। ऊपर वाली — वो अभी भी गीली थी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
वो समझ गई।
"अभी," उसने कहा। "अभी किसी ने इसे — "
"हाँ।"
शबनम आपा आगे आई। उसने दीवार देखी। उसने फिर उस कोने पर अपनी उँगली फेरी और अपनी उँगली देखी।
"कौन?" उसने कहा। उसकी आवाज़ मुझे कभी इतनी सख़्त नहीं लगी थी।
"आपा — "
"मैंने पूछा कौन?" वो मुड़ी। उसने वहाँ खड़े सब लोगों को देखा — मरीज़ों के परिवार, बूढ़े, बच्चे, डॉक्टर, मुझे, मीरा, टिंकू, उस्ताद, हबीब चाचा — "
"हम यहाँ सब खड़े हैं," उसने कहा। "और किसी ने — अभी, इसी वक़्त — दीवार के नीचे कुछ ज़्यादा — "
वो रुकी। उसने अपनी चिमटी उठा ली।
"मैं अपनी गुमटी की तरफ़ जाने वाले रास्ते पर खड़ी थी," उसने कहा। "तुम सब यहाँ थे। डॉक्टर साहब दरवाज़े पर थे। हबीब चाचा दीवार के सामने थे। रज़िया मेरे पीछे थी। बच्चे सीढ़ी पर थे। तो — "
"तो कोई यहाँ नहीं था," रज़िया ने धीरे से कहा।
"मगर ये कालिख गीली है," मैंने कहा।
डॉक्टर इसरानी ने अपनी लाठी आगे टिकाई और वो उस पर झुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो नहीं था जो बाकी लोगों की आँखों में था। उन्होंने डर नहीं दिखाया। उन्होंने सवाल दिखाया।
"बेटा," उन्होंने कहा, "क्या ये लिखने वाला जानता है कि तू यहाँ रुकेगा? या वो सिर्फ़ ये जानता है कि तू डरेगा?"
मैंने उन्हें देखा। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और उससे दीवार की तरफ़ इशारा किया।
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