The Mysterious Bell – Chapter 479
नहीं, कोई नहीं था। बस एक सफ़ेद गाड़ी की धूल भरी लकीरें थीं जो दिन मेंबस एक सफ़ेद गाड़ी की धूल भरी लकीरें थीं, जो दिन में कभी आई थी और अब उन पर रात की नई धूल धीरे-धीरे जम रही थी।
मैं कुछ देर वैसे ही खड़ा रहा। गली सो रही थी। बस नल की टोंटी से टपकती बूँद की आवाज़ आ रही थी, और पीपल के पत्तों में हवा धीरे-धीरे सरसरा रही थी। मैंने एक बार उन लकीरों को घूरकर देखा, फिर अपनी जेब में हाथ डाला।
लिफ़ाफ़ा वहीं था। सादा सफ़ेद। नाम की जगह पर सिर्फ़ एक फीका निशान।
मैंने साँस ली और सीढ़ी से नीचे उतर आया।
दुकान बंद थी, पर पीछे वाले कमरे की रोशनी नाली की तरफ़ तिरछी पड़ रही थी। दरवाज़ा आधा खुला था। मैंने धक्का दिया और अंदर गया।
मीरा बैठी थी।
कमरे के बीच में पुरानी लकड़ी की मेज़ थी, जिस पर मैं आम दिनों में औज़ार रखता हूँ। उसने उस पर एक साफ़ कपड़ा बिछा दिया था — माँ की कोई पुरानी चादर, जो शायद उसने अलमारी से निकाली थी। और उस कपड़े के बीच में, बिल्कुल तिरछा, वो सफ़ेद लिफ़ाफ़ा रखा था।
मैंने दरवाज़ा बंद किया।
"तू सोई नहीं?" मैंने पूछा।
"कैसे सोती?" उसने कहा। "जब से उस चपरासी ने ये नीचे गिराया, मेरे हाथ नहीं रुके।"
मैं मेज़ के पास गया और कुर्सी खींचकर बैठ गया। कुर्सी की एक टाँग छोटी है, इसलिए वो हमेशा हिलती है, और आज उसकी खड़खड़ाहट कमरे में बहुत तेज़ लगी।
"लैंप जलाओ," मीरा ने कहा। "इस बल्ब की रोशनी में मुझे कुछ नहीं दिखता। मेरी आँखें धोखा खा रही हैं।"
मैंने अलमारी के ऊपर से वो पुराना पीतल का लैंप उतारा, जिसे माँ ने इस्तेमाल करना छोड़ दिया था। उसके शीशे पर धूल की पतली परत जमी थी। मैंने उसे मेज़ के कोने पर रखा, माचिस निकाली और जलाया।
लौ पहले काँपी, फिर सीधी हो गई।
रोशनी पीली थी, और उस पीली रोशनी में मीरा का चेहरा अजीब लग रहा था। जैसे वो आज अपने से उम्र में बड़ी दिख रही हो।
"खोलूँ?" उसने पूछा।
"तू इसलिए बैठी है," मैंने कहा।
उसने लिफ़ाफ़े का किनारा उठाया और अँगुली से फाड़ा। काग़ज़ पुराना नहीं था — लिफ़ाफ़ा नया था, पर उसके अंदर जो निकला, वो पुराना था। बहुत पुराना।
वो पन्नों का एक मोटा बंडल था, जो मोड़े जाने से उलझा हुआ था। किनारे पर जगह-जगह पीले दाग थे, कहीं नमी लगी थी, कहीं किसी चीज़ ने काग़ज़ को ऐसा चाट लिया था कि कोना सिर्फ़ एक पतली परत बनकर बचा था।
मीरा ने उसे मेज़ पर धीरे से रखा, जैसे कोई चिड़िया रखी जा रही हो।
"ये तो…" उसकी आवाज़ रुक गई। "ये तो सरकारी फाइल जैसा लगता है।"
"सरकारी फाइल गली में नहीं आती," मैंने कहा। "सरकारी फाइल सरकारी दफ़्तर में सोती है।"
"तो ये क्या है?"
"यही तो देख रहे हैं।"
मीरा ने ऊपर का पन्ना उठाया।
लैंप की लौ हिली, और काग़ज़ पर पड़ी परछाई दीवार पर नाचने लगी। मुझे लगा जैसे कमरा थोड़ा सिकुड़ गया हो।
ऊपर के पन्ने पर हाथ की लिखाई थी, नीली स्याही में, और वो स्याही अब हल्की हो गई थी। अक्षर बड़े थे, चौड़े थे, जैसे लिखने वाले को जल्दी थी या हाथ काँप रहा था।
और मीरा ने पढ़ते ही जो किया, वो अजीब था — उसने पन्ना मेज़ पर वापस रख दिया। नीचे नहीं, बल्कि सीधा, दोनों हाथों से।
"क्या है?" मैंने पूछा।
"पढ़।"
मैंने पन्ना उठाया। ऊपर बड़ी लाइन में नाम था।
गोविंद भाई।
मैं वहीं रुक गया। पन्ने को और करीब लाया। नीचे दो लाइनें और थीं, जिनमें कुछ लिखा था — शायद दफ़्तर का नाम, शायद ज़मीन का हिस्सा, शायद तारीख़। पर मेरी आँखें उस लाइन से आगे नहीं बढ़ीं।
क्योंकि उस नाम के नीचे, स्याही से बहुत नीचे, काग़ज़ पर एक निशान था।
अँगूठे का निशान। धुँधला, हल्का, जैसे लगाने वाले ने उँगली दबाई ही नहीं, बस छुआ दिया हो।
और मेरा हाथ काँपने लगा।
मैंने खुद को रोका। गहरी साँस ली। पर हाथ नहीं रुका। मैंने काग़ज़ नीचे रखा और अपनी उँगलियों को मुट्ठी में बंद कर लिया।
"अंकुश?" मीरा ने देखा। "क्या हुआ?"
