The Mysterious Bell – Chapter 573
“ये ले,” चाचा ने कहा और इमरान की तरफ़ बढ़ा दिया। “तेरी माँ का था। मैंने तेरे लिए संभालकर रखा था और कभी दिया नहीं, क्योंकि मुझे लगता था कि तू लौटेगा ही नहीं।”
इमरान ने उसे दोनों हाथों से लिया।
“अब सुन,” चाचा ने कहा। उनकी आवाज़ अब नरम थी, बहुत नरम, और उसमें वो चीज़ थी जो बाप की आवाज़ में तभी आती है जब वो अपने बेटे को किसी और के सामने भेज रहा हो। “गाँठ खोलना मत। गाँठ में दुआ है। और जब लौटे तो घर आना। साइट पर नहीं। घर। सीधा घर।”
इमरान ने रूमाल अपनी जेब में रखा। उसने अब्बा के पैर छुए। चाचा ने उसका सिर पकड़कर थोड़ी देर सहलाया और फिर पलटकर आँगन में चले गए, और उनकी चप्पल की आवाज़ सुनकर मुझे कुछ अजीब लगा — जैसे कोई बूढ़ा आदमी बहुत बोझ उठाकर चल रहा हो जो दिखता नहीं।
तभी गुमटी वाली तरफ़ से चप्पलों की आवाज़ आई, तेज़ और जल्दी वाली।
मीरा आ रही थी। कंधे पर कैमरा, हाथ में बैग, और मुँह पर वो थकान जो पूरे दिन की होती है।
“क्या हुआ?” उसने दूर से ही पूछा। “रज़िया आपा ने कहा कि तू अभी भी यहीं है।”
“मीरा,” मैंने कहा। “बैठ।”
“मैं नहीं बैठूँगी। बता।”
“इमरान को साइट का नक़्शा मिला है,” मैंने कहा। “आधा। और वो पूरा लेने जा रहा है।”
मीरा ने अपना बैग नीचे रखा और सीधे इमरान की तरफ़ देखा।
“कैसा नक़्शा?”
“साइट की दीवार पर टँगा नक़्शा,” इमरान ने कहा। “जिस पर अस्पताल के नीचे वाला हिस्सा भी बना है। जिस पर काले कमरे की लाइन है।”
मीरा ने एक गहरी साँस ली और मुझे देखा।
“अंकुश,” उसने कहा। “तू समझ रहा है इसका मतलब?”
“समझा रहा हूँ,” मैंने कहा। “पर तू बता।”
मीरा ने बैग से एक पुराना काग़ज़ निकाला — वो ही जिस पर गली का नक़्शा था, जो बबलू ने दिखाया था। उसने उसे खोलकर ज़मीन पर नहीं, अपने घुटने पर रखा।
“देख,” उसने कहा। “यहाँ गली है। यहाँ अस्पताल। और यहाँ, नीचे की तरफ़, एक छोटा सा चौकोर है जिसमें कुछ लिखा ही नहीं। पता है क्यों नहीं लिखा? क्योंकि जो नक़्शा बाहर दिखाया जाता है, उसमें वो हिस्सा होता ही नहीं।”
“तो इमरान का नक़्शा क्या करेगा?”
“अगर उसमें वो चौकोर है,” मीरा ने कहा, “तो इसका मतलब है कि साइट का जो नक़्शा अंदर दीवार पर टँगा है, वो बाहर दिखाए नक़्शे से अलग है। और अगर एक ही ज़मीन के दो नक़्शे अलग हैं, तो उनमें से एक झूठा है। और जिसके पास दोनों हों, उसके हाथ में पहली बार ऐसी चीज़ आ जाती है जिसे वकील मोड़ नहीं सकता।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश, ये रणवीर के काग़ज़ों में पहली बड़ी दरार होगी। पहली। आज तक जो भी काग़ज़ आया, वो सब आधा था। कटा हुआ। फटा हुआ। कोई गवाह नहीं, कोई मुहर आधी, कोई पन्ना गायब। ये पहली चीज़ होगी जो पूरी है।”
“पर पूरी होगी तभी,” मैंने कहा, “जब वो आएगी।”
और तभी मेरी जेब से आवाज़ आई।
न बजी, न हिली। सिर्फ़ आवाज़। धीमी, छोटी, जैसे कोई दूर से अपना हाथ बढ़ाकर मेरे कान तक बात पहुँचा रहा हो।
“नक़्शा लाओ,” घंटी ने कहा। “पर अकेले मत जाओ।”
इमरान ने चारों तरफ़ देखा।
“ये क्या था?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “घंटी।”
“घंटी बोलती है?”
