The Mysterious Bell – Chapter 509
काजल ने अपना मुँह दुपट्टे से ढक लिया। माँ ने कुछ नहीं कहा, बस पलटकर रसोई की तरफ़ चल दीं, और जाते वक़्त उनका हाथ दरवाज़े की चौखट पर टिका रह गया — जैसे उन्हें सहारा चाहिए था, पर वो किसी से माँगना नहीं चाहती थीं।
शाम को उस्ताद आए।
उन्होंने कार्ड देखा, बिना चश्मा उतारे, बहुत देर तक। फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"बुलावा सुनहरा हो," उन्होंने कहा, "तो जाल भी सुनहरा होता है।"
"मैं जा रहा हूँ, उस्ताद।"
"पता है।" उन्होंने चश्मा उतारा। "मैं तुझे रोकने नहीं आया। मैं ये बताने आया हूँ कि जब पचास साल पहले मेरे भाई ने वो घंटी बजाई थी — नहीं, हमने साथ बजाई थी — तो हम सोचते थे कि हम दुनिया के सबसे बड़े कारीगर हैं। फिर एक शाम एक आदमी आया, मिठाई की डिब्बी लेकर। साफ़ कपड़े, मीठी बात, और वो बोला कि तुम दो भाई मिलकर कितना अच्छा काम कर सकते हो अगर तुम्हें सही जगह मिल जाए।"
"फिर?"
"फिर हमने एक-दूसरे को सही जगह से हटा दिया," उन्होंने कहा। "और वो जगह ख़ाली रह गई। बस कुर्सी रह गई।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मंच पर जब वो तुझे बुलाए," उस्ताद ने कहा, "तो वो तुझे बुला नहीं रहा होगा। वो तेरे पीछे खड़े लोगों को बुला रहा होगा। वो उन्हें दिखाना चाहता है कि तू उसका हो गया। इसीलिए तू अकेला जा। और अगर गली आए, तो उन्हें भीतर तक मत आने दे।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब गली भीतर आती है," उन्होंने धीरे से कहा, "तब गली टूटती है।"
रात नौ बजे मैंने अपनी दुकान का शटर खोलकर रोशनी जलाई।
यह मेरी आदत है। जब दिमाग़ भारी होता है, तो मैं दुकान पर आ जाता हूँ। औज़ार सामने रख लेता हूँ। कोई पुरानी चीज़ मरम्मत के लिए पड़ी हो, तो उसे उठा लेता हूँ। आज पड़ी थी एक पुरानी रिम, जिसकी तीलियाँ मुड़ी हुई थीं। मैं उसे सीधा करने लगा — हाथ से, धीरे-धीरे, ताकि कहीं चटक न जाए।
टिंकू सामने स्टूल पर बैठा था, मुझे देख रहा था।
"उस्ताद।"
"हँ।"
"मंच पर तू क्या बोलेगा?"
मैंने रिम को एक तरफ़ रखा।
"पता नहीं," मैंने कहा। "शायद कुछ नहीं।"
"तो फिर जाने का क्या फ़ायदा?"
"फ़ायदा नहीं है," मैंने कहा। "बस एक बात है। जब तक तू दुश्मन को दूर से देखता है, वो बड़ा लगता है। जब पास जाकर देखता है, तो पता चलता है कि वो भी आदमी है — पसीना बहाता है, नींद लेता है, और जूता भी उसका कभी कभी उलटा पहन जाता है।"
टिंकू ने सोचा। फिर बोला, "मैंने सुना है कि साहब के जूते बहुत चमकते हैं।"
"चमकते होंगे," मैंने कहा। "धूल से बचने के लिए।"
वो हँसा। फिर अचानक गंभीर हो गया।
"उस्ताद?" उसने कहा। "अगर वहाँ कुछ हो गया, तो—"
"कुछ नहीं होगा।"
"मैं साथ चलूँगा।"
"तू नहीं।"
"पर उस्ताद—"
"तू नहीं," मैंने कहा, और इस बार आवाज़ में ऐसी बात थी कि वो चुप हो गया। "तू यहाँ रहेगा। क्योंकि अगर मैं वहाँ फँसा, तो मुझे बाहर निकालने वाला कोई चाहिए जो मंच पर न हो। समझा? तू मेरा बैकअप है, टिंकू। हर आदमी को एक बैकअप चाहिए।"
उसकी आँखें चमक गईं। वो सीधा बैठ गया, जैसे किसी ने उसे तरक़्क़ी दे दी हो।
ग्यारह बजे के क़रीब मैंने शटर गिराया।
दुकान के पीछे वाले कमरे में बल्ब जल रहा था, जो गुनगुनाता है। मैं चारपाई पर बैठा और घंटी जेब से निकालकर सामने रख ली।
"कल," मैंने कहा। "मंच। बोलना है या नहीं?"
घंटी चुप रही।
"अगर मैं नहीं बोलूँगा, तो सब कहेंगे कि डर गया।"
और फिर, बहुत धीमी आवाज़ में घंटी ने कहा, "जो चुप रहता है, वो हमेशा डरा हुआ नहीं होता। कभी कभी वो सुन रहा होता है।"
मैं मुस्कुराया।
"तू मुझे तसल्ली दे रही है?"
