The Mysterious Bell – Chapter 53
"तो मत कह।"
"फिर क्या फ़ायदा?"
"फ़ायदा ये है," मैंने कहा, "कि वहाँ खड़ा होकर तुझे ये दिखेगा कि तेरा भाई तेरे पीछे है। बाक़ी तू अपने हिसाब से कर।"
कुछ देर वो चुप खड़ी रही।
फिर उसने बैग कंधे से उतारा और उसे सोफे पर रख दिया। मगर उसने बैग खोला नहीं, चेन खुली ही छोड़ दी, जैसे वो कहे रही हो कि ये फ़ैसला अभी टला है, खत्म नहीं हुआ।
"चल," उसने कहा।
मैंने घड़ी देखी। मगर मुझे कुछ और दिख रहा था।
मुझे दिख रहा था पापा बैठे हुए — उन्होंने तार उठाया था और अब वो उसे धीरे-धीरे जोड़ रहे थे, मगर उनके हाथ काँप रहे थे, और वो काँपना मुझे छत पर सुनाई दी चौथी आवाज़ जैसा लगा, वो आदमी जो कुछ कहते-कहते रुक गया था।
"पापा," मैंने कहा।
उन्होंने सिर नहीं उठाया।
"मैं काजल के साथ जा रहा हूँ," मैंने कहा। "और लौटकर आपसे बात करूँगा। वो काग़ज़ मेज़ पर है और आप जानते हैं कौन सा काग़ज़। आप चाहें तो अभी जाकर उसे फाड़ दीजिए, मैं कुछ नहीं कहूँगा। पर जब मैं लौटूँगा तो सवाल वैसे ही रहेगा।"
पापा ने तार हाथ में पकड़े रखा।
"इस घर में सब कुछ टूटा हुआ है," मैंने धीरे से कहा। "बस मुझे अब तक पता नहीं चला था।"
और ये कहकर मैं काजल के साथ बाहर निकल गया।
गली में हवा ठंडी थी। पीपल के पत्ते हिल रहे थे। उस्ताद की दुकान के बाहर ज़ंग लगा ताला झूल रहा था। शबनम आपा की गुमटी की बत्ती बुझ चुकी थी, सिर्फ़ उनकी कुर्सियाँ वहाँ पड़ी थीं, उलटी हुई, जैसे कोई रात भर के लिए पीठ फेरकर सो गया हो।
काजल मेरे बगल में चल रही थी। हम दोनों चुप थे।
पहले मोड़ पर उसने कहा, "तू डर रहा है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"मुझे अच्छा लगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि तू हमेशा डर नहीं रहा होता," उसने कहा। "और मुझे लगता था कि डर सिर्फ़ मुझे ही आता है।"
मैं हँस पड़ा। ऐसी हँसी जिसमें हँसी कम थी।
"काजल," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर वहाँ कुछ ऐसा निकले जो तू सुनना नहीं चाहती, तो?"
वो कुछ कदम चुप चली। फिर बोली, "तो भी सुनूँगी। अंकुश, मैं पाँच महीने से उस दिन को जेब में लेकर घूम रही हूँ। तुझे पता है कैसा लगता है?"
"कैसा?"
"ऐसा लगता है," उसने कहा, "जैसे मैंने कोई चीज़ चुराई हो। और मैंने कुछ नहीं चुराया। मैंने सिर्फ़ देखा। मैंने सिर्फ़ अपने पापा को रोते हुए देखा, और उसके बाद से मैं ऐसे चल रही हूँ जैसे किसी की गलती मेरी हो।"
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
वो झिझकी नहीं। उसने अपनी उँगलियाँ मेरी उँगलियों में दबा दीं। बस एक पल के लिए। फिर छुड़ा लीं।
"चल," उसने कहा। "देर हो रही है।"
और हम चल पड़े — उस गली से, जिसका नाम साइकिलों की गली है, जहाँ हर घर में कोई चीज़ टूटी पड़ी है और हर आदमी सोचता है कि सिर्फ़ उसी के घर में टूटा है।
पीछे घर में माँ चूल्हा बंद कर रही थीं और पापा तार जोड़ रहे थे।
और मेरी जेब में घंटी ठंडी पड़ी थी, खाली, बिना अंक, बिना जवाब।
बस एक बात वो मुझे नहीं बता पाई थी, और मुझे लग रहा था कि वही सबसे ज़रूरी थी।
कि आज रात टूटने वाला काजल का भरोसा किस पर था।
मुझ पर।
या पापा पर।
या उस आदमी पर, जिसकी इमारत के बाहर उसकी बड़ी तस्वीर टँगी है, और जो हर तसवीर टँगी है, और जो हर तस्वीर में हाथ जोड़कर खड़ा रहता है।
हम घर पहुँचे तो रात ग्यारह बज चुकी थी।
दरवाज़ा खुला था। माँ चूल्हा बंद कर रही थीं, और पापा फर्श पर बैठे पंखे का तार जोड़ रहे थे। पंखा खुला पड़ा था — बीच से चक्कर निकला हुआ, तार टूटा हुआ।
काजल चुपचाप अंदर चली गई।
माँ ने सिर उठाकर देखा।
"इतनी देर?" उन्होंने कहा। "दोनों के दोनों कहाँ थे?"
