The Mysterious Bell – Chapter 54
फिर मैंने कहा, "ठीक है। कर।"
घंटी ने पूछा, "पक्का?"
"पक्का।"
"सोच ले।"
"सोच लिया।"
"अंकुश," घंटी ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ और था — जैसे वो मेरा नाम लेते हुए झिझक रही हो। "जो दिखेगा, वो तू बदल नहीं सकता। तू सिर्फ़ देख सकता है। बीच में पड़ना है तो बाद में। समझा?"
"समझा।"
"अच्छा।"
और फिर वो बजी।
घंटी की आवाज़ आम दिन जैसी नहीं थी। वो एक लंबी, पतली, खींची हुई आवाज़ थी — जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी बहुत धीरे से खुल रही हो। एक बार बजी, और फिर आवाज़ बंद नहीं हुई। वो गूँजती रही।
और मेरे कानों में आवाज़ें आने लगीं।
पहले एक।
किसी बर्तन के गिरने की आवाज़। मिट्टी का बर्तन, जो फर्श पर गिरा और टूक-टूक हो गया। फिर किसी औरत का रोना — दबा हुआ, होंठ सींचकर रोना, जैसे वो किसी को सुनाई न पड़े।
फिर दूसरी।
एक बच्चे का हाथ किसी बड़े की उँगली से छूटने की आवाज़। बस एक हल्की सी फिसलन। और उसके बाद एक ऐसा सन्नाटा जो चीख से भी ज़्यादा ज़ोर से बोलता है।
फिर तीसरी।
किसी की साँस रुकने की आवाज़। जब कोई ऐसी बात सुन लेता है जो उसे नहीं सुननी थी, और उसका शरीर पहले रुक जाता है, दिमाग बाद में।
फिर चौथी, पाँचवीं, छठी—
आवाज़ें बढ़ने लगीं। दस, बीस, सौ हो गईं। चारों तरफ़ से। हर घर से, हर खिड़की से, हर दरवाज़े से, हर उस जगह से जहाँ कभी कोई बैठकर किसी से कुछ कह चुका था और बाद में पछताया था।
मैंने कान बंद करने की कोशिश की, पर हाथ कानों तक नहीं पहुँचे। मेरे हाथ मुंडेर पर जम गए थे।
और फिर सब चुप हो गया।
एकदम।
जैसे किसी ने पूरी दुनिया की आवाज़ का बटन दबा दिया हो।
और उस सन्नाटे में एक आवाज़ आई।
साफ़। बिल्कुल साफ़।
जैसे वो मेरे कान में नहीं, मेरे सीने में बोली हो।
"काजल का भरोसा आज रात टूटने वाला है।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
मेरे पैर मुंडेर से फिसल गए, मैं लड़खड़ाया, संभला। घंटी हाथ से छूटकर छत पर गिरी और लुढ़क गई। मैंने उसे उठाया, जेब में ठूँसा, और दौड़ा।
सीढ़ियाँ।
अंधेरा था। मेरा पैर एक सीढ़ी छोड़ गया, मैं दीवार से टकराया, कंधा चढ़ गया, पर मैं रुका नहीं।
"काजल!"
नीचे आया।
घर का दरवाज़ा खुला था। कमरे की बत्ती जल रही थी। माँ किचन की तरफ़ खड़ी थीं, और वो खाँस रही थीं — वो खाँसी जो पिछले दो हफ़्ते से रात में आती थी और जिसे वो हर बार "पानी पी लिया, ठीक है" कहकर टाल देती थीं। इस बार उन्होंने कोई बहाना नहीं बनाया। इस बार उन्होंने रुमाल मुँह पर रखा और दीवार का सहारा लिया।
पापा पंखे के नीचे बैठे थे।
पंखा अब ठीक हो चुका था। धीरे-धीरे घूम रहा था। हवा उनके चेहरे पर पड़ रही थी। पर उनका चेहरा ऐसा था जैसे उन्हें हवा की ज़रूरत नहीं थी। जैसे उन्हें कुछ और चाहिए था जो कोई दे नहीं रहा था।
और कमरे के कोने में, मेज़ पर, काजल खड़ी थी।
उसका नर्सिंग का बैग खुला था।
और वो अपनी किताबें उसमें रख रही थी।
एक-एक करके।
मोटी किताब। ऊपर लिखा था — शरीर रचना। फिर दूसरी — दवाओं का ज्ञान। फिर तीसरी — मरीज़ की देखभाल।
वो किताबें रख रही थी, और उसके हाथ काँप रहे थे। एक किताब फिसलकर गिर गई। वो झुकी, उठाई, फिर रखी। फिर उसने बैग का चैन खींचा। आधा। फिर छोड़ दिया।
"काजल," मैंने कहा।
उसने सिर नहीं उठाया।
"काजल," मैंने दोबारा कहा। "क्या कर रही है?"
वो रुकी।
फिर उसने सिर उठाया।
उसकी आँखें लाल थीं। ऐसी लाल जैसे वो रोई हो और फिर पोंछा न हो। जैसे आँसू सूख गए हों, पर निशान नहीं गए हों।
"बैग पैक कर रही हूँ," उसने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे जाना है।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा उतरा।
"कहाँ?"