"नहीं," घंटी ने कहा। "मैं तुझे याद दिला रही हूँ।"
पौने बारह बजे गली में स्कूटर की आवाज़ आई।
मैं उठकर खिड़की तक गया। अंधेरे में सिर्फ़ एक सफ़ेद शर्ट और एक पान चबाता साया दिखा — वही स्कूटर वाला आदमी, जो शाम को थाने के मोड़ पर बैठा था। स्कूटर बाहर, दुकान के सामने रुका।
फिर शटर के नीचे कुछ सरका।
मैं दरवाज़ा खोलकर बाहर आया। स्कूटर जा चुका था, बस धूल का बादल बचा था और दूर जाती लाल बत्ती।
शटर के नीचे एक छोटा लिफ़ाफ़ा पड़ा था। सादा, बिना नाम, बिना मोहर। फटा नहीं, मुड़ा नहीं। जैसे कोई बहुत हिम्मत से सरकाकर गया हो।
मैंने उसे उठाया और अंदर आकर बल्ब के नीचे खोला।
अंदर एक छोटी पर्ची थी। मोटे काग़ज़ पर बड़े अक्षरों में एक ही लाइन लिखी थी —
मंच पर तेरी घंटी बजेगी, और तू चुप रहेगा।
मैंने उस पर्ची को देर तक देखा। मेरी उँगलियाँ उस पर स्थिर थीं, पर अंदर कुछ हिल रहा था।
फिर मैंने धीरे से जेब में हाथ डाला और घंटी सामने रखी।
"ये सुन," मैंने कहा। "वो कह रहा है कि तू बजेगी।"
घंटी बहुत देर चुप रही। इतनी देर कि मुझे लगा वो सो गई है, या नाराज़ है, या शायद उसके पास भी इसका जवाब नहीं है।
फिर उसने कहा — और उसकी आवाज़ बहुत ठंडी थी, ऐसी ठंडी जैसी सुबह की पहली धातु:
"तो वो जानता है, तू कब चुप रहता है।"
मैंने पर्ची मेज़ पर रख दी।
कमरे के बाहर, गली में, पीपल के नीचे जलती उस छोटी आग की रोशनी दरवाज़े की दरार से अंदर आ रही थी — पीली, थरथराती, जैसे कोई उँगली मुझे इशारा कर रही हो।
मैंने बल्ब बुझाया।
और अंधेरे में, एक बार फिर, मैंने वो लाइन पढ़ी — मन में, शब्द-शब्द।
मंच पर तेरी घंटी बजेगी, और तू चुप रहेगा।
॥
उस रात मैंने आँख नहीं बंद की।
चारपाई पर लेटा रहा, छत को देखता रहा, और बार-बार वही लाइन सोचता रहा जो उस काग़ज़ पर लिखी थी। मंच पर तेरी घंटी बजेगी, और तू चुप रहेगा। बात छोटी थी, पर उसमें जो ज़हर घुला था, वो मुझे नींद नहीं लेने दे रहा था।
सुबह पाँच बजे माँ का चूल्हा जला।
मैं उठकर बाहर आया तो आँगन में धुआँ था और माँ बैसाखी के सहारे चूल्हे के पास खड़ी थीं। उनका हाथ अब भी काँपता है, चलने में पहले जैसी तेज़ी नहीं है, पर ज़ुबान वही है — सीधी, बिना पानी मिलाई।
"कपड़े रखे हैं तेरे लिए," उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "इस्त्री कर दिए हैं। जो पहनकर जाना है, पहन ले।"
"माँ, वो समारोह है, शादी नहीं।"
"समारोह में भी आदमी कपड़े पहनकर ही जाता है।" उन्होंने तवा उठाया। "और सुन, मैंने जो कहा था, वो याद है ना? कोई लिफ़ाफ़ा, कोई काग़ज़, बाप के नाम का कोई काग़ज़ — हाथ में नहीं।"
"याद है, माँ।"
"बोलकर याद है?"
"बोलकर याद है।"
वो एक पल रुकीं। फिर धीरे से बोलीं, "मैं नहीं जा रही। इस शरीर से सीढ़ियाँ नहीं चढ़ेंगी, और वहाँ जाकर किसी की मुस्कान देखने का मन भी नहीं है। पर तू जा। और जब वो मंच से बोले, तब तू उसकी आँख में आँख डालकर देखना। बस इतना करना।"
"इतना ही?"
"इतना ही," उन्होंने कहा। "जो आदमी दूसरों की आँख में देखकर नहीं बोल सकता, उसकी सारी बातें काग़ज़ की होती हैं।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर आवाज़ सख़्त थी।
"और अगर वहाँ कुछ गड़बड़ लगे, तो मंच छोड़कर भागना नहीं। धीरे-धीरे उतरना। भागता हुआ आदमी हारा हुआ दिखता है, चलता हुआ आदमी नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
काजल ने सफ़ेद कमीज़ निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाई। साथ में एक धागा भी।
"ये किसलिए?"
"घंटी के लिए," उसने कहा, जैसे मैंने कोई बहुत आसान सवाल पूछा हो। "जेब के अंदर बाँध दे। मंच पर घंटी गिरी, तो सबसे पहले वही सुनेगा।"
मैंने उसे देखा।
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