"दुकान पर काम था," मैंने कहा।
"काम," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो मुझे बचपन से डराती आई है — सवाल जो सवाल नहीं, जाँच होता है। "अंकुश, मुझे बेवकूफ़ मत बना। तेरी आँखें देख रही हूँ।"
"माँ, आज रात नहीं।"
"आज रात नहीं क्यों?"
"क्योंकि आज रात मुझे भी नहीं पता," मैंने कहा।
वो एक पल मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने चूल्हे की आख़िरी आँच बुझाई, हाथ पोंछा, और बोलीं, "खाना रखा है। ठंडा मत खाना।"
"अच्छा।"
"और अंकुश—"
"हाँ?"
"तेरी बहन आज कुछ बोली नहीं," माँ ने कहा। "ना आते हुए, ना खाते हुए। कुछ हुआ है?"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो पंखे के तार पर झुके थे। पर उनके हाथ रुके हुए थे। बस रुके हुए। जैसे तार जोड़ना छोड़कर वो कान लगाकर सुन रहे हों।
"नहीं," मैंने कहा। "थक गई होगी।"
माँ ने मुझे देखा। फिर पापा को। फिर कुछ नहीं बोलीं।
और मैं उनके चेहरे पर वो चीज़ साफ़ पढ़ सकता था जो वो कभी नहीं कहतीं — कि उन्हें सब पता है, और वो सिर्फ़ इसलिए चुप हैं क्योंकि घर में एक सच ऐसा है जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से ढका हुआ है, और अब वो सच उनके हाथ के नीचे से धीरे-धीरे बाहर निकल रहा है।
मैंने खाना नहीं खाया।
मैं सीधे छत पर चला गया।
छत सीढ़ियों से सटी थी — चार कदम, और ऊपर आसमान। उस रात आसमान में बादल थे, तारे कहीं छिपे हुए थे, और गली की बत्तियाँ पीली पड़ी थीं, जैसे बहुत देर से जल रही हों और अब उन्हें भी नींद आ रही हो।
मैं छत की मुंडेर पर बैठ गया।
पैर लटका दिए।
नीचे पूरी गली दिख रही थी। पीपल का पेड़ अंधेरे में एक बड़ी साया जैसा खड़ा था। पत्थर की चबूतरी खाली थी। उस्ताद की दुकान का शटर बंद। शबनम आपा की गुमटी पर कल का कोई बर्तन सूखने के लिए उलटा रखा था, जो हवा में हल्का-हल्का हिल रहा था।
और दूर, नई बस्ती की तरफ़, भारद्वाज भवन की बत्तियाँ जल रही थीं।
रात के ग्यारह बजे भी। जल रही थीं।
मैंने जेब से घंटी निकाली।
वो मेरी हथेली में ठंडी पड़ी थी। छोटी, पीतल की, जंग लगी। उस पर उँगली रखी तो लगा जैसे किसी बूढ़े आदमी की नाड़ी छू रहा हूँ।
"सुन," मैंने कहा।
कुछ नहीं।
"मैं जानता हूँ तू सुन रही है। तू हमेशा सुनती है।"
अबकी बार हल्की सी एक झंकार आई। जैसे कोई बहुत दूर किसी दरवाज़े पर लगी घंटी अपने आप हिल जाए।
"मुझे दस अंक खर्च करने हैं," मैंने कहा।
घंटी चुप रही।
"वो शक्ति," मैंने कहा। "टूटने से पहले की आवाज़। तूने कहा था, चौबीस घंटे पहले पता चल जाता है कि कौन सी चीज़ या रिश्ता टूटने वाला है। मुझे वो चाहिए।"
फिर वो बोली।
आवाज़ बहुत धीमी थी, जैसे किसी ने मेरे कान के अंदर, बहुत अंदर, रेत पर उँगली से लिखा हो।
"दिखाऊँगी।"
मैंने साँस रोकी।
"बचाऊँगी नहीं।"
"मतलब?"
"मतलब," घंटी ने कहा, "मैं सिर्फ़ आवाज़ देती हूँ। हाथ तेरे हैं। पैर तेरे हैं। और जो टूटने वाला है, उसे जोड़ने का फ़ैसला भी तेरा है।"
"अगर मैं न जोड़ पाया?"
"तो टूट जाएगा।"
"इतना सीधा?"
"इतना सीधा।"
मैंने मुंडेर पर हाथ रखा। पत्थर ठंडा था। मेरी हथेली गरम थी। दोनों के बीच नमी जम रही थी।
"दस अंक," मैंने कहा। "एक ही बार?"
"एक ही बार।"
"और बाद में?"
"बाद में तेरे पास कुछ नहीं बचेगा। फिर से जोड़ना पड़ेगा। फिर से कमाना पड़ेगा।"
मैं हँसा। बिना मज़ाक के।
"तू बहुत महँगी है, तू जानती है?"
"मैं सस्ती होती," घंटी ने कहा, "तो लोग मुझे रोज़ बजाते।"
मैं कुछ देर चुप बैठा रहा।
ऊपर बादल धीरे-धीरे खिसक रहे थे। कहीं दूर किसी घर से टीवी की आवाज़ आ रही थी। किसी के बच्चे के रोने की आवाज़ आई, फिर बंद हो गई। नीचे गली में एक कुत्ता भौंका, फिर चुप।
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