The Mysterious Bell – Chapter 572
नीम के पत्ते हवा में हिले। मुझे ठंड लगी — असली ठंड नहीं, वो ठंड जो अंदर से आती है, रीढ़ से सिर तक, ठीक वैसी जैसी एक बार घंटी ने मुझे दी थी जब वो टूटी थी।
“इमरान,” मैंने कहा। “मज़दूर आपस में क्या बात करते हैं? साइट पर। सुबह, चाय के वक़्त।”
वो कुछ देर चुप रहा। फिर उसने गिलास ज़मीन पर रखा और अपने घुटनों पर हाथ रखकर आगे झुक गया, जैसे कोई राज़ दे रहा हो और दीवारों से डर रहा हो।
“साइट पर चार तरह के लोग हैं,” उसने कहा। “एक जो सीमेंट ढोते हैं, एक जो पत्थर काटते हैं, एक जो हिसाब रखते हैं, और एक जो सिर्फ़ घूमते हैं और कुछ नहीं करते। घूमने वाले किसी से नहीं बोलते। पर जो सीमेंट ढोते हैं, वो बोलते हैं।”
“तो वो क्या बोलते हैं?”
“वो बोलते हैं,” इमरान ने धीरे से कहा, “कि अस्पताल के नीचे एक काला कमरा है। बहुत नीचे नहीं, बस एक सीढ़ी नीचे। जिसे साहब के सिवा कोई नहीं खोलता। न हमारे सुपरवाइज़र को पता है उसकी चाबी कहाँ है, न मुनीम को। और जो उसे खोलने की बात करता है, उसका नाम अगले हफ़्ते हाज़िरी से गायब हो जाता है।”
“हाज़िरी से गायब होना मतलब?”
“मतलब नौकरी से निकाल दिया जाना,” उसने कहा। “पर वो ऐसे कहते हैं — हाज़िरी से गायब। जैसे आदमी खुद ही न आए। जैसे उसका नाम रजिस्टर से उड़ गया।”
मैंने एक लंबी साँस ली।
“और कुछ?”
“एक बात और है,” उसने कहा। “पर ये मैंने खुद नहीं देखी। ये बात चाय की टपरी पर होती है, और जब मैं पास जाता हूँ तो बात बदल जाती है।”
“कह।”
“कहते हैं कि उस काले कमरे में सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है,” इमरान ने कहा। “कहते हैं कि वहाँ कुछ ऐसा है जो साहब रात में अकेले देखने जाता है। और कहते हैं कि जिस रात वो जाता है, अगली सुबह साइट पर ऐसा लगता है जैसे कुछ और हो गया हो। कोई झगड़ा, कोई गुस्सा, कोई पुरानी बात उखड़ जाती है।”
मेरा हाथ जेब पर था और घंटी अब थोड़ी गरम हो रही थी, धीरे-धीरे, जैसे कोई जग रहा हो।
“इमरान,” मैंने कहा। “ये बातें तेरे काम से जुड़ी हैं। तू मुझे क्यों बता रहा है?”
वो हँसा। छोटी हँसी।
“क्योंकि सुबह मेरे अब्बा ने मेरा हाथ पकड़ा,” उसने कहा। “और मुझे लगा कि अब मेरे पास कोई चीज़ है जो मैं खो सकता हूँ। जिस आदमी के पास कुछ न हो, उसे डरने की ज़रूरत नहीं होती। आज सुबह से मुझे डर लग रहा है, अंकुश भाई। और डर सिर्फ़ उसी को लगता है जिसके पास कुछ हो।”
मैं चुप बैठा रहा।
यही बात है न। यही वो बात है जो कोई किताब नहीं सिखाती। बक्सा, काग़ज़, मुहर, गवाह — ये सब बाद में आता है। पहले आता है एक हाथ जो दूसरे हाथ को पकड़ता है, और उसके बाद आदमी अचानक कमज़ोर हो जाता है, क्योंकि अब उसके पास खोने की चीज़ है।
“तेरे पास सबूत है?” मैंने पूछा। “कुछ भी। जो मैं मीरा को दिखा सकूँ, जो दुबे अंकल के सामने रख सकूँ?”
इमरान ने मेरी तरफ़ देखा। फिर वो उठा, आँगन की तरफ़ गया, और दरवाज़े की चौखट पर रखा अपना पुराना हेलमेट उठा लाया।
पीला हेलमेट। ऊपर से फटा, टेप से बँधा, अंदर से मैला।
उसने उसे मेरी तरफ़ उलटा किया।
“अंदर देख।”
मैंने अंदर देखा। हेलमेट के अंदर, कपड़े की परत के नीचे, काग़ज़ दबा हुआ था।
“ये क्या है?”
“साइट का नक़्शा,” उसने कहा। “पूरा नहीं। जो हिस्सा हम मज़दूरों को दिखाया जाता है, वो नहीं। ये वो हिस्सा है जो मैंने उस दिन देखा जब सुपरवाइज़र का बैग खुला पड़ा था। मैंने जल्दी में पेंसिल से कॉपी किया, फिर उतारकर हेलमेट में दबा दिया।”
“तूने इसे बाहर क्यों नहीं निकाला?”
