The Mysterious Bell – Chapter 494
फिर पापा ने धीरे से कहा, "ये काग़ज़ — अभी दुबे अंकल को नहीं देना।"
मैं उठ खड़ा हुआ।
"क्या?"
"सुबह भी नहीं।" उनकी आवाज़ सपाट थी। "आज नहीं।"
उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सिकुड़ी हुई थीं, पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
मीरा ने कहा, "पापा जी, ये काग़ज़ अकेला नहीं है। इसके साथ सात पन्ने हैं। सलीम बक्श का रजिस्टर है। गोविंद भाई हैं। सब सुबह दस बजे इकट्ठे हो रहे हैं। अगर ये पन्ना उनके सामने नहीं आया —"
"मीरा," मैंने कहा। मैंने उसे रोक दिया।
वो मेरी तरफ़ देखकर चुप हो गई। पर उसकी आँखों में वो बात थी जो मुझे भी अंदर से खा रही थी। सब कुछ सामने आ रहा है, और ठीक जिस वक़्त सामने आने की ज़रूरत है, पापा कह रहे हैं ठहर जाओ।
मैंने गोविंद भाई को देखा। गोविंद भाई मेरी तरफ़ देख रहे थे और उनकी आँखों में पानी था। वो मुझे देख रहे थे जैसे कह रहे हों — बेटा, मैं जानता हूँ क्यों, पर मेरी ज़ुबान से नहीं निकलेगा।
पापा ने एक कदम पीछे हटाया फिर वो दरवाज़े से हटकर बाहर की तरफ़ मुड़ गए।
"पापा," मैंने कहा और उनके पीछे चल दिया।
मुझे पीछे से उस्ताद की आवाज़ आई — "अंकुश।"
मैं रुका। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उस्ताद ने बस सिर हिलाया। जैसे कह रहे हों — जाओ, पर हिसाब याद रखना।
मैं बाहर निकला।
दुकान बंद थी। शटर गिरा हुआ था। बाहर गली में रात की ठंडक आ गई थी और पीपल के नीचे कोई बूढ़ा अपनी तपेरी जला रहा था। उस छोटी सी आग के पीले उजाले में गली की छायाएँ अजीब नाच रही थीं। दूर कहीं किसी का रेडियो बज रहा था — बहुत धीमे, जैसे कोई बूढ़ा रात में अपने आप से बात कर रहा हो।
पापा दुकान के पीछे की तरफ़ जा रहे थे। वो छत जहाँ से पूरी गली दिखती है, वहाँ की सीढ़ियाँ दुकान के पीछे से जाती हैं। पापा सीढ़ी के पहले पाये पर हाथ रखकर रुके। फिर मुड़े। उन्होंने मुझे देखा। फिर मेरे पीछे देखा — टिंकू पीछे आ रहा था, दुबला, आधी रात में भी चश्मा लगाए हुए, जो गुप्तचर के भेस में उसने पहना था और उतारना भूल गया था।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू जा। सानिया को लेकर घर जा।"
"पर उस्ताद —"
"टिंकू।"
वो रुका। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, पापा की तरफ़ देखा, और धीरे से कहा, "ठीक है। पर मैं तेरे पीछे हूँ। दूर से। दिखूँगा नहीं।"
वो चला गया। उसकी चप्पलों की आवाज़ धीरे-धीरे मिट गई।
पापा अब भी सीढ़ी के पाये पर हाथ रखे खड़े थे।
"तूने मीरा को बुलाया था?" उन्होंने पूछा।
"हाँ।"
"और गोविंद को?"
"वो खुद आए थे।"
पापा ने सिर हिलाया। फिर उन्होंने वो हाथ सीढ़ी से हटाया और अपनी कमीज़ की जेब में डाला। उनकी जेब फटी हुई थी। उनका अंगूठा जेब के किनारे से रगड़ खा रहा था, जैसे किसी पुरानी आदत से।
मैंने सीधा पूछा। बिना घुमाए।
"पापा, आपने अंगूठा पहचाना?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। एक पल। दो पल।
फिर उन्होंने मुँह फेर लिया।
"नहीं।"
पर वो "नहीं" उनके मुँह से ऐसा निकला जैसे कोई लकड़ी की पट्टी बीच से चटक जाए। आधा शब्द मुँह में रह गया, आधा बाहर आया। और उस आधे शब्द में जो आवाज़ थी, वो मुझे ठीक वैसे ही लगी जैसे कोई पुराना ताला अंदर से खड़खड़ा रहा हो। चाबी नहीं घूम रही, बस अंदर से कोई दबा हुआ कुंडा हिल रहा हो।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
मुझे लगा कि मेरे अंदर कुछ अटक गया है। जैसे साँस ठीक जगह से आगे नहीं जा रही। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी। ठंडी। चुप।
"पापा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें ज़िद थी। "आप झूठ बोल रहे हैं।"
वो रुके।
"मैंने आपको कभी झूठ बोलते नहीं देखा," मैंने कहा। "और मैंने आपको कभी ऐसे डरते भी नहीं देखा। जब आपने उस काग़ज़ पर अंगूठा लगाया था — उस रात भी आप ऐसे नहीं डरे थे। आपने मुझे बताया था कि मजबूरी थी। मैंने आपको माफ़ कर दिया था। फिर अब क्या है जो आप मुझसे छिपा रहे हैं?"
