The Mysterious Bell553 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 553

7 min read November 5, 2026

अस्पताल के पीछे वाला रास्ता पतला है — इतना पतला कि दो आदमी साथ नहीं चल सकते, एक को पीछे रुकना पड़ता है। मैं अकेला था, इसलिए चलता रहा। दीवार पर काई जमी थी और हवा में वो गंध थी जो अस्पताल के पीछे हमेशा रहती है — दवा और गीली मिट्टी, दोनों मिली हुई।

प्लॉट के मोड़ पर कोई बैठा था।

बबलू।

वो घुटनों में सिर देकर बैठा था और जैसे ही मैंने पैर की आहट दी, वो उछलकर खड़ा हो गया।

"तू है?" उसने कहा, आवाज़ काँप रही थी। "मैंने सोचा कोई और है।"

"कौन और?"

"वो ही," उसने कहा, और उसकी नज़र प्लॉट के अंधेरे कोने पर गई। "अंकुश, उस बक्से में आज कुछ हुआ है। मैं यहाँ पहरा दे रहा हूँ, तभी अंदर से आवाज़ आई। जैसे कोई अंदर से हाथ मार रहा हो। और फिर —"

वो रुका।

"फिर क्या?"

"फिर वो बक्सा ठंडा हो गया। पहले गरम था, छूने से हाथ जलता था। अब बर्फ जैसा है। मैंने हिम्मत करके छुआ।"

मैं उसके आगे बढ़ा। बक्सा वहीं था — लोहे का, काला, कोने से ज़ंग खाया। गड्ढे के किनारे पर रखा, आधा मिट्टी में धँसा।

मैंने हाथ रखा। ठंडा। बहुत ठंडा।

और उसकी सतह पर, जहाँ मैंने हाथ रखा था, धूल हट गई।

नीचे कुछ लिखा था।

खुदा हुआ नहीं। उभरा हुआ — जैसे लोहे ने खुद को ऊपर उठाकर अक्षर बना लिए हों। मैंने उँगली से उन्हें टटोला। एक नाम था, और वो नाम मेरे घर का था। मेरे दादा का नाम, जो मेरे बाप ने मुझे कभी नहीं बताया था — पर मैंने वो नाम एक पुरानी तस्वीर के पीछे लिखा देखा था, बचपन में, जब मैं छत पर चढ़कर संदूक खोलता था।

मेरी साँस रुक गई।

"बबलू," मैंने धीरे से कहा, "तू पीछे हट।"

"क्यों?"

"क्योंकि मुझे नहीं पता," मैंने कहा, "और जब मुझे नहीं पता होता, तो मैं लोगों को पीछे हटा देता हूँ। मेरी आदत है।"

वो हट गया।

मैंने घंटी जेब से निकाली। वो हथेली में रखते ही बजी नहीं — बस काँपी।

और फिर, मेरे पीछे, किसी ने खाँसा।

मैं पलटा।

गड्ढे के दूसरी तरफ़, अंधेरे में, वो आदमी खड़ा था। सफ़ेद कुर्ता, पर सफ़ेदी जैसे उस पर रात का रंग मल चुकी हो। चेहरा अब भी धुँधला, पर मुस्कान साफ़।

"हिम्मत अच्छी है," उसने कहा। "तेरे बाप में नहीं थी।"

"आप मेरे बाप को जानते हैं?" मैंने पूछा, आवाज़ सीधी रखकर, हालाँकि अंदर कुछ हिल रहा था।

"मैं वो चीज़ें जानता हूँ जो लोग गाड़कर भूल जाते हैं," उसने कहा।

और उसी पल बक्से ने फिर ज़ोर मारा।

धड़ाम।

इस बार इतना करीब कि मेरी छाती में गूँजा। मिट्टी उड़ी, बबलू चीखा, और घंटी मेरी हथेली में लंबी और गहरी बजी, जैसे कोई आख़िरी बार अपना नाम पुकार रहा हो।

वो आदमी मुस्कुराया और बोला —

"जोड़ो। जोड़ते रहो। मेरा छज्जा तुम्हारी नींव से बढ़ रहा है।"

॥

वो मुस्कुराया। और फिर — मुस्कुराते हुए ही अंधेरे में पीछे हटता गया, जैसे रात उसे अपने अंदर खींच रही हो।

एक कदम। दूसरा। और फिर कुछ नहीं।

मैं वहीं खड़ा रहा, हाथ में घंटी, और घंटी अभी भी काँप रही थी — जैसे किसी ने उसे छूकर छोड़ दिया हो और वो अपना चेहरा रगड़ रही हो।

बबलू मेरे पीछे खड़ा था। उसकी साँस तेज़ थी, ऐसी तेज़ जैसे कोई लंबी दौड़ के बाद रुका हो।

"अंकुश," उसने फुसफुसाया, "वो गया?"

"गया।"

"पक्का?"

"पक्का नहीं," मैंने कहा। "पर अभी दिख नहीं रहा, इतना पक्का है।"

वो हँसने की कोशिश करने लगा, पर हँसी गले में ही फँस गई। फिर ज़ोर से साँस लेकर बोला, "मैं यहाँ नहीं रुकता। यहाँ डर लगता है।"

"फिर मत रुक।"

"और तू?"

