The Mysterious Bell – Chapter 554
"पापा," मैंने कहा, "अस्पताल के पीछे बक्से पर दादा का नाम उभरा है।"
रिंच उनके हाथ से छूटी।
वो नीचे गिरी, छत पर दो बार उछली, और फिर रुक गई।
पापा ने उसे उठाने की कोशिश नहीं की।
"जगदीश यादव," उन्होंने कहा। बस नाम, कुछ और नहीं। जैसे उस नाम को बोलने के लिए उन्हें पच्चीस साल की तैयारी करनी पड़ी हो।
"आपने मुझे यह नाम कभी नहीं बताया।"
"मैंने अपने बाप का नाम तुझे इसलिए नहीं बताया," उन्होंने कहा, इतने धीमे स्वर में कि मुझे करीब झुकना पड़ा, "क्योंकि मैं उस दिन को याद नहीं करना चाहता था जिस दिन वो गए। और मैं जानता था, जिस दिन तुझे वो नाम पता चलेगा, उस दिन तू पूछेगा कि वो गए कैसे। और मैं जवाब नहीं दे पाता।"
"अब दे दीजिए।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। छत पर हल्की रोशनी थी और उस रोशनी में उनका चेहरा और भी झुका हुआ लगा।
"बुखार था," उन्होंने कहा। "पच्चीस साल पहले। उस ज़माने में दवा आसानी से नहीं मिलती थी। मैंने दौड़-धूप की। फिर दवा आई — पर देर से। तीन घंटे देर से।" उन्होंने रुककर साँस ली। "वो तीन घंटे मेरी ज़िंदगी में सबसे लंबे तीन घंटे थे, अंकुश। और मैंने उन तीन घंटों को किसी को नहीं बताया। सबसे बड़ी गलती यही की। मैंने चुप रहकर सोच लिया कि चुप्पी मुझे बचा लेगी। चुप्पी ने कुछ नहीं बचाया। उसने बस मुझे अकेला कर दिया।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
उन्होंने हाथ नहीं छुड़ाया।
हम दोनों वहीं बैठे रहे, और नीचे गली में कहीं कोई कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया।
और फिर सुबह हो गई।
सुबह मुझे नींद से नहीं जगाया गया। मुझे हल्ले ने जगाया।
गली में शोर था — असली शोर, वो शोर जो किसी के घर जलने पर होता है या किसी के ब्याह में, फर्क सिर्फ़ यह है कि एक में लोग भागते हैं और दूसरे में नाचते हैं। यहाँ भागने की आवाज़ थी।
मैं उठा, चप्पल पहनी, और बाहर निकला।
शबनम आपा की गुमटी के बगल वाली दुकान — जो महीने भर से बंद थी, जिसका शटर ज़ंग खा रहा था, जिस पर कोई नहीं आता था — उस पर एक बोर्ड टँगा था।
लाल और सफ़ेद।
चमकदार। इतना चमकदार कि सुबह की धूप में आँख चौंधिया जाए। और उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था — भारद्वाज ज़मीन।
नीचे छोटे अक्षरों में: गली को नया करने वाली योजना पंद्रह दिन में शुरू।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
गली में लोग जमा थे। शबनम आपा गुमटी के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ में चिमटी, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे किसी ने उनके चूल्हे पर पानी डाल दिया हो। उस्ताद अपनी दुकान के दरवाज़े पर थे, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, और उनकी सिलाई मशीन आज पहली बार चुप थी। बच्चे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — सब बोर्ड के नीचे खड़े थे, गर्दन ऊपर, मुँह खुले।
और उन सबके बीच, बोर्ड के नीचे, बबलू खड़ा था।
आज वो सोने की चेन नहीं पहने था। पान नहीं चबा रहा था। उसके घायल हाथ पर वही सफ़ेद रूमाल बँधा था, और वो रूमाल अब साफ़ नहीं था।
उसने भीड़ की तरफ़ देखा और आवाज़ उठाई।
"सब सुन लो," उसने कहा। "मैं एक बार कह रहा हूँ। पूरी गली का नक़्शा बदलने वाला है। जो समय रहते समझदारी कर लेगा, उसका भला। जो बाद में आएगा, वो रोएगा।"
भीड़ में कुछ लोगों ने सिर झुकाया। कुछ ने एक-दूसरे को देखा। कोई नहीं बोला।
मैं आगे बढ़ा।
और जैसे ही मैं करीब आया, मुझे एक चीज़ सुनाई दी जो भीड़ में किसी और ने नहीं सुनी।
बबलू की आवाज़ में गुस्सा था — पर वो गुस्सा तेज़ आदमी का गुस्सा नहीं था। वो गुस्सा डरे हुए आदमी का गुस्सा था। वो गुस्सा जो आदमी इसलिए दिखाता है कि कोई उससे उसका डर न पूछे।
मैंने उसकी आँखों में देखा।
वो एक पल के लिए मेरी तरफ़ देखकर रुक गया, और उस एक पल में उसने मुझसे कुछ नहीं कहा — पर उसकी आँखों ने कहा, "मैं भी इसी में फँसा हूँ।"
"बबलू भाई," मैंने कहा, आवाज़ में हल्की मुस्कान डालकर, "यह बोर्ड आपने लगाया?"
