The Mysterious Bell540 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 540

7 min read November 5, 2026

वो हँसा और भाग गया, और गुड्डू और रफ़ीक़ भी उसके पीछे, और कमरा फिर खाली हो गया।

मैं बैठा रहा।

कुछ देर बाद मैंने घंटी को उठाया और धीरे से कहा, "बता। ये जो दो औरतें हैं, इनका जोड़ बड़ा है?"

घंटी ने कहा, "बड़ा।"

"कितना बड़ा?"

"पंद्रह साल।"

"और मेरे अंक?"

"एक सौ अठ्ठावन।"

मैंने कहा, "ये तो अच्छे हैं।"

घंटी ने वो कहा जो मुझे चुभा।

"जोड़ जितना बड़ा, खर्चा उतना बड़ा। सोच-समझकर कदम रखना।"

मैंने कहा, "क्या मतलब?"

"इस बार माफ़ी एक तरफ़ से नहीं चलेगी। दोनों तरफ़ से लगेगी। और जो बीच में खड़ा है, वो भी बाहर आएगा।"

मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।

फिर मैंने कहा, "और अगर मैं ग़लत कदम रख दूँ?"

घंटी ने कहा, "तो जो आज जुड़ा है, वो भी खुलेगा।"

शाम हो गई थी।

मैं दुकान से बाहर आया, शटर आधा गिराया, और गली में देखा।

पीपल के नीचे बुज़ुर्ग बैठे थे, चबूतरी पर किसी की गमछा पड़ा था, और उस्ताद की दुकान से सिलाई मशीन की टिक-टिक आ रही थी। शबनम आपा की गुमटी पर समोसे का तेल चटक रहा था और धुआँ गली की हवा में एक तिरछी लकीर बनाकर ऊपर जा रहा था।

मैं वहीं खड़ा होकर सोचता रहा।

अंकुश, तूने आज तक जितने जोड़ जोड़े, वो सब एक जैसे थे — दो आदमियों के बीच की चुप्पी, दो भाइयों का हिसाब, दो साझेदारों का डिब्बा। इन सबमें एक बात समान थी। दोनों आदमी जानते थे कि क्या टूटा था। बस बोल नहीं रहे थे।

पर शबनम आपा की बात अलग है।

क्योंकि पंद्रह साल से जो दो बहनें नहीं बोल रहीं, उनमें से एक तो शायद यही नहीं जानती कि झगड़ा असल में किस बात पर हुआ था। माँ की बीमारी के दिनों की एक बात थी, एक वाक्य था, और उस वाक्य के पीछे कोई तीसरा आदमी था। और वही आदमी अब तक कहीं बैठकर हँस रहा है।

मेरे हाथ में घंटी थी।

मैंने उसे जेब में रखा और मन में कहा — अगर तेरी बात सच है, तो सबसे पहले मुझे वो आदमी ढूँढना है।

और ठीक उसी वक़्त, गली के मुँह पर, एक ऑटो रुका।

मैंने पहले उसकी आवाज़ सुनी — पुराना ऑटो, जिसका इंजन खाँसता है, और जिसके पीछे का शीशा टूटा हुआ है। फिर मैंने देखा कि उसमें से कोई उतर रहा है।

औरत थी।

उम्र पचास के आसपास, सिर पर हल्का सा सफ़ेद दुपट्टा, हाथ में बड़ा सा पुराना सूटकेस जिसकी पकड़ टेप से बँधी हुई थी, और पैरों में ऐसी चप्पल जो बहुत दिनों से नई नहीं थीं।

वो उतरी, ऑटो वाले को पैसे दिए, और गली में आकर खड़ी हो गई।

और उसने चारों तरफ़ ऐसे देखा जैसे कोई अपने ही घर को पहचानने की कोशिश कर रहा हो, जिसे बहुत सालों से देखा न हो।

मैंने समोसे की आवाज़ सुनी।

या यूँ कहूँ — मैंने समोसे की आवाज़ बंद होते सुनी।

मैं मुड़ा।

शबनम आपा गुमटी के बाहर खड़ी थीं। उनके हाथ में गरम लोहे की चिमटी थी, जिससे वो अभी तवे से समोसा उठाने वाली थीं।

और वो चिमटी उनके हाथ से छन से गिर गई।

तवे पर गिरी, और उसकी आवाज़ गली के हर कोने तक गई।

शबनम आपा ने अपनी ठुड्डी पर हाथ रखा, और उनकी आवाज़ में से जो निकला, वो किसी गली की सबसे तेज़ ज़ुबान वाली औरत की आवाज़ नहीं थी।

वो किसी छोटी बहन की आवाज़ थी।

उन्होंने कहा, "तू?"

