The Mysterious Bell – Chapter 480
दूसरा पन्ना—
इस पर लिखाई छोटी थी, जल्दी में लिखी हुई, टेढ़ी। जैसे दफ़्तर के बाबू ने इसे जल्दी में भरा हो। स्याही कहीं फैली थी, कहीं सूखने से पहले मुड़ गई थी।
मैंने उसे पढ़ना शुरू किया।
"…ज़मीन अस्पताल के नाम पर दर्ज… सात हिस्सों में बाँटी गई…"
"सात नाम," मीरा ने कहा। "वही सात नाम?"
"लगता है।"
"और नीचे?"
मैंने नीचे देखा। काग़ज़ के इस पन्ने पर भी अँगूठों के निशान थे — अलग-अलग, दूर-दूर, हर नाम के नीचे एक। और हर निशान के पास एक छोटा सा अक्षर, जो नाम का पहला अक्षर था।
मैंने उँगली से एक-एक करके उन निशानों को छुआ।
गोविंद भाई का नाम पहले पन्ने पर था। उसके नीचे वो धुँधला अँगूठा। और यहाँ दूसरे पन्ने पर, छठे नाम के नीचे, वही अँगूठा फिर आया था। मैंने दोनों निशान मिलाए। एक जैसे थे। एक ही हाथ।
"दो बार?" मैंने कहा।
"दो बार," मीरा ने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि दोनों पन्नों पर अलग-अलग बात लिखी है। पहले पर ज़मीन। दूसरे पर कर्ज़। किसी ने चाहा होगा कि अँगूठा हर जगह लगा दिखे।"
मैंने अपना हाथ पीछे खींच लिया।
"मीरा," मैंने कहा। "ये मुझे अच्छा नहीं लग रहा।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है। ये कोई चीज़ है जिसे किसी ने बड़ी मेहनत से इकट्ठा किया है। कोई इसे पूरा कर रहा है। एक-एक पन्ना जोड़ रहा है। और आज शाम हमारे पास फेंक दिया। अब कल क्या होगा? परसों क्या होगा? ये जो आदमी अंदर बैठा है, वो अगर चाहता है कि हम रणवीर को गिराएँ, तो वो हमें क्यों नहीं बताता कि वो कौन है?"
मीरा ने लैंप की लौ देखी।
"क्योंकि वो अभी खुद को नहीं दिखाना चाहता," उसने कहा। "वो देखना चाहता है कि हम उसका काग़ज़ लेकर क्या करते हैं। अगर हमने रणवीर को गिरा दिया, तो अगला रणवीर वो होगा। और वो चाहता है कि जब वो सामने आए, तो गली उसका नाम ले चुकी हो।"
"तो ये ट्रैप है?"
"ये दोनों है," मीरा ने कहा। "सच और ट्रैप। एक ही लिफ़ाफ़े में।"
मैंने काग़ज़ नीचे रख दिया और कुर्सी पीछे करके ठुक दी। कुर्सी की टाँग फिर खड़खड़ाई।
"तो फेंक दें?" मैंने कहा।
"नहीं।"
"तो?"
"तो हम इसे पढ़ेंगे। पूरा पढ़ेंगे। और जो पढ़ें, कल सबके सामने पढ़ेंगे। खुला। जहाँ मीरा तिवारी का कैमरा हो, वहीं। जो हमें काग़ज़ की तरह इस्तेमाल करना चाहता है, वो हमें काग़ज़ में नहीं बदल सकता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
कभी-कभी मुझे लगता है मीरा मुझसे ज़्यादा अंकुश है।
"ठीक है," मैंने कहा। "तो अब पढ़ते हैं। पूरा।"
हम बैठ गए।
मैंने पन्ने एक-एक करके मेज़ पर फैलाए। कुल सात पन्ने थे। पहला पन्ना — नाम, धुँधला अँगूठा, आधी मुहर। दूसरा — सात नाम, सात हिस्से, सात अँगूठे। तीसरा — दफ़्तर का हिसाब, कुछ भुगतान, कुछ बाकी। चौथा — एक बार का अंग्रेज़ी में लिखा हुआ डॉक्टर का नाम जो अब बचा नहीं है। पाँचवां — पन्ना जो कटा हुआ था। छठा — एक बार दो आदमियों के नाम जो एक-दूसरे के खिलाफ़ कुछ कह रहे थे। और सातवाँ पन्ना — आख़िरी — जिस पर कोई लिखाई नहीं थी।
सिर्फ़ एक मुहर थी। पूरी मुहर।
और वो मुहर देखकर मेरा हाथ फिर काँपा।
"मीरा," मैंने कहा। "ये मुहर मैंने कहीं देखी है।"
"कहाँ?"
"याद नहीं।"
"अंकुश।"
"मैं सच कह रहा हूँ। जैसे… जैसे मैंने इसे कभी किसी पुराने दफ़्तर की दीवार पर देखा हो, किसी ऐसी जगह पर जहाँ का मुझे नाम याद नहीं।"
मीरा ने मुहर को ध्यान से देखा।
"हकीम साहब," उसने कहा। "हकीम साहब। ये कोई जगह है या कोई आदमी?"
