The Mysterious Bell – Chapter 581
"कुछ नहीं," मैंने कहा, और मैंने घंटी अपनी जेब में डाल दी।
तभी मेरी नज़र दूर पड़ी। बबलू के बाहर खड़ा था। चारपाई से दो दर्जन कदम दूर, टूटी बाउंड्री के सहारे। उसने हमारी पूरी बात सुनी थी।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने अपना सिर हिलाया।
ना। साफ़ ना। हाथ भी नहीं उठाया, बस सिर हिलाया — दो बार, बाएँ से दाएँ।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "आप बाहर रहिए। किसी को आने-जाने दीजिए मत।"
उसने कुछ कहा, पर आवाज़ दूर थी। मैंने हाथ से इशारा किया — पास आओ।
वो आया। डरा हुआ, सफ़ेद रूमाल उसके हाथ पर बँधा था।
"मैं अंदर नहीं जाऊँगा," उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो इंसान की आख़िरी हद पर बनती है। "मैंने तुमसे कह दिया, मैंने तुम्हें बताया। बस। अब मुझे माफ़ कर दो। मैं उस कमरे में नहीं जाऊँगा।"
"कोई मजबूरी नहीं," मैंने दोहराया। "आप बाहर रहिए।"
"मेरे बाहर रहने से क्या होगा?" उसने कहा। "मैं यहाँ बैठा रहूँगा और कुछ नहीं करूँगा।"
"आप बाहर रहकर हमें बताइए," मैंने कहा, "कि कब कोई आए। कब गाड़ी आए। कब सीढ़ी से कोई उतरे। बबलू भाई, मेरे अंदर जाने के बाद आप मेरे सबसे ज़रूरी आदमी होंगे।"
वो रुक गया।
"मैं?" उसने कहा। "मैं तो…"
"आप बाहर से आँख रख सकते हैं," मैंने कहा। "मैं अंदर से आँख नहीं रख सकता। अंदर अंधेरा है।"
उसने अपने होंठ काटे। फिर उसने अपना हाथ अपने रूमाल से पोंछा, और घुटनों पर रख दिया।
"ठीक है," उसने कहा। "बाहर रहूँगा।"
तभी मीरा ने अपनी जेब से कुछ निकाला।
"बंसीलाल भाई," उसने कहा। "एक बात और पूछनी है।"
"बोलो।"
"आपने कहा कि सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी कई रातों से आता जाता है। उसने कभी आपसे कुछ कहा?"
बंसीलाल ने आँखें झुकाईं।
"एक बार," उसने कहा। "जब मैं आँख नहीं फेर पाया। वो रुका और बोला — बंसी, तेरी नौकरी सिर्फ़ इसलिए है कि तू मुँह बंद रखता है। जिस दिन तूने मुँह खोला, उस दिन सीढ़ी पर ताला लगेगा और तेरी शर्ट उतर जाएगी।"
"और आज आप मुँह खोल रहे हैं," मैंने कहा।
"आज मुँह खोल रहा हूँ," उसने कहा। "और जानता हूँ कि शर्ट उतर जाएगी।"
उसने अपनी नीली शर्ट की कॉलर सीधी करी।
"पर तीस साल बाद, बेटा," उसने कहा, "मैं अपनी शर्ट उतरने से पहले ये देखना चाहता हूँ कि उस कमरे में क्या है। अगर आज नहीं देखा, तो फिर कभी नहीं देखूँगा।"
मैंने उसका हाथ थामा — पहली बार उसका हाथ। बूढ़ा हाथ, जिसमें गर्मी नहीं, जैसे कुछ घंटों से वो आँगन में खड़ा था।
अब हम योजना बनाने बैठे।
हम बंसीलाल की चारपाई के पास, ज़मीन पर बैठ गए। मेरे साथ मीरा, टिंकू, हबीब चाचा। टिंकू ने अपनी जेब से एक छोटा पेंसिल निकाला और ज़मीन पर लिखने लगा।
"उस्ताद," उसने कहा, "मैंने सुना था कि योजना बनानी होती है।"
"तो बना," मैंने कहा।
उसने ज़मीन पर चार खड़ी लकीरें खींचीं।
"नंबर एक — आप," उसने कहा। "अंदर जाएँगे।"
"ठीक है।"
"नंबर दो — मैं। आपके पीछे।"
"टिंकू—"
"उस्ताद," उसने कहा और मेरी तरफ़ देखा। "अगर आपने मना किया, तो मैं चुपचाप पीछे-पीछे आ जाऊँगा। इससे बेहतर है कि आप मुझे साथ रखें, जहाँ मैं दिखूँ।"
मीरा हँसी — पहली बार आज सुबह।
"इसकी ज़ुबान," उसने कहा, "तेरे से भी तेज़ है।"
"ज़ुबान," मैंने कहा, "उम्र से पहले आती है।"
"नंबर तीन — मीरा दीदी," टिंकू ने कहा। "रोशनी और आवाज़। कैमरा बंद रहेगा, पर जो दिखेगा वो बताएँगी।"
"मेरा काम यही है," मीरा ने कहा।
"नंबर चार — हबीब चाचा। बाहर, बबलू भाई के साथ।"
चाचा ने अपना सिर झुकाया।
"मैं बाहर ठीक हूँ," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो एक रात के जागने से आती है।
"उस्ताद बाहर रहेंगे," मैंने कहा। "वो गुमटी और पीपल के बीच रहेंगे। अगर कुछ भी गड़बड़ हो, तो उनके पास शबनम आपा का सीटी वाला केतली वाला हथियार है।"
"सीटी," उस्ताद ने कहा। "मैं दो बार सीटी बजाऊँगा। पहली बार — रुको। दूसरी बार — भागो।"
"उस्ताद," मैंने कहा, "तीसरी बार?"