"मैंने नहीं लगाया," उसने कहा। "मैंने तो सिर्फ़ देखा है कि लग गया है।"
"किसने लगाया?"
"जिसने लगाया, वो अब यहाँ नहीं है," उसने कहा, और उसकी नज़र ऊपर बोर्ड पर गई। "पर लगाने वाले का हाथ अच्छा था। एक कील भी टेढ़ी नहीं।"
"आपको मालूम है," मैंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुन सके, "यह बोर्ड गली के लिए नहीं, आपके लिए लगा है।"
उसका जबड़ा कसा।
"मैं कुछ नहीं जानता," उसने कहा। "मैं सिर्फ़ आदमी हूँ जो आपको खबर दे रहा है। खबर मुफ़्त है, आगे का हिसाब आपका।"
और वो मुड़कर चला गया।
उसके जाने के बाद गली में एक अजीब सी चुप्पी फैल गई। वो चुप्पी जो शोर के बाद बैठ जाती है।
और फिर शबनम आपा ने अपनी चिमटी नीचे रखी और अंदर जाकर सामान समेटना शुरू कर दिया।
कटोरे उठाने लगीं। प्लेटें। चाय की केतली। चूल्हे का ढक्कन।
उनकी आवाज़ आ रही थी — बर्तन बज रहे थे, जैसे कोई हार मान रहा हो।
रज़िया बाहर खड़ी थी। वो एक पल देखती रही। फिर अंदर गई और उनका हाथ पकड़ लिया।
"दीदी," उसने कहा।
शबनम रुकीं नहीं।
"दीदी," रज़िया ने फिर कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ छोटी बहन की आवाज़ में होती है — ज़िद, और उसके नीचे डर। "अभी कोई नहीं जा रहा।"
शबनम का हाथ बर्तन पर रुक गया।
"क्या बक रही है?"
"मैं कह रही हूँ, अभी कोई नहीं जा रहा," रज़िया ने कहा। "पंद्रह साल तक मैं डरकर बाहर रही। मैं अब नहीं जाने वाली। और तू भी नहीं जाएगी।"
शबनम ने उसे देखा। उनके हाथ में एक कटोरा था और उनकी उँगलियाँ उस पर सफ़ेद पड़ गई थीं।
"तू जानती है यहाँ क्या होने वाला है?"
"नहीं जानती," रज़िया ने कहा। "पर मैं जानती हूँ कि भागने से क्या होता है। भागने से जो पीछे छूट जाता है, वो बार-बार सामने आता है। मैंने पंद्रह साल भागकर देखा है।"
उन्होंने एक-दूसरे को देखा।
और फिर शबनम आपा ने कटोरा वापस उसकी जगह रख दिया।
यह छोटी सी बात है — एक कटोरा वापस रखना। पर उस सुबह गली में उससे बड़ा कुछ नहीं हुआ। क्योंकि घूमकर खड़ी तीन औरतें — जो बोर्ड देखने आई थीं और जो अब तक डर के मारे कुछ नहीं कह रही थीं — उन्होंने वो कटोरा वापस रखते देखा।
तो वो तीनों मेरे पास आईं।
पहली थी नसीमा बाई। उसके हाथ में तीन काग़ज़ थे, मुड़े हुए, जेब में दबे हुए। दूसरी एक चालीस के आसपास की औरत थी, फीके हरे दुपट्टे में, जिसने अपना नाम नहीं बताया, बस काग़ज़ थमा दिया और पीछे हट गई। तीसरी बच्चों वाली माँ थी, गोद में एक साल का बच्चा, हाथ में मुड़ा काग़ज़।
नसीमा बाई ने कहा, "बेटा, ये काग़ज़ देख। तीन महीने पहले आए थे। पढ़ने को नहीं दिए। बोले बस अंगूठा लगा दो। हम अंगूठा नहीं लगाया।"
मैंने काग़ज़ लिए।
और फिर मैं उन्हें लेकर सीढ़ी पर बैठ गया। क्योंकि ऐसी चीज़ें खड़े होकर नहीं देखते।
पहला काग़ज़ — नसीमा बाई की दुकान का। उस पर तारीख़ थी — पिछले साल की एक तारीख़। मोहर नीली, गोल, और चारों तरफ़ छोटे अक्षरों में एक ही दफ़्तार का नाम।
दूसरा काग़ज़ — हरी दुपट्टे वाली औरत का। तारीख़ अलग। इस साल की। तीन महीने पुरानी।
तीसरा — बच्चों वाली माँ का। तारीख़ फिर अलग। छह महीने पुरानी।
तीनों काग़ज़ अलग। तारीख़ें अलग। मामला अलग।
पर मोहर एक ही थी।
और सब पर गवाह का नाम — एक ही, और वो नाम किसी ऐसे आदमी का था जो इस गली में पैदा भी नहीं हुआ था। एक ऐसा नाम जो मैंने पहले कहीं सुना था — मोहल्ले के बाहर, किसी और दुनिया में।
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