“अब नहीं बताऊँगा,” मैंने कहा। “तेरे पास वक़्त कम है। सुन — घंटी कह रही है, अकेले मत जा। मैं साथ चलता हूँ। नीम के नीचे खड़ा रहूँगा। तू अंदर जा, नक़्शा ला, और बाहर आ।”
इमरान हँसा। पूरी हँसी, जैसे उसने कुछ बहुत मज़ेदार सुन लिया हो।
“भाई,” उसने कहा, “साइट पर अकेले जाना ही मेरी नौकरी है। वहाँ नियम सीधा है — गेट पर हेलमेट, गेट पर नाम, गेट पर हाज़िरी। अगर मैं भीड़ लेकर गया, तो पहले वही निकलेगी। मेरा नाम, मेरी हाज़िरी, मेरा हेलमेट। सुपरवाइज़र पहले मुझे देखेगा। और फिर जो भी होगा, सबसे पहले मेरे हिस्से आएगा।”
वो उठा और हेलमेट सिर पर रखा।
“तू नीम के नीचे रुक,” उसने कहा। “और ये मत सोचना कि मैं कोई कहानी का हीरो हूँ। मैं सिर्फ़ वो आदमी हूँ जिसे आज सुबह उसका बाप पहली बार सुनने लगा है। मुझे वापस लौटना है। इसीलिए मैं सोच-समझकर जाऊँगा।”
फिर वो मेरी तरफ़ झुका और बहुत धीरे बोला, ताकि मीरा भी न सुने।
“और अगर मैं दो घंटे में न आऊँ,” उसने कहा, “तो अब्बा को ये रूमाल दे देना। कहना कि गाँठ मैंने नहीं खोली।”
मैंने उसका कंधा पकड़ा।
“तू आएगा,” मैंने कहा। “दो घंटे में।”
वो हँसा और चल दिया।
गली के मुँह पर एक ट्रक खड़ा था, जो नए बाज़ार की तरफ़ जाता था। उस पर मज़दूर बैठे थे, कुछ सीमेंट की बोरियों के बीच। इमरान ने ट्रक के पीछे हाथ लगाया और एक झटके में चढ़ गया। उसने पीछे मुड़कर मुझे देखा, और मैंने हाथ उठाया।
ट्रक चला। धूल उठी। गली की बत्तियाँ उस धूल में पीली पड़ गईं।
मीरा मेरे पास आकर खड़ी हो गई।
“तुझे भी लग रहा है न,” उसने कहा।
“क्या?”
“कि आज कुछ होगा।”
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ ट्रक को देखा। वो गली के मोड़ पर मुड़ा और अंधेरे में घुल गया।
और तभी मेरी नज़र दूसरी तरफ़ गई।
गुमटी के पीछे, जहाँ बत्ती नहीं पहुँचती, वहाँ एक आदमी खड़ा था।
मैंने उसे पहले नहीं देखा था। वो वहाँ पहले से था, या अभी आया, पता नहीं। पर उसकी शक्ल मुझे सालों से पता थी।
बबलू पांडे।
पर ये वो बबलू नहीं था जो मैं जानता था। उसके गले में सोने की मोटी चेन नहीं थी। हाथ में पानदान नहीं था। उसके मुँह में पान नहीं था और वो चबा नहीं रहा था। उसका दाहिना हाथ सफ़ेद रूमाल में बँधा था — वही रूमाल जिस पर सूखे गुलाबी दाग थे। वो एक हाथ से दूसरे हाथ को सहला रहा था, जैसे ठंड लग रही हो।
और वो देख रहा था। ट्रक को नहीं। मुझे नहीं। उस रास्ते को देख रहा था जिस पर ट्रक गया था।
फिर उसने अपनी जेब से फोन निकाला।
उसने फोन कान पर रखा और अपना चेहरा दीवार की तरफ़ कर लिया।
हवा मेरी तरफ़ थी, वरना उसकी आवाज़ मेरे कान तक न आती। पर हवा मेरी तरफ़ थी। और साइकिल गली की हवा बड़ी अजीब होती है — वो गुमटी की चाय की भाप, नाली की बदबू, पीपल के पत्ते, और दूर से आती किसी की आवाज़, सब एक साथ लाती है।
उसने बहुत धीरे कहा, इतना धीरे कि जैसे कोई अपने आप से बात कर रहा हो।
“साहब,” उसने कहा। “वो नक़्शा लेने गया है।”
और मैं वहीं खड़ा रह गया, एक हाथ नीम के तने पर और दूसरा जेब पर, और घंटी अचानक बर्फ जैसी ठंडी हो गई, इतनी ठंडी कि मुझे लगा जैसे जेब में कोई मुर्दा चीज़ रखी हो।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसने मेरा चेहरा देखा और उसने कुछ पूछा, पर मुझे उसकी आवाज़ नहीं सुनाई दी।
मुझे सिर्फ़ एक बात सुनाई दी।
“साहब, वो नक़्शा लेने गया है।”
और उसके बाद घंटी ने, बहुत छोटी आवाज़ में, बिना बजे, बिना हिले, बस इतना कहा —
“अब तेरा नाम लिया जा रहा है।”
॥
"साहब, वो नक़्शा लेने गया है।"
मैं वहीं खड़ा रह गया। नीम के तने पर हाथ, और जेब में घंटी — बर्फ जैसी ठंडी।
मीरा ने मेरा कंधा हिलाया। "अंकुश। अंकुश, क्या हुआ? तू क्यों ऐसे देख रहा है?"
मैंने गुमटी के पीछे की तरफ़ उँगली उठाई।
बबलू ने फोन कान से हटाया और जेब में रखा। फिर वो मुड़ा। उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और वो एक पल के लिए जम गया।
मैंने उसकी तरफ़ कदम बढ़ाया। वो पीछे हटा। दो कदम। उसका बँधा हुआ हाथ छाती के पास आ गया, जैसे कोई ढाल पकड़ ली हो।
"बबलू भाई," मैंने कहा। "किसको खबर दी?"
"किसी को नहीं।"
"मैंने सुना।"
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