The Mysterious Bell – Chapter 492
"जाना नहीं। देखा।" उस्ताद ने कहा। "जब कोई बहुत बड़ा आदमी हो, तो उसे जानते नहीं, बस देखते हैं। और एक दिन वो मेरी दुकान पर आए। मेरी माँ की आख़िरी सिलाई के लिए, एक सूट सिलने को। और मैंने उनसे कुछ नहीं पूछा। क्योंकि मैं उस वक़्त अपनी माँ की बीमारी में डूबा था और किसी बड़े आदमी से बात करने का दम नहीं था।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"आज भी जानता नहीं," उन्होंने कहा, "कि वो काग़ज़ उन्होंने दान में दिया या किसी के हाथ बेचा। पर मैं इतना जानता हूँ — जिस आदमी ने ये ज़मीन गरीबों के इलाज के लिए दी, वो इस शहर के किसी स्कूल, किसी दफ़्तर, किसी रिपोर्ट की छत पर बीस लाख का झूठ नहीं लिखवाएगा।"
गोविंद भाई ने कहा, "तो मतलब वो मुहर आज किसी और के हाथ में है।"
उस्ताद ने सिर हिलाया। "यही तो मैं कह रहा हूँ। मुहर पुरानी है, पर जिसने उसे थामा है, वो नया आदमी है। और जो नया आदमी पुरानी मुहर से खेलता है, वो पुराने खेल का ही हिस्सा है।"
मैंने पन्ना फिर उठाया और लैंप के नीचे रखा। इस बार मैंने उस पर बहुत देर तक देखा। उस अँगूठे पर, उस लकीर पर, उस गड्ढे पर। मैं उँगली उस पर फेरता रहा, जैसे कोई अंधा अक्षर पढ़ रहा हो।
और तभी मेरे मन में कुछ अटक गया।
ये वो एहसास नहीं था जो घंटी के साथ आता है। ये कुछ और था। जैसे सुबह उठकर किसी चीज़ को अपनी जगह पर न पाकर, आप आधे घंटे तक उसे ढूँढते रहते हैं — और वो चीज़ आपके सामने रखी होती है, पर आपकी नज़र उसे नहीं पकड़ती।
मैंने अपनी गले की चाबी को कमीज़ के बाहर निकाला और मेज़ पर रखा।
वो चाबी लैंप की रोशनी में चमकी। उसका घिसा हुआ कोना अब साफ़ दिख रहा था। और उस कोने की लकीर।
मैंने पन्ने पर पड़े उस अँगूठे की लकीर और चाबी के कोने की लकीर को आँखों से मिलाया।
दोनों अलग थीं। पर कहीं न कहीं, किसी कोण पर, एक जैसी लगी।
मैंने साँस रोक ली। पर मैं उसे पहचान नहीं पाया। और यही सबसे डरावना था — कि मेरा कुछ अंदर से पहचान रहा था, और मेरा दिमाग़ कह रहा था कि नहीं, तू कुछ नहीं जानता।
मैंने चाबी वापस गले में डाल ली और उस पर कमीज़ का कॉलर चढ़ा दिया।
"मुझे ये अँगूठा नहीं पहचानता," मैंने कहा। "पर कुछ है। कुछ ऐसा है जो अंदर से कह रहा है कि मैं इसे जानता हूँ।"
गोविंद भाई ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में डर आ गया। "ऐसा मत सोचो," उन्होंने कहा। "कभी-कभी दिमाग़ हमें धोखा देता है। हम किसी को हर जगह देखने लगते हैं क्योंकि हमें उसे देखने की ज़रूरत होती है।"
"और कभी-कभी," मीरा ने धीमी आवाज़ में कहा, "हम किसी को इसलिए नहीं पहचानते क्योंकि हमें उसे पहचानने से डर लगता है।"
कमरे में फिर चुप्पी आई।
तभी मीरा ने अपना कैमरा उठाया, पर इस बार उसे खोला नहीं।
"मुझे एक बात समझ आई," उसने कहा। "काग़ज़ चाहे किसी ने भेजा हो, आदमी चाहे किसी भी खेल का हिस्सा हो, इस काग़ज़ पर जो असली लकीर है, वो ये है — कि अस्पताल की ज़मीन गरीबों के इलाज के नाम पर है। यही वो चीज़ है जिसे रणवीर मिटाना चाहता है। बाकी सब काग़ज़ों का जंगल है।"
उस्ताद ने सिर हिलाया। "और अगर ये बात एक बार सबके सामने आ गई, तो फिर कोई मुहर, कोई तारीख़, कोई वकील उसे मिटा नहीं सकेगा।"
मैंने पन्ना मोड़कर उस्ताद के हाथ में रख दिया।
"ये आपके पास रहेगा," मैंने कहा। "कल सुबह हम इसे दुबे अंकल को देंगे — जैसा वादा था।"
उन्होंने पन्ना लिया और उसे अपनी जेब में नहीं, अपनी कुर्ते की अंदरूनी जेब के अंदर एक कपड़े में लपेटकर रखा। मैंने देखा कि उन्होंने उसे लपेटते वक़्त अपने हाथ से अपनी आँखें एक बार ढक लीं — जैसे कोई दुआ कर रहा हो, या किसी से सच बोलने की ताक़त माँग रहा हो।
मैंने अपनी चारपाई की तरफ़ देखा। गोविंद भाई वहीं बैठे थे, पर अब उनका शरीर थोड़ा और झुक गया था। उन्होंने अपना गिलास अपने दोनों हाथों से पकड़ रखा था, जैसे वो उनकी ज़िंदगी की एकमात्र चीज़ हो।
"गोविंद भाई," मैंने कहा, "एक बात और।"
"हाँ, बेटा।"
"आपने कहा था — अँगूठे वाला घर से जुड़ा है। मैंने पूछा नहीं। अब पूछ रहा हूँ। कैसे?"