पापा ने मुँह नहीं खोला।
वो सीढ़ी की तरफ़ मुड़े। फिर रुके।
और फिर वो बोले — इतने धीमे कि मुझे लगा कि हवा बोल रही है, कोई आदमी नहीं।
"बेटा, वो अंगूठा मेरा नहीं है।"
मैंने साँस रोक ली।
"पर वो काग़ज़," उन्होंने कहा और उनकी आवाज़ टूट गई, "मेरे डर से जुड़ा है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो सीढ़ी के पहले पाये पर पैर रख चुके थे। उनका पैर काँप रहा था। उन्होंने दूसरा पैर भी रखा और सीढ़ी पर चढ़ने लगे।
मैं पीछे खड़ा रह गया।
मेरी जेब में घंटी थी। और घंटी, जो अभी तक चुप थी, बहुत धीरे से बोली — "दरवाज़ा अब भी बंद है।"
मैंने सीढ़ी से ऊपर देखा। पापा की परछाईं छत पर जा रही थी। और मेरे सीने पर लटकी वो पुरानी काली चाबी, ठंडी होकर, मेरी हड्डी पर टिक गई।
मैंने उसे हाथ में लिया। मैंने उसे गौर से देखा। वो चाबी आज पहली बार मुझे बोलती लगी — पर मैं उसकी भाषा नहीं जानता था।
और ऊपर छत पर, पापा के जाने के बाद, एक बार फिर गली की हवा में कुछ ऐसा हिला जैसे कोई बहुत पुराना काग़ज़ अपनी तह खुद खोल रहा हो।
छत की सीढ़ियाँ पुरानी थीं। हर पायदान पर पैर रखते ही आवाज़ आती थी, जैसे कोई सूखी लकड़ी अंदर से कराह रही हो। मैं धीरे-धीरे चढ़ा।
ऊपर पहुँचा तो हवा ने मुँह पर हल्का सा थप्पड़ मारा। ठंडी, गीली, और उसमें वो गंध थी जो पुराने काग़ज़ों से आती है — जैसे सालों से बंद किसी संदूक का मुँह खुल गया हो।
पापा पानी की टंकी के पास बैठे थे। पीठ मेरी तरफ़। पीले काग़ज़ को दोनों हाथों में पकड़े हुए। उनका अंगूठा उस पर फिर-फिर घूम रहा था — उसी जगह, जहाँ वो धुँधला निशान था। जैसे कोई आदमी अपनी ही पुरानी कब्र पर हाथ फेर रहा हो।
मैंने पैर की आवाज़ नहीं की। पर वो जान गए।
"बैठ जा," उन्होंने कहा, बिना मुड़े।
मैं बैठ गया। छत पर पड़ी एक पुरानी ईंट पर।
कुछ देर सिर्फ़ गली की आवाज़ें रहीं। कहीं बर्तन गिरा। कहीं कोई हँसा। और उस सबके ऊपर एक ही चीज़ — पापा की साँस, जो लंबी खींच रहे थे, जैसे गोता लगाने से पहले आदमी खींचता है।
"तेरे दादा जी की दुकान थी," पापा बोले। "और उस दुकान पर एक आदमी आता था। हर महीने के तीसरे बुधवार। कभी सामान नहीं खरीदता था। बस बैठता था, चाय पीता था, और जाते वक़्त मेज़ पर एक काग़ज़ रख देता था।"
"क्या काग़ज़?"
"वही। पीला। मुड़ा हुआ। और उस पर एक अंगूठा।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"दादा जी उसे खोलते नहीं थे। जलाते भी नहीं थे। एक डिब्बे में रख देते थे। और हर बुधवार उनका चेहरा ऐसा उतर जाता था, जैसे किसी ने दुकान पर ताला लगा दिया हो।"
"फिर क्या हुआ?"
पापा ने काग़ज़ मोड़ना शुरू किया। धीरे। बहुत धीरे। कोने-कोने से। जैसे मोड़ नहीं रहे हों, किसी की हड्डी सीधी कर रहे हों।
"फिर एक दिन दादा जी ने मुझे उस डिब्बे के सामने खड़ा किया और कहा — इसे मत खोलना। जिस दिन खुलेगा, उस दिन तेरी ज़िंदगी दो हिस्सों में बँट जाएगी। और तू कभी नहीं जान पाएगा कि कौन सा हिस्सा असली है।"
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। फिर भी मुझे लगा जैसे वो मेरी जाँघ से चिपक रही है, जैसे कोई कह रहा हो — पूछ। पूछ ले, अंकुश।
"पापा," मैंने कहा, "उस आदमी का नाम?"
पापा पहली बार मुड़े।
उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने कभी नहीं देखा था — न डर, न गुस्सा। सिर्फ़ एक बहुत पुरानी थकान। जैसे कोई आदमी सालों से एक नाम अपनी छाती के अंदर दबाए बैठा हो और अब उसका दबाव न सह पा रहा हो।
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