उन्होंने अपनी कैंची उठाई, जो अब भी मेज़ पर पड़ी थी।
"तीसरी बार," उन्होंने कहा, "मैं अपने आप आ जाऊँगा।"
टिंकू ने ज़मीन पर आख़िरी लकीर खींची।
"और बाहर से बंद कमरे का रास्ता?" उसने पूछा।
"अस्पताल के अंदर से जाना होगा," बंसीलाल ने कहा। "पीछे की सीढ़ी से। पर आज बारह बजे के बाद वो सीढ़ी बंद हो जाएगी।"
"कितने बजे हैं?" मैंने पूछा।
"सात बजकर दस मिनट," मीरा ने कहा।
"तो हमारे पास कुछ घंटे हैं," मैंने कहा।
"और रास्ता?" टिंकू ने कहा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"वो आधा नक़्शा," मैंने कहा। "उसमें नीचे का रास्ता दिख रहा था?"
मीरा ने नक़्शा खोला। उसने उँगली रखी।
"यहाँ," उसने कहा। "सीढ़ी से नीचे जाकर एक गलियारा है। गलियारे के आख़िर में लोहे का दरवाज़ा है। फिर काला कमरा।"
"गलियारा कितना लंबा है?"
"पता नहीं। पर इस पर एक निशान है — छोटा सा तीर, जो दिखाता है कि दरवाज़ा बाएँ तरफ़ है।"
"तो बाएँ जाएँगे," मैंने कहा।
"अंकुश," मीरा ने कहा। "एक बात।"
"हाँ।"
"उस कमरे में रोशनी होगी तो साया नहीं दिखेगा। तो हमें बिना रोशनी जाना होगा?"
"नहीं," मैंने कहा। "हमें रोशनी चाहिए। पर साया नहीं दिखेगा — इसका मतलब है कि वहाँ कुछ और है जो रोशनी में छिपेगा।"
"क्या?"
"वो जो बत्तीस साल से चुप है," मैंने कहा। "हम उसे देखेंगे नहीं। हम उसे सिर्फ़ महसूस करेंगे।"
टिंकू ने अपनी छोटी पेंसिल उठाई और ज़मीन से सारी लकीरें मिटा दीं।
"क्यों मिटाई?" मैंने पूछा।
"क्योंकि योजना बन गई," उसने कहा। "अब इसे किसी को दिखना नहीं चाहिए।"
हबीब चाचा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "मेरा बेटा अंदर है।"
"जानता हूँ, चाचा।"
"अगर वो निकल आया, तो मैं उसे पहला थप्पड़ मारूँगा," उन्होंने कहा, और उनकी आँखें भर आईं। "फिर उसे गले लगाऊँगा। फिर उससे माफ़ी माँगूँगा कि मैंने सात चिट्ठियाँ नहीं पढ़ीं।"
कुछ देर हम चुप बैठे रहे। चारपाई पर बंसीलाल अपनी आँखें बंद किए बैठा था। मीरा नक़्शे को मोड़ रही थी। टिंकू अपनी जेब में पेंसिल डाल रहा था। बबलू दूर फाटक पर खड़ा था, हाथ पर रूमाल बाँधे।
और तभी मेरा फोन बजा।
मैंने जेब से निकाला। स्क्रीन पर नाम चमका — इमरान।
मेरी साँस रुक गई।
"मीरा," मैंने कहा।
उसने देखा।
"इमरान का नंबर," मैंने कहा।
"उठाओ," उसने कहा।
मैंने उठाया।
पहले कुछ नहीं सुनाई दिया। फिर साँसों की आवाज़। भारी साँसें, जैसे कोई दौड़कर आया हो और फिर रुककर सीने को पकड़ लिया हो।
"इमरान?" मैंने कहा।
साँसें तेज़ हुईं।
"इमरान, बोल।"
एक पल चुप। फिर एक आवाज़ — कमज़ोर, फटी, जैसे आधे रास्ते में दबा दी गई हो।
"काला।"
और फिर लाइन कट गई।
मैंने फोन को देखा। स्क्रीन बंद हो गई थी।
"क्या कहा उसने?" मीरा ने पूछा।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी उसमें गरम थी।
"सिर्फ़ एक शब्द," मैंने कहा। "काला।"
बंसीलाल ने अपनी आँखें खोलीं।
"काला कमरा," उसने धीरे से कहा। "वो अंदर है। पर वो अंदर किसी और की आवाज़ में बोल रहा है?"
"नहीं," मैंने कहा। "वो अंदर है। और उसके पास फोन है।"
"फोन?" मीरा ने कहा। "अंदर सिग्नल कहाँ से आएगा?"
"यही सवाल मैं पूछता हूँ," मैंने कहा। "और यही जवाब मुझे डरा रहा है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
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