उन्होंने गिलास मेज़ पर रखा। इस बार पानी के घूँट नहीं, सिर्फ़ गिलास। और मेरी तरफ़ देखा।
"तुम्हारे घर में एक दरवाज़ा है," उन्होंने कहा, "जो चूल्हे के पीछे है। पुराना। बंद।"
मैं स्तब्ध रह गया।
"आपको कैसे पता?"
"क्योंकि सत्ताईस साल पहले," उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा, "मैं उस दरवाज़े के दूसरी तरफ़ खड़ा था। मेरे हाथ में स्याही की डिब्बी थी। और सामने एक आदमी बैठा था — जो रो रहा था। और उसके पीछे दीवार पर फाँसी — नहीं।" वो रुके। "दीवार पर एक तस्वीर टँगी थी। सफ़ेद छतरी। और उस तस्वीर के नीचे एक काग़ज़ रखा था — जिस पर उस आदमी का अँगूठा लगना था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"वो आदमी कौन था?" मैंने पूछा। पर मेरी आवाज़ इतनी धीमी निकली कि जैसे सवाल मैंने खुद से पूछा हो।
गोविंद भाई ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं। "बेटा, वो आदमी —"
तभी दरवाज़े पर आवाज़ आई।
एक धीमी, भारी आवाज़ — जैसे कोई बाहर से कुंडी उठा रहा हो और उसका हाथ काँप रहा हो।
मैंने सिर उठाया।
दरवाज़ा खुला। और दरवाज़े के फ्रेम में पापा खड़े थे।
उनके हाथ में एक पुराना औज़ार था — मेरा ही औज़ार, वो रिंच, जो उन्होंने पिछली रात दुकान में पोंछा था और फिर कहीं रख दिया था। उनकी आँखें लाल थीं, बाल बिखरे हुए थे, और उनकी शर्ट की एक बाँह पर कुछ तेल लगा था।
उनकी नज़र सीधे मेज़ पर पड़ी।
उस पन्ने पर, जिस पर उनका नाम नहीं, पर एक अँगूठा था।
और उनका हाथ खुल गया।
रिंच ज़मीन पर गिरा। आवाज़ बहुत तेज़ थी — इतनी तेज़ कि जैसे कमरे की हवा फट गई हो। लोहे की वो आवाज़ मेरे कानों में कई पल तक गूँजती रही।
और पापा वहीं खड़े रहे।
उनका चेहरा — मैंने उनके चेहरे को पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। वो चेहरा जो पूरी ज़िंदगी चुप्पी में ढला रहा, अब खुल गया था। और उस पर जो रंग आया, वो लाल नहीं था, पीला भी नहीं था — सफ़ेद था। सफ़ेद काग़ज़ जैसा, जो हाथ लगाते ही फट जाएगा।
तीन-चार पल कमरे में कोई नहीं बोला।
फिर वो बोले। उनकी आवाज़ इतनी धीमी निकली कि जैसे किसी पुराने कुएँ से आ रही हो। बस इतना ही निकला —
"यह काग़ज़ तुम्हें कहाँ से मिला?"
और उनका हाथ, जो रिंच गिरने के बाद भी हवा में उठा हुआ था, धीरे-धीरे नीचे आकर दरवाज़े के फ्रेम को पकड़ लिया।
वो ऐसे खड़े थे जैसे किसी पुराने काग़ज़ के ऊपर पहले से कोई शब्द लिखा हो और उसे आज कोई मिटाने चला हो — और वो खुद जानते हों कि मिटाने वाला उस शब्द को पढ़ नहीं पाएगा।
गोविंद भाई चारपाई से उठकर खड़े हो गए। उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — एक तरह की सिसकी, एक तरह की दुआ।
"शंकर यादव," उन्होंने कहा।
और पापा का चेहरा उस एक नाम से और भी सफ़ेद हो गया।
मैंने अपनी चारपाई की तरफ़ देखा, मेज़ की तरफ़ देखा, उस्ताद की तरफ़ देखा। पर मेरी नज़र बार-बार दरवाज़े की तरफ़ जा रही थी — जहाँ मेरा पापा खड़ा था, और उसकी उँगलियाँ अब भी काँप रही थीं।
और मेरी जेब में घंटी, जो अभी तक चुप थी, बहुत धीरे से बोली —
"अब देख, ये काग़ज़ क्या खोलता है।"
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