और वो औरत, सूटकेस वाली, वहीं खड़ी रही।

उसने जवाब नहीं दिया।

बस अपना सूटकेस ज़मीन पर रखा, और उसकी पकड़ जो टेप से बँधी थी, उसे दोनों हाथों से पकड़कर सहारा लिया — जैसे अचानक उसके पैर कमज़ोर पड़ गए हों।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।

कुछ भी नहीं बोली।

पर मुझे लगा कि उसने मेरी हथेली में एक बार हल्का सा दबाव डाला — जैसे कह रही हो, देख रही हूँ। ये वही है जिसकी बात मैंने कही थी।

गली में उस वक़्त किसी की भी साँस नहीं आ रही थी।

पीपल के नीचे बैठे बुज़ुर्गों ने अपनी बातचीत रोक दी। उस्ताद की दुकान की टिक-टिक भी रुकी। भोला भाई अपनी दुकान के दरवाज़े पर आकर खड़े हो गए और उनके हाथ में जो रेडियो का पुर्ज़ा था, वो वैसे ही हवा में लटका रह गया।

और मैंने खुद से कहा — अंकुश, याद रखना। आज सुबह एक दरवाज़ा खुला मिला था, तो तूने सोचा था कि सबसे बड़ी बात वो है।

नहीं थी।

सबसे बड़ी बात ये है।

क्योंकि यहाँ एक औरत गली में आई है, सूटकेस लेकर, और उसके आने से पहले शबनम आपा की चिमटी गिर गई है।

और आज शाम मुझे घंटी से पूछना है कि ये जो दूसरी औरत सूटकेस उठाकर आई है, ये माफ़ी माँगने आई है या माफ़ी का हिसाब लेने।

मैं गुमटी की तरफ़ चला।

मेरे पीछे बच्चों की टोली चुपचाप चल रही थी, जो आज मज़ाक नहीं कर रही थी।

और सूटकेस वाली औरत ने, जैसे ही मुझे आते देखा, अपना दुपट्टा सीधा किया, और बहुत धीरे से कहा, "शबनम, मैं आ गई।"

॥

"शबनम, मैं आ गई।"

ये शब्द गली में गिरे, और गली ने उन्हें उठाया नहीं।

मैं गुमटी की तरफ़ बढ़ रहा था, और मेरे पीछे बच्चों की टोली चुपचाप चल रही थी। आज कोई मज़ाक नहीं कर रहा था। सानिया अपनी लाल कवर वाली कॉपी सीने से चिपकाए हुए थी, जैसे उसे कहीं छिपाना हो। गुड्डू के हाथ में जो टाट का टुकड़ा था, वो उसने जेब में ठूँस दिया। रफ़ीक़ का टूटा चश्मा आज उसकी आँख पर नहीं था। चिंटू मेरी कमीज़ पकड़े चल रहा था, जैसे कहीं मैं भी गायब न हो जाऊँ।

और सामने वो औरत खड़ी थी।

उसने अपना दुपट्टा सीधा किया, और मुझे आते देखकर बहुत धीरे से कहा, "शबनम, मैं आ गई।"

शबनम आपा ने जवाब नहीं दिया।

वो गुमटी के बाहर उसी जगह खड़ी रहीं, जहाँ से उनकी चिमटी गिरी थी। चिमटी अभी भी तवे के किनारे पड़ी थी, और उस पर से उठता धुआँ उनके घुटनों से टकराकर ऊपर जा रहा था। उनका हाथ हवा में आधा उठा हुआ था, जैसे किसी ने पकड़ लिया हो।

तुम सोच रहे होगे कि पंद्रह साल बाद मिलने पर लोग रोते हैं, गले लगते हैं, कंधे पर हाथ रखते हैं।

नहीं।

कभी-कभी लोग बस जम जाते हैं। ठीक वैसे, जैसे किसी ने गली के बीच में एक पत्थर रख दिया हो, और अब कोई उसे चुपचाप देख रहा हो, क्योंकि उसे हटाने का हौसला किसी में नहीं है।

शबनम आपा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

पहले चेहरा। फिर बाल, जो सफ़ेद हो चुके थे — पूरे सफ़ेद नहीं, पर इतने कि सामने वाला एक पल के लिए सोच में पड़ जाए। फिर वो पुरानी साड़ी, जिसका रंग धुल चुका था। फिर छोटी सफ़ेद दुपट्टा। फिर पैरों की वो चप्पल, जो बहुत दिनों से नई नहीं थीं। और आख़िर में सूटकेस, जिसकी पकड़ टेप से बँधी थी।

और फिर शबनम आपा झुकीं।

उन्होंने चिमटी उठाई। अपनी साड़ी के पल्लू पर उसे पोंछा — दो बार, तीन बार, जैसे उस पर सिर्फ़ तेल नहीं, कुछ और भी लगा हो। और चिमटी वापस तवे पर रख दी।

तवे पर गिरी उस चिमटी की आवाज़ और तेल का चरचराना — उस चुप्पी में वो आवाज़ ऐसी लगी जैसे किसी ने थप्पड़ मारा हो।

और बिना ऊपर देखे, शबनम आपा ने कहा, "अब यहाँ क्या फ़ालतू का आना हुआ।"

गली में कोई नहीं हिला।

पीपल के नीचे बैठे बंसी बाबा ने अपनी तस्बीह पकड़ ली। हाफ़िज़ बाबा ने दुपट्टे का कोना छोड़ दिया। इब्राहीम चाचा ने बृजमोहन बाबा की तरफ़ देखा, और बृजमोहन बाबा ने अपनी लाठी दोनों हाथों से पकड़ ली, जैसे उन्हें सहारा चाहिए। उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के दरवाज़े तक आ गए थे और उनके हाथ में जो कैंची थी, वो हवा में रुक गई। भोला भाई के हाथ में रेडियो का पुर्ज़ा था, वो वैसे ही लटका रह गया।

और वो औरत — रज़िया — अपने सूटकेस की टेप बँधी पकड़ दोनों हाथों से पकड़े खड़ी रही।

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