The Mysterious Bell – Chapter 496
"जो काग़ज़ात हमारे हाथ में आ रहे हैं, वो सब किसी न किसी दफ़्तर से निकले हैं। अस्पताल की ज़मीन। सात नाम। सात अंगूठे। दादा जी की दुकान। हकीम अली की मोहर। ये सब कहीं न कहीं लिखा हुआ है। और जो लिखा हुआ है, वो मिटाया भी जा सकता है —" मैंने काग़ज़ उठाया — "पर जो पहले ही निकल चुका है, वो नहीं।"
"तो?"
"तो रजिस्ट्री चलते हैं।"
मीरा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा और फिर वो मुस्कुराई — बहुत हल्का, बहुत जल्दी बुझने वाली मुस्कान।
"तुम जानते हो," उसने कहा, "रजिस्ट्री में ज़मीन के काग़ज़ रखे होते हैं, और काग़ज़ पढ़ने के लिए तुम्हें वहाँ के बाबू को ही खुश करना पड़ता है?"
"मुझे बाबू खुश करने का हुनर आता है," मैंने कहा। "मैं साइकिल ठीक करता हूँ। जो हिलता है, उसे कस देता हूँ। जो चरचराता है, उस डिब्बी से तेल डाल देता हूँ। बाबू भी एक मशीन हैं, बस ज़्यादा टेढ़ी।"
मीरा हँसी। उस हँसी में कुछ ज़्यादा राहत थी — जैसे दो दिन से जमी हुई धूल हट गई हो।
मैं जब शटर उठा रहा था तो टिंकू पहुँच गया। पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों के हाथों में कुछ न कुछ था — सानिया के पास उसकी लाल कवर वाली कॉपी, गुड्डू के पास टाट का एक टुकड़ा, रफ़ीक़ के चश्मे में एक काँच, और चिंटू एक पैर में चप्पल पहने हुए।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा। "आज कहाँ?"
"रजिस्ट्री।"
टिंकू ने एक पल आँखें झपकाईं, फिर सानिया की तरफ़ देखा, फिर वापस मेरी तरफ़।
"रजिस्ट्री?" उसने कहा। "वो जगह जहाँ सरकारी काग़ज़ रहते हैं?"
"हाँ।"
"मतलब काग़ज़ों का अस्पताल," टिंकू ने कहा, और उसने अपना सीना फुला लिया। "जहाँ पुराने काग़ज़ जाकर कराहते हैं — उफ़, मेरी स्याही सूख गई, उफ़, मेरा कोना मुड़ गया।"
गुड्डू तुरंत हँसा। सानिया ने टिंकू की पीठ पर हल्की चपत लगाई।
"तुम सब नहीं चलोगे," मैंने कहा।
"क्यों नहीं?" सानिया बोली। "हमें कोई काम नहीं देते, तो हम खुद काम ढूँढ लेते हैं।"
"रजिस्ट्री में बच्चों को घुसने नहीं देते।"
"अच्छा?" टिंकू ने कहा। "तो हम घुसेंगे नहीं। हम बाहर बैठेंगे। जैसे जासूस बैठते हैं। बाहर किसी को भेजो, बाहर वाला बाहर का काम करेगा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने कंधे उचकाए — मतलब, तुम्हारी मर्ज़ी।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर तीन शर्तें। एक — बाहर बैठोगे, अंदर नहीं। दो — किसी से झगड़ा नहीं। तीन — जो दिखे, नोट करो और मुझे बताओ, अपने दिमाग़ से कहानी मत बनाओ।"
"और चौथी शर्त," टिंकू ने कहा। "अगर कोई बड़ा आदमी आए, तो हम बात नहीं करेंगे, बस खाँसेंगे।"
"खाँसेंगे क्यों?"
"ताकि आपको पता चले," उसने कहा, बड़ी सीधी आवाज़ में। "अंदर बैठे आदमी को खाँसी सबसे पहले सुनाई देती है।"
मुझे ये बात इतनी अच्छी लगी कि मैं एक पल कुछ नहीं बोल सका।
रजिस्ट्री दफ़्तार गली से दूर नहीं है। बस एक बड़ा सा पुराना कमरा, ऊँची छत, और इतने रैक कि लगे पूरा कमरा ही लकड़ी के पिंजरों से बना हो। ऊपर एक पंखा घूमता है, जो इतनी धीमी रफ़्तार से घूमता है कि लगे आराम कर रहा हो। दीवार पर एक ट्यूबलाइट है, जिसके दोनों सिरे काले पड़ गए हैं। और पूरे कमरे में एक गंध है — पुराने काग़ज़ की, हल्की सीलन की, और उसके ऊपर कुछ ऐसा जो दवा की दुकान जैसा लगता है।
बाहर बेंच पर मेरे पाँचों जासूस बैठ गए। चिंटू ने अपनी एक चप्पल उतारकर सिरहाने रख ली।
अंदर एक ही आदमी बैठा था।
सत्तर के आसपास। सफ़ेद बाल, बहुत पतले चश्मे, कान के पीछे एक पेंसिल और नीले रंग का आधा स्वेटर जिसके कोहनी पर छेद है। उसके सामने रजिस्टरों का ढेर था और उसके हाथ में एक कलम थी, जिससे वो बड़ी धीरे-धीरे लिख रहा था — जैसे हर अक्षर पर उतना ही वक़्त दे रहा हो जितना होता है।
"भवानी प्रसाद जी?" मैंने कहा।
उसने सिर उठाया।
"हाँ। क्या काम है?"