वो मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने बैग का चैन पूरा खींचा। एक आवाज़ आई — खर्रर — और वो आवाज़ मुझे किसी चीज़ के बंद होने जैसी लगी।
"अंकुश," वो बोली, "तू मुझसे झूठ बोलता है।"
"मैंने कब—"
"अभी नहीं। हमेशा।" उसने कहा। "तू हमेशा से मुझे बच्ची समझता आया है। तू सोचता है कि मैं कुछ नहीं समझती। तू सोचता है कि मैं सिर्फ़ किताबें पढ़ती हूँ और माँ के लिए चाय बनाती हूँ।"
"काजल—"
"मैंने देखा था।" उसकी आवाज़ टूटी। "पाँच महीने पहले। भारद्वाज भवन के बाहर।"
कमरा चुप हो गया।
माँ की खाँसी भी रुक गई। जैसे उन्होंने भी सुन लिया हो।
पापा के हाथ पंखे के तार पर थे, और वो हिले नहीं। बस आँखें झुकी रहीं।
"मैंने देखा," काजल ने कहा, "कि पापा उस इमारत से बाहर आ रहे थे। शाम थी। उनकी चप्पल टूटी हुई थी। वो सीढ़ियों पर बैठे थे, और वो रो रहे थे। अंकुश, पापा रो रहे थे।"
मेरा गला सूख गया।
"और मैं वहीं खड़ी रही," उसने कहा। "सड़क के उस पार। मैं बस खड़ी रही। मैं उनके पास नहीं गई। मैंने उनसे नहीं पूछा। मैं घर आ गई और खाना बनाया जैसे कुछ हुआ ही नहीं।"
उसने बैग को कंधे पर लटकाया।
"और तू जानता है सबसे बड़ी बात क्या है?" उसने कहा। "पापा ने भी मुझसे कुछ नहीं कहा। अगले दिन सुबह मैंने उनके लिए चाय बनाई, वो चुपचाप पी गए। मैंने कहा — पापा आज जल्दी आना। वो बोले — हाँ। बस हाँ।"
वो एक कदम आगे आई।
"मैं पाँच महीने से यही सब सह रही हूँ। और तू?" उसने कहा। "तू मेरे साथ कुछ नहीं बाँटता। तू अपनी दुकान, अपनी घंटी, अपनी काग़ज़, अपनी सब चीज़ें अकेले ढोता है। तूने मुझे कभी नहीं बताया कि तेरी रातें कहाँ जाती हैं।"
"मैं तुझे बचाने के लिए—"
"मुझे बचाने के लिए?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार गुस्सा आया। "अंकुश, मैं नर्सिंग पढ़ रही हूँ। मैं मरीज़ देखती हूँ। मैं उन लोगों के साथ खड़ी रहती हूँ जिन्हें कोई नहीं बताता कि उन्हें क्या हुआ है। मुझे बचाने की ज़रूरत नहीं है। मुझे बस सच बताने की ज़रूरत है।"
मैंने कुछ कहना चाहा। कुछ भी। पर मेरे मुँह से निकला सिर्फ़, "तू कहाँ जा रही है?"
उसने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
फिर वापस मेरी तरफ़।
"उस आदमी के पास," उसने कहा।
"कौन सा आदमी?"
"जिसने पापा को रुलाया था।"
मेरे पैरों तले फर्श खिसक गया।
"काजल, तू पागल हो गई है—"
"मैं पाँच महीने से पागल हूँ," उसने कहा। "अब मैं पागल नहीं रहूँगी। अब मैं जाकर उससे सीधे पूछूँगी — तुमने मेरे पापा से क्या काम करवाया था? कौन सा काग़ज़ था जिस पर उनका अंगूठा है? और तुमने उन्हें क्या देने का वादा किया था?"
"तू उसके घर जाएगी—"
"हाँ।"
"अकेली—"
"हाँ।"
"अंधेरे में—"
"अंधेरा है तब जब कोई सामने आकर सच नहीं बोलता," उसने कहा। "मैं दरवाज़े पर जाकर खड़ी हो जाऊँगी और कहूँगी कि मैं शंकर यादव की बेटी हूँ। बस। मुझे कोई डर नहीं है।"
और तभी पापा बोले।
"डरना चाहिए।"
तीन शब्द।
बस तीन।
पर वो तीन शब्द कमरे में ऐसे गिरे जैसे छत का कोई हिस्सा टूटकर गिरा हो।
काजल रुकी।
पापा ने सिर उठाया। पंखे की हवा उनके चश्मे के टेप को हिला रही थी। पर उनकी आँखें साफ़ थीं — पहली बार साफ़। जैसे महीनों की धूल एक झटके में उतर गई हो।
"काजल," उन्होंने कहा। "बैठ।"
"पापा—"
"बैठ," उन्होंने दोहराया।
वो बैठ गई। बैग गोद में रखकर।
माँ किचन से निकलकर आईं। उनका रुमाल हाथ में था। वो दीवार के सहारे खड़ी रहीं। कुछ नहीं बोलीं। बस खड़ी रहीं, जैसे उन्हें पता हो कि आज रात वो सब कुछ सुनेंगी जो वो पिछले पंद्रह साल से बचा रही थीं।
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