The Mysterious Bell – Chapter 460
"आपने मेरी बात पूरी नहीं सुनी," मैंने कहा। "मैंने ये नहीं कहा कि मैं काग़ज़ नहीं लूँगा। मैंने कहा — नहीं। आपकी शर्त पर नहीं।"
"तो पन्ना कैसे मिलेगा?"
"जिस तरह सच मिलता है," मैंने कहा। "खुलकर। सबके सामने। किसी अलमारी की तिजोरी से नहीं।"
उसने हाथ जेब में डाल लिए, जैसे कोई मुनीम हिसाब बंद करता है।
"बड़ी बातें करते हो, बेटा।"
"माँ ने सिखाया है," मैंने कहा। "कि सच कभी किसी काग़ज़ के पन्ने का मोहताज नहीं होता। काग़ज़ उसे साबित कर सकता है, मिटा भी सकता है। काग़ज़ जल जाता है, फट जाता है, चूहा खा जाता है। पर सच आदमी के भीतर बैठा होता है। और जब वो बाहर आता है, उसे कोई मोहर नहीं चाहिए।"
सलीम ने गर्दन हल्की टेढ़ी की। "ये सब बहुत अच्छा है। पर मेरी शर्त पर तुम्हारा जवाब?"
"मेरा जवाब है — आप वो पन्ना अपने पास रखिए। हम उसे अपने तरीके से निकलवा लेंगे।"
"कैसे?"
"आप खुद बताइए," मैंने कहा। "क्योंकि आप यहाँ सिर्फ़ काग़ज़ दिखाने नहीं आए हो। आप कुछ और चाहते हो।"
उसका चेहरा एक पल के लिए बदला। बहुत थोड़ा। पर बदला। जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी खटकी हो।
"मैं चाहता हूँ," उसने कहा, "कि तुम अपने उस्ताद से पूछो कि मैं कौन हूँ।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। उस्ताद अली बक्श वहीं खड़े थे। उनका मोटा चश्मा धूप में चमक रहा था। उन्होंने सलीम की तरफ़ नहीं देखा। उन्होंने ज़मीन देखी।
और उन्होंने कुछ नहीं कहा।
"ठीक है," मैंने कहा। "वो बाद में। पहले बेटी बोलेगी।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा। वो अब भी माइक पकड़े खड़ी थी। उसकी उँगलियाँ माइक के हैंडल पर सफ़ेद दिख रही थीं, जैसे खून सब सिर में चढ़ गया हो। उसके गाल पर सुबह का सूजा हुआ हिस्सा अब भी गुलाबी था।
"शालिनी," मैंने कहा। "बोलो। और ये मत सोचना कि पीछे कौन खड़ा है। पीछे जो खड़ा है, वो भी इंसान है। और इंसान सबसे ज़्यादा तब डरता है जब कोई सच बोलने लगता है।"
उसने एक बार गहरी साँस ली।
फिर माइक अपने मुँह के पास लाया।
"मैं इंजीनियर हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर माइक उसे बढ़ा रहा था, और वो बढ़ती जा रही थी। "मेरा काम छत देखना है, मरम्मत बताना है। मैंने वो छत देखी है। तीन बार देखी है। और मैं साफ़ कह रही हूँ — वो छत गिरने वाली नहीं है।"
बेंच पर बैठी एक औरत ने हाथ उठाया। "बेटा, पर वो तस्वीर? तस्वीर में तो प्लास्टर गिरा हुआ था।"
"मैडम," शालिनी ने कहा, "वो कोना जान-बूझकर खुरचा गया था। किसी ने प्लास्टर उखाड़ा, उसे गीला किया, फिर सुखाया। ताकि फोटो में वो गिरता हुआ लगे। मैंने वो टुकड़ा अपने हाथ से छुआ है। अंदर से वो गीला था और किनारे पर सीधी मसाला लकीर थी। जो प्लास्टर अपने आप गिरता है, उसका किनारा टेढ़ा होता है। सीधा नहीं।"
वो "सीधी लकीर" शब्द हवा में गिरा और मुझे लगा जैसे किसी ने पूरे आँगन में एक तार खींच दिया हो।
"और रिपोर्ट?" दूसरी औरत ने पूछा। "रिपोर्ट पर आपके हस्ताक्षर थे ना?"