"पुराने रिकॉर्ड देखने हैं। ज़मीन के।"
"कौन सी ज़मीन?"
"पीपल के पीछे वाली गली। साइकिल गली। और उसके मुहाने पर पुराना दवाखाना — नूर अस्पताल।"
कलम रुक गई।
धीरे-धीरे, बिना आवाज़ के, रुकी।
भवानी प्रसाद ने चश्मा ठीक किया। फिर उसने रजिस्टर बंद किया। फिर उसने कलम का ढक्कन लगाया। फिर उसने ढक्कन वापस खोला। इस पूरे वक़्त में उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
"वो रिकॉर्ड बंद हैं," उसने कहा।
"बंद मतलब?"
"बंद मतलब बंद," उसने कहा। "किसी ने खोलने को नहीं कहा।"
"किसने बंद किया?"
"ऊपर से।"
"ऊपर कौन?"
अब उसने देखा। उसकी आँखें छोटी थीं, पर उनमें वो सफ़ाई थी जो सिर्फ़ उन आदमियों की आँखों में होती है जो सालों से काग़ज़ों के बीच बैठकर सच देखते आए हैं और बोलना भूल गए हैं।
"बेटा," उसने कहा। "तुम किस लिए आए हो, ये तुम जानते हो। पर मैं किस लिए चुप बैठा हूँ, ये तुम नहीं जानते। और यही बात मुझे डराती है।"
मैंने कुर्सी खींची और उसके सामने बैठ गया।
"भवानी जी," मैंने कहा। "मैं साइकिल ठीक करता हूँ। गली के मोड़ पर। मेरा नाम अंकुश यादव है।"
उसके हाथ फिर रुके।
"यादव?"
"हाँ।"
"जगदीश यादव के?"
मैंने घंटी जेब में महसूस की। वो ठंडी थी।
"दादा जी," मैंने कहा।
भवानी प्रसाद ने दोनों हाथ मेज़ पर रखे। उसके हाथ सूखे थे, पतली नसें बाहर उभरी हुईं। वो कुछ देर चुप रहा, फिर उसने इतनी धीमी आवाज़ में कहा कि जैसे खुद से बोल रहा हो।
"जगदीश यादव का नाम मैंने कई बार तलाश किया है। कुछ रजिस्टरों में है। कुछ में नहीं है। और जहाँ नहीं है, वहाँ उसके पहले भी नाम है और बाद भी, पर बीच में —" उसने दो उँगलियाँ मिलाईं और फिर फैला दीं — "बीच में जगह खाली है।"
"यानी काटा गया है।"
"मैंने ये नहीं कहा," उसने कहा, बहुत जल्दी। "मैंने सिर्फ़ ये कहा कि जगह खाली है।"
मीरा ने तभी आगे कदम बढ़ाया। वो जानती थी कि ये लम्हा कब आता है, और वो उसे बर्बाद नहीं करना चाहती थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस अपना थैला खोला और पीले पन्ने को, दोनों हाथों से, बड़ी सावधानी से मेज़ पर रख दिया।
भवानी प्रसाद ने पहले पन्ने को देखा। फिर उसका चश्मा। फिर वो झुका।
और उसके हाथ से कलम गिर गई।
कलम मेज़ के किनारे से फिसली, कुर्सी की टाँग से टकराई और फ़र्श पर लुढ़क गई। आवाज़ छोटी थी, पर उस कमरे में ऐसी लगी जैसे किसी ने ताला तोड़ा हो।
भवानी प्रसाद ने कलम उठाने की कोशिश नहीं की।
"ये कहाँ से आया?" उसने कहा। उसकी आवाज़ फट गई थी। "ये — ये तो —"
"आप इसे पहचानते हैं?" मीरा ने कहा।
"मैंने ये नहीं देखा," उसने कहा, बहुत जल्दी, और अपना हाथ मेज़ से हटा लिया। "मैंने इसे कभी नहीं देखा। ये जिसके पास है, उससे पूछो।"
"भवानी जी," मैंने कहा। "आपका हाथ काँप रहा है।"
वो अपनी हथेली को दूसरी हथेली से दबाने लगा।
"उम्र है," उसने कहा।
"उम्र से कलम नहीं गिरती," मैंने कहा, बहुत आराम से। "उम्र से हाथ हिलते हैं। कलम तब गिरती है जब अंदर कुछ खिसक जाए।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उस दृष्टि में एक पल के लिए कुछ और निकला — कुछ ऐसा जो कई सालों से बोझ के नीचे दबा था और अब ऊपर आना चाहता था।
"तुम्हें क्या चाहिए?" उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।
"अस्पताल की ज़मीन का सबसे पुराना रिकॉर्ड। जो हकीम साहब के नाम से है। सात नामों वाला। सात अंगूठों वाला। और उसमें जो शर्त लिखी है।"
भवानी प्रसाद ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने अपने चारों तरफ़ देखा — खिड़की, दरवाज़ा, पंखा, काग़ज़ों के रैक। जैसे किसी को देख रहा हो जो वहाँ नहीं है।
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