"पता नहीं।"
और उसी वक़्त—
दरवाज़े पर दस्तक हुई।
हम दोनों चौंके। मीरा ने अपना हाथ पन्नों के ऊपर रख दिया, जैसे उन्हें छिपाना हो।
"कौन?" मैंने पूछा।
"मैं हूँ।"
उस्ताद अली बक्श की आवाज़।
मैंने उठकर दरवाज़ा खोला। उस्ताद बाहर खड़े थे, सिर्फ़ कमीज़ में, बिना चश्मे के और बाल बिखरे हुए — ऐसे मैंने उन्हें कभी नहीं देखा था। उनके हाथ में कुछ नहीं था। उनके चेहरे पर वो चुप्पी थी जो किसी चीज़ को अंदर रोक रही हो।
"उस्ताद, इतनी रात—"
"अंदर आ सकता हूँ?"
"हाँ।"
वो अंदर आए। मेज़ के पास पहुँचे और पन्नों की तरफ़ झुके। नज़र दौड़ाई। एक-एक पन्ना। फिर उन्होंने वो पहला पन्ना उठाया, जिस पर गोविंद भाई का नाम था।
उन्होंने उसे ध्यान से देखा।
फिर उन्होंने वो अँगूठे का निशान देखा।
और उनका चेहरा बदल गया।
"अंकुश।" उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
"जी।"
"बैठ जा।"
मैं बैठ गया।
"काग़ज़ को देख।"
"देख रहा हूँ।"
"नहीं। गौर से देख। अँगूठे को देख। देख, ये अँगूठा हल्का है।"
"हाँ।"
"क्यों?"
"पता नहीं।"
"क्योंकि जिसने इसे लगाया, वो पढ़ नहीं सकता था। उसे काग़ज़ पर कुछ समझ नहीं आया। उसे सिर्फ़ कहा गया — अँगूठा लगाओ। और वो डरकर लगा दिया।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आपको कैसे पता?"
उस्ताद ने उस पन्ने को मेज़ पर वापस रख दिया।
"क्योंकि मैंने उस आदमी को देखा है," उन्होंने कहा। "अपनी आँखों से। पचास साल पहले। हाथ काँपते हुए। स्याही की डिब्बी के पास। और उसने एक बार भी पूछा नहीं कि मैं किस चीज़ पर अँगूठा लगा रहा हूँ।"
मीरा ने साँस रोक ली।
"उस्ताद," मैंने कहा। "ये अँगूठा किसका है?"
उस्ताद ने आँखें मींच लीं। फिर खोलीं।
"यह अँगूठा," उन्होंने कहा, "उस आदमी का है जिसने कभी काग़ज़ पढ़ा नहीं। जिसने इसे सिर्फ़ डरकर छुआ है। और वो आदमी आज भी ज़िंदा है। आज भी गली में है। और आज भी, अगर तुम उसके सामने ये काग़ज़ रख दोगे — तो वो पढ़ नहीं पाएगा। रो पड़ेगा।"
कमरा बिल्कुल चुप हो गया।
लैंप की लौ स्थिर थी।
और मेरे हाथ में वो अँगूठा अब पहले से भी ज़्यादा भारी लग रहा था।
॥
रात के उस पल में उस्ताद ने वो पन्ना मेज़ पर रख दिया और कुछ देर ऐसे खड़े रहे जैसे कोई बोझ उतारकर भी हल्का न हुआ हो। मीरा ने उनसे पूछा कि वो आदमी कौन है, पर उस्ताद ने सिर्फ़ इतना कहा — "जो खुद डरकर अँगूठा लगाता है, वो दूसरों का अँगूठा लेने पर मजबूर क्यों हो जाता है, ये सवाल काग़ज़ से नहीं, उसके मुँह से पूछना।" और फिर वो चले गए, बिना चश्मे के, बिना एक पल रुके।
मैं देर तक उसी मेज़ पर बैठा रहा। सात पन्ने। एक गायब। एक मुहर। एक अँगूठा।
मीरा ने कहा, "मैं सुबह आठ बजे आऊँगी।"
मैंने कहा, "आठ बजे तक मैं लौट आऊँगा।"
उसने पूछा, "कहाँ जा रहा है?"
मैंने कहा, "जहाँ से ये काग़ज़ निकला है।"
वो कुछ कहने को हुई, फिर रुक गई। उसने सिर्फ़ इतना कहा, "अकेले मत जाना।"
मैं हँसा। "मीरा, मैं साइकिल मरम्मत करने वाला आदमी हूँ। मेरे पास न गाड़ी है, न बंदूक, न कोई गिरोह। अकेले ही जाऊँगा, तभी तो सब ठीक लगेगा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू बहुत तेज़ हो गया है।"
"तेज़ नहीं हूँ," मैंने कहा। "बस अब डर को छुपाना छोड़ दिया है।"
वो चली गई। मैंने पन्नों को एक मैले कपड़े में लपेटा, उसे कमीज़ के अंदर, पेट की तरफ़ दबाया, और चारपाई पर लेट गया। नींद नहीं आई। आँखें बंद थीं और कान खुले थे। गली में रात भर कोई-कोई साइकिल गुज़रती रही, कोई कुत्ता भौंकता रहा, और मेरे अंदर एक ही आवाज़ घूमती रही — "वो आदमी आज भी ज़िंदा है।"
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