मैंने बक्से को देखा। वो अब भी वहीं था, आधा मिट्टी में, ठंडा, और उस पर मेरे दादा का नाम उभरा हुआ।

"मैं रुकूँगा," मैंने कहा। "मुझे इसके साथ कुछ बात करनी है।"

बबलू ने एक पल मुझे देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले उस चेहरे पर नहीं देखा था। डर — हाँ, पर उसके नीचे कुछ और भी। जैसे वो मुझसे कहना चाहता हो कि मुझे भी ले चल, पर उसकी ज़ुबान उस बात से डरती हो।

वो मुड़ा और भाग गया। उसके जूतों की आवाज़ दीवार से टकराकर लौटी और फिर खत्म हो गई।

मैं अकेला रह गया।

मैंने बक्से पर हाथ रखा। ठंडा। पर ठंडा होने में भी कुछ था — जैसे कोई चीज़ अंदर से साँस ले रही हो, बहुत धीरे, इतनी धीरे कि हाथ को पता चले और कान को नहीं।

"दादा," मैंने धीरे से कहा।

कुछ नहीं हुआ।

"दादा जगदीश यादव," मैंने फिर कहा, थोड़ा और साफ़।

घंटी मेरी हथेली में एक बार हिली। बस इतनी, जितनी कोई नींद में करवट ले।

और फिर वो बोली, इतना धीमा कि जैसे बहुत दूर से आ रही हो, "यहाँ नाम नहीं बोलते। यहाँ नाम सुनते हैं।"

मैंने आँखें बंद कर लीं।

"ठीक है," मैंने कहा। "तो सुनो। और मुझे भी सुनाओ।"

घंटी चुप रही।

मैं वहाँ कितनी देर खड़ा रहा, पता नहीं। जब आँख खोली तो आसमान में हल्की सी लकीर आ गई थी — वो लकीर जो रात को कहती है, बस थोड़ी देर और, फिर मैं जा रही हूँ।

मैंने बक्से से हाथ हटाया। हथेली पर धूल लगी थी और उस धूल में एक अजीब सी गंध थी — जैसे पुराना ताला खोलने पर आती है।

मैं लौटा।

रास्ते में मैंने एक बार भी पीछे नहीं देखा। अगर देखता, तो शायद रुक जाता, और मुझे रुकना नहीं था।

घर पहुँचा तो माँ जाग रही थीं।

वो बैसाखी के सहारे बैठी थीं और उनके सामने स्टील की थाली में दो रोटियाँ रखी थीं — ठंडी, सूखी, और एक कटोरी में दाल जमी हुई।

"तूने खाया?" उन्होंने पूछा, बिना मेरी तरफ़ देखे।

"खाया," मैंने कहा।

"झूठ बोल रहा है।"

"माँ —"

"मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता," उन्होंने कहा, "और बात में भी नहीं। तेरी आवाज़ से पता चलता है, तूने कुछ नहीं खाया। बैठ।"

मैं बैठ गया।

और मैंने खाया। रोटी ठंडी थी, दाल जमी हुई थी, और उस रात मुझे लगा कि मैंने सालों में इतना अच्छा कुछ नहीं खाया।

माँ मेरे सामने बैठी रहीं। कुछ नहीं बोलीं। बस मुझे खाते देखती रहीं, और उनके हाथ अपनी गोद में रखे थे, जैसे वो कुछ पकड़ रही हों जो कोई और न देख सके।

खाते-खाते मैंने कहा, "माँ, बक्से पर दादा का नाम उभरा है।"

उनका हाथ एक पल रुका। फिर वो बोलीं, "कौन सा बक्सा?"

"अस्पताल के पीछे वाला। लोहे का।"

वो कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, "तेरे पापा को मत बताना।"

"क्यों?"

"क्योंकि वो उठकर वहाँ जाएँगे," उन्होंने कहा, "और वो अपने बाप का नाम उस लोहे पर उभरा देखकर संभल नहीं पाएँगे। अंकुश, मैं तुझे एक बात कहती हूँ — जो आदमी अपने बाप के नाम के सामने बैठकर बैठ जाए, वो आगे नहीं बढ़ पाता। तेरे पापा पच्चीस साल से उसी नाम के सामने बैठकर बैठे हैं।"

मैंने काँटा रख दिया।

"माँ," मैंने कहा, "आप जानती हैं ना, दादा की साइकिल, घंटी, सब?"

वो उठीं। बैसाखी सरकी, मैंने पकड़नी चाही, पर उन्होंने हाथ से रोक दिया।

"मैं जो जानती हूँ," उन्होंने कहा, "वो मुझे रात में सोने नहीं देता। पर आज रात मुझे सोना है, क्योंकि कल मुझे एक दरवाज़ा खोलना है।"

और वो अंदर चली गईं।

मैं वहीं बैठा रहा।

बाहर आँगन में ठंडी हवा आ रही थी, और मेरी जेब में घंटी अब भी गरम थी — बिना बजे, बिना बोले, बस गरम।

मुझे नींद नहीं आई।

मैं छत पर चढ़ा। वहाँ पापा बैठे थे। रिंच उनके हाथ में थी, और सामने पुराना पंखा खुला पड़ा था — वही जिसका तार टूटा था और जिसे वो तीन महीने से ठीक करने के बहाने बैठे थे।

"पापा।"

"हम्म।"

"आपको नींद नहीं आई?"

"पंखे का तार ठीक कर रहा हूँ," उन्होंने कहा।

मैं उनके पास बैठ गया। पंखे का तार तीन महीने से टूटा हुआ था और उसमें एक भी नया जोड़ नहीं था।

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