शालिनी ने माइक कसकर पकड़ा।
"रिपोर्ट पर मेरे हस्ताक्षर नहीं थे," उसने कहा। "मुझसे कहा गया था कि हस्ताक्षर करो। ज़ोर डाला गया। मेरे पापा को फोन आया, मेरे पापा की कंपनी के काम अटके हुए हैं, बीस लाख का हिसाब मरम्मत के नाम पर लिखा गया है और वो पैसा किसी और काम में गया है। मैंने हस्ताक्षर नहीं किए। मैंने पहली, सच्ची रिपोर्ट लिखी — उस पर लाल पेन से चार जगह काटकर लिखा गया, भाषा ठीक करें। मुझसे कहा गया कि जो पहले से लिखा है, उसे ठीक करना तुम्हारा काम है, सवाल करना नहीं।"
"तो हमारे बच्चों की छत?" एक आदमी ने आवाज़ उठाई। उसकी आवाज़ में गुस्सा था, और गुस्सा अब सही जगह जा रहा था।
"आपके बच्चों की छत गिरने वाली नहीं है," शालिनी ने कहा। "छत बस मरम्मत माँग रही है। और मरम्मत माँगना कोई जुर्म नहीं होता। जुर्म ये है कि मरम्मत के नाम पर पैसा लिया गया और वो छत को छुआ भी नहीं।"
वो "बीस लाख" शब्द हवा में गिरा, तो लगा कि चारों तरफ़ कुछ टूटा। भले ही कोई शीशा नहीं टूटा, भले ही कोई दीवार नहीं गिरी, पर वहाँ जो चीज़ टूटी, वो भरोसा था। और भरोसा टूटने की आवाज़ सबसे तेज़ होती है।
तभी एक आदमी बेंच से उठा। छोटा, दुबला, हाथ में पीला बंडल, और कुर्ते की जेब से एक काग़ज़ का कोना बाहर।
"मेरा बेटा इसी स्कूल में है," उसने कहा। "सातवीं में। और जिस दिन ये खबर आई कि छत गिर रही है, उस दिन मेरी बीवी ने रात भर आँसू पोंछे। मेरा बेटा सुबह स्कूल नहीं गया, वो दरवाज़े के पीछे बैठा रहा। और ये सब — ये सब इस लड़की ने किया?"
वो उँगली शालिनी की तरफ़ उठी, और हवा में ऐसे लटकी जैसे कोई चाकू हो।
"रुको," मैंने कहा। "पहले पूरा सुनो।"
पर भीड़ सुनना नहीं चाहती थी। भीड़ को एक नाम चाहिए था। और उसे उस वक़्त कोई नाम दिख रहा था — शालिनी। पतली, काँपती, माइक पकड़े एक लड़की। सबसे आसान शिकार।
और फिर आवाज़ आई। भीड़ से तेज़ आवाज़।
"चुप हो जाओ।"
मैंने पीछे देखा।
शालिनी के पापा।
वो बेंच के किनारे खड़े थे। सफ़ेद कुर्ता। पर कुर्ता साफ़ था, फटा नहीं था। उनके हाथ खाली थे, बस एक उँगली पर घड़ी की पट्टी की लकीर बनी हुई थी। उनका चेहरा लाल था — पर गुस्से से नहीं। शर्म से। शर्म कभी-कभी लाल गुस्से जैसी ही दिखती है, और लोग दोनों में फ़र्क़ नहीं कर पाते।
"बोलिए," उस दुबले आदमी ने कहा। "आप ही बताइए। आपकी बेटी हमारे बच्चों को डराने में शामिल है या नहीं?"
शालिनी के पापा ने एक बार बेटी की तरफ़ देखा।
शालिनी ने उनकी तरफ़ नहीं देखा। वो माइक को अपने सीने से लगाए खड़ी थी, जैसे कोई ढाल पकड़ी हो।
और पापा ने कहा, "उसने नहीं डराया। मैंने डराया।"
सन्नाटा।
इतना सन्नाटा कि पीपल के पत्तों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। और दूर कहीं नाली में पानी टपक रहा था, डिट-डिट-डिट, और वो आवाज़ भी साफ़ थी।
"ये काग़ज़," उन्होंने कहा, और शालिनी के हाथ से बंडल लेकर ऊपर उठा दिया, हालाँकि उनका हाथ काँप रहा था, "ये देखिए। इनमें मेरे मज़दूरों के नाम हैं। बाईस नाम। तीन महीने की मज़दूरी बाकी है। तीन महीने, भाई साहब।"
उन्होंने आँखें झपकीं।
"मेरे पास दो रास्ते थे। एक — सच बोलूँ और मेरे बाईस आदमियों के घर के चूल्हे बंद हो जाएँ। दूसरा — मुँह बंद रखूँ और काम चलता रहे। मैंने दूसरा रास्ता चुना।"
भीड़ में कोई बोला, "तो पहले क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि पहले मैं खुद से ही डरता था," उन्होंने कहा। "डर को कभी नहीं बताते कि वो डर है। इसे समझदारी कहते हैं, मज़बूरी कहते हैं, हालात कहते हैं।"
उन्होंने बंडल को अपने सीने से लगाया।
"उस दिन मैंने अपनी बेटी को फोन किया था। मैंने कहा — बेटा, तू चुप रह। तेरे पापा का काम अटका है। और मैंने ये भी कहा — जो हुआ, वो हो गया, अब सिर्फ़ चुप रहने से सब ठीक होगा।"
उनकी आवाज़ टूटी। उन्होंने कुर्ते के कोने से मुँह पोंछा।
"मैंने अपनी बेटी को अपने डर में शामिल कर लिया। बस यही मेरा जुर्म है। और मैं उसे यहीं, सबके सामने, कबूल कर रहा हूँ।"
शालिनी ने माइक नीचे कर दिया। वो इतना धीरे कर दिया कि माइक फ़र्श से टकराकर खड़खड़ाया।
वो अपने पापा की तरफ़ बढ़ी। दो कदम। फिर रुक गई, जैसे पूछ रही हो — क्या मैं आ सकती हूँ?
पापा ने हाथ बढ़ाया।
वो सीने से चिपक गई। पूरे आँगन के सामने। और बच्चों के सामने। और उन माँओं के सामने जो अभी उस पर चिल्ला रही थीं। उसने अपना मुँह उनके कुर्ते में छिपा लिया और रोई।
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