"कुछ नहीं।"
"तेरा हाथ काँप रहा है।"
"थक गया हूँ। दिन भर साइकिलें ठीक कीं।"
"अंकुश।"
"मीरा।"
"अंकुश।"
वो मेरी तरफ़ झुकी। बल्ब का और लैंप का, दोनों का पीला रंग उसके आधे चेहरे पर पड़ रहा था।
"तू मुझसे झूठ बोल रहा है। और मुझे लगता है तू खुद को भी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेज़ पर रखे उस पन्ने की तरफ़। फिर लैंप की लौ की तरफ़।
"मुझे नहीं पता क्यों," मैंने कहा। "जब मैंने वो अँगूठा देखा, मेरा हाथ ऐसे काँपा जैसे मैंने उसे पहले कभी छुआ हो।"
"तूने छुआ है?"
"नहीं।"
"तो?"
"मुझे नहीं पता।"
मीरा ने कुछ देर मुझे देखा। फिर बोली, "कल सुबह हम ये उस्ताद को दिखाएँगे। वो इसे पढ़ लेंगे, भले वो कम बोलें।"
"हाँ," मैंने कहा।
पर मैंने पन्ना वापस नहीं उठाया। मेरा हाथ अब भी वैसा ही था। धीरे-धीरे।
मीरा ने बात बदली। वो ऐसी ही है। जब वो देखती है कि कोई बहुत अंदर जा रहा है, तो वो दरवाज़ा बंद नहीं करती — वो खिड़की खोल देती है।
"अंकुश," उसने कहा। "एक बात है जो मुझे शुरू से खटक रही है।"
"कह।"
"ये फाइल सीधे रणवीर के दफ़्तर से नहीं आई।"
"तो कहाँ से आई?"
"उस चपरासी से। और चपरासी अपने आप नहीं आया। उसे किसी ने भेजा। और जिसने भेजा, वो चाहता था कि ये फाइल तेरे हाथ लगे।"
मैंने धीरे-धीरे अपनी मुट्ठी खोली। "मतलब वो रणवीर के खिलाफ़ है?"
"मतलब वो रणवीर के अंदर का आदमी है," मीरा ने कहा। "कोई बाहर का नहीं। जो अंदर बैठकर सब देख रहा है, और आज उसका मन डिगा है।"
"इसका मतलब वो हमें सच दे रहा है?"
मीरा ने अपना सिर हिलाया। "नहीं। इसका मतलब है वो हमें वो सच दे रहा है जो उसके लिए हल्का हो गया है। जो चीज़ उस पर भारी पड़ रही है, वो वो हमें दे रहा है।"
मैंने उसकी बात सोची।
"तो ये सच है या नहीं?"
"काग़ज़ सच है," उसने कहा। "आदमी के इरादे का पता नहीं।"
मैं हँसा। "तू बड़ी साफ़ बात करती है।"
"मैंने दो महीने में सीखा है," उसने कहा। "पहले मैं काग़ज़ ढूँढती थी। अब मैं सिर्फ़ काग़ज़ का इरादा ढूँढती हूँ।"
मैंने पन्ना फिर उठाया और अबकी बार मैंने उसे पलटा।
पीछे की तरफ़ कुछ नहीं था। बस एक मुहर थी — आधी मुहर। आधी मुहर का मतलब, उस काग़ज़ का आधा हिस्सा कहीं और है। जिसने ये काग़ज़ रखा था, उसने इसे बीच से फाड़कर रखा था, और एक हिस्सा किसी और के पास भेज दिया था।
मुहर में गोल घेरे के अंदर कुछ शब्द थे। कुछ अक्षर मिट गए थे, कुछ धुँधले थे। जो बचे थे उन्हें मैंने पढ़ा।
"हकीम साहब…" मैंने धीरे से कहा।
"क्या?" मीरा ने सिर उठाया।
"ये लिखा है — हकीम साहब। और उसके बाद कुछ है जो मिट गया है।"
"हकीम साहब कौन?"
"मुझे नहीं पता।"
"हकीम साहब मतलब हकीम — वैद्य। पुराने ज़माने के डॉक्टर को बोलते थे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"तो ये अस्पताल का काग़ज़ है?"
"अस्पताल का पुराना काग़ज़," मीरा ने कहा। "उस वक़्त जब अस्पताल का नाम नूर अस्पताल नहीं था।"
कमरे में चुप्पी आ गई।
बल्ब गुनगुना रहा था। बाहर नल की बूँद टपक रही थी। और मैं सोच रहा था कि इस शहर के पास कितने नाम हैं, जो हमने भुला दिए हैं और जो अब काग़ज़ों में हमारा पीछा कर रहे हैं।
मीरा ने पन्नों के बंडल को उँगली से खोला और अंदर के पन्ने को धीरे से बाहर निकाला।
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