“क्योंकि साइट पर हेलमेट चेक होता है,” उसने कहा। “और हेलमेट के अंदर काग़ज़ कोई नहीं देखता। लोग सिर्फ़ हेलमेट पहनते हैं, अंदर नहीं देखते।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तो ये बाहर है,” मैंने कहा। “फिर तू जाना क्यों चाहता है?”
“क्योंकि जो मैंने उतारा है वो आधा है,” उसने कहा। “उसमें अस्पताल के नीचे वाला हिस्सा नहीं है। जो पूरा नक़्शा सुपरवाइज़र के दफ़्तर की दीवार पर टँगा है, उस पर वो कमरा भी बना हुआ है। मुझे वो लाइन चाहिए — वो एक लाइन जो नीचे वाले कमरे को ज़मीन से जोड़ती है।”
वो रुका। उसने हेलमेट मेरे हाथ से लिया और उसे अपने घुटने पर रखा।
“और अभी साइट पर तीन दिन की छुट्टी का मतलब ये भी है कि अंदर आदमी कम है,” उसने कहा। “मैं अभी जाऊँगा, दो घंटे में लौटूँगा।”
पीछे से आवाज़ आई।
“नहीं जाएगा।”
हबीब चाचा आँगन के दरवाज़े पर खड़े थे। उनके हाथ में एक कटोरी थी और कटोरी में पानी। उनका हाथ काँप रहा था, इसलिए पानी कटोरी के किनारे से बहकर उनकी उँगलियों पर गिर रहा था और वो गिरता ही रहा, और चाचा उसे महसूस ही नहीं कर रहे थे।
“अब्बा—”
“नहीं जाएगा,” चाचा ने कहा। इस बार आवाज़ तेज़ थी। “आज सुबह ही तो मैंने तेरा हाथ पकड़ा है। आज सुबह ही तो तेरे मुँह से अपनी बात सुनी है। मैंने सोचा था कि आज से हम ठीक हो गए। और तू आज ही शाम को उसी साँप की माँद में जाने की बात करता है?”
इमरान उठ खड़ा हुआ।
“अब्बा, मैं कुछ नहीं करने जा रहा। मैं सिर्फ़ एक काग़ज़ लेने जा रहा हूँ।”
“वही काग़ज़ तेरे बाप के सीने से चिपका था न, जब तू घर आया था? वही काग़ज़ जो तुझे छह महीने साइट पर रगड़ता रहा? और तू उसे उठाने जा रहा है, इमरान?”
चाचा की आवाज़ टूट गई।
“मैंने आज तक तुझसे कुछ नहीं माँगा,” चाचा ने कहा। “तेरी माँ जब चली गई तब भी नहीं माँगा। जब तू शहर छोड़कर गया, तब भी नहीं माँगा। अब माँग रहा हूँ। एक बात माँग रहा हूँ। मत जा।”
इमरान ने अपना सिर झुका लिया।
मैं वहाँ बैठा था, और मुझे इस काम में कुछ नहीं बोलना चाहिए था। यह बाप-बेटे की बात थी, और मैं उसमें नहीं घुसता। पर मैं सोच रहा था — अगर ये नक़्शा नहीं आया, तो काग़ज़ों के इस पूरे ढेर में कोई एक भी चीज़ ऐसी नहीं है जो बबलू की बात से आगे जाए। सब कुछ आधा है। सब कुछ।
और मैं उठकर खड़ा हो गया।
“चाचा,” मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“मैं कह नहीं रहा कि उसे भेजिए,” मैंने कहा। “मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि आज आपके बेटे ने जो किया, वो कोई छोटी बात नहीं है। आज शाम बबलू पूरी गली के सामने पानी का काग़ज़ लेकर खड़ा था, और आपके बेटे ने अपने बाप के नाम की गवाही देने से साफ़ मना कर दिया। उसने चुपचाप मुँह नहीं फेरा, चाचा। उसने आपका नाम नहीं बेचा।”
चाचा की कटोरी हाथ में ही रही।
“वो इमरान वही है जो आज सुबह पंप का हत्था लौटाकर खड़ा था,” मैंने कहा। “और मैं उसे अकेले नहीं भेजूँगा।”
इमरान ने मेरी तरफ़ देखा।
“कैसे?” उसने पूछा।
“मैं साथ नहीं जाऊँगा,” मैंने कहा। “क्योंकि मेरा चेहरा साइट पर जाना-पहचाना है, और कल से ज़्यादा आज है। पर मैं गेट के बाहर खड़ा रहूँगा। उस नीम के नीचे, जहाँ तूने रात को खुद को छिपाया था। और अगर तू दो घंटे में नहीं आया, तो मैं अंदर आ जाऊँगा।”
इमरान कुछ सोचने लगा।
“और अगर तू आया,” मैंने कहा, “और सब ठीक रहा, तो चाचा के सामने मैं हाथ जोड़कर कहूँगा कि तुम्हारा बेटा आज भी वही है — जो आज सुबह था।”
चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर देखा। फिर उन्होंने कटोरी दरवाज़े की चौखट पर रख दी और अंदर गए।
वो एक मिनट से ज़्यादा अंदर रहे।
जब बाहर आए, तो उनके हाथ में एक पुराना रूमाल था। धुला हुआ, हल्का पीला, किनारों से एक जगह फटा हुआ, और उसमें गाँठ बँधी थी।
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