The Mysterious Bell – Chapter 453
मैंने झुककर देखा।
बोरी का कोना सच में ऊपर उठा हुआ था। और उसके नीचे से कुछ काला दिख रहा था।
मेरा दिल एक बार ज़ोर से धड़का।
"अंकुश," घंटी बोली, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे लगा वो मेरे ही सिर के अंदर बोल रही है। "देखने से पहले सोच।"
मैंने आँख बंद की। एक, दो, तीन।
फिर मैंने उस्ताद की बात याद की, जो उन्होंने कल रात कही थी — जो चीज़ मिलती है, वो पहले से रखी गई होती है, और जो रख गया, वो चाहता है कि तुम उसे ठीक वैसे ही उठाओ जैसे वो चाहता है।
"टिंकू," मैंने कहा। "मेरे औज़ारों के ट्रंक से दस्ताने ला। वही मोटे वाले।"
"दस्ताने?"
"हाँ। मैं आज इस बैग को अपने हाथ से नहीं छूऊँगा।"
वो दौड़कर गया। मैं वहीं खड़ा रहा, बोरी को देखता हुआ, और मेरे मन में एक ही बात घूम रही थी — कल रात बैग शालिनी से दूर गेट के पास उतारा गया था। और मेरी दुकान के पीछे, मेरी बोरियों के नीचे रात में रखा गया था।
मेरी दुकान।
मेरे पीछे।
यानी वो आदमी, जो अंधेरे में शालिनी के कान के पास काली डोरी ले जाकर हँसा था, उसे मेरी गली का रास्ता पता था। बस पता ही नहीं था, वो मेरी दुकान के पीछे तक आया था, और मेरे कमरे की दीवार के उस तरफ़ खड़ा था जहाँ मैं सो रहा था।
टिंकू दस्ताने लेकर आया। मैंने पहने। बोरी हटाई।
काला बैग वहाँ पड़ा था। शालिनी का बैग। उसका पट्टा एक तरफ़ से फटा हुआ था, ठीक वैसे ही जैसे कल गेट के पास मिला टुकड़ा दिखा रहा था।
मैंने बैग उठाया। हल्का था।
"हल्का है," मैंने कहा।
"इसलिए तो कह रहा हूँ," टिंकू ने कहा। "उस्ताद, अगर इसमें सारी रिपोर्ट होती तो भारी होता ना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। कभी-कभी ये तेरह साल का लड़का मुझसे ज़्यादा साफ़ देखता है।
"तू ठीक कहता है," मैंने कहा।
मैंने बैग की ज़िप खोली। अंदर से पहले एक काग़ज़ों का बंडल निकला, फिर एक कलम, और फिर एक छोटा कार्ड जिस पर शालिनी की तस्वीर थी।
मीरा उस वक़्त गली के मोड़ से आ रही थी। उसके हाथ में कैमरा था, बाल बिखरे हुए, और चेहरे पर वो भाव जो उसके चेहरे पर तभी आता है जब उसे पता हो कि आज कोई बड़ी चीज़ होने वाली है।
"मिल गया?" उसने दूर से पूछा।
"आ जा," मैंने कहा। "और हाथ मत लगाना।"
उसने दस्ताने देखे और तुरंत समझ गई। कैमरा चालू किया, फिर मेरी तरफ़ देखा। "बोल, क्या दिखा?"
मैंने काग़ज़ों का बंडल खोला। एक-एक पन्ना देखा। सब पर वही रिपोर्ट — स्कूल की छत, टूटा कोना, मरम्मत का झूठ, बीस लाख का हिसाब। सब था।
"रिपोर्ट की नकल है," मैंने कहा। "पूरी।"
"और हस्ताक्षर वाला पन्ना?" मीरा ने पूछा।
मैंने बंडल उलट-पलटकर देखा। फिर बैग को खाली किया। कोई पन्ना नहीं। वो असली पन्ना, जिस पर शालिनी ने अपना हाथ रोका था, जिस पर उसने हस्ताक्षर नहीं किए थे, पर जो सबसे ज़रूरी था — वो नहीं था।
"नहीं है," मैंने कहा।
टिंकू ने धीरे से कहा, "उस्ताद, तो चोर ने सिर्फ़ एक पन्ना लिया? बाकी सब छोड़ गया?"
"हाँ।"
"तो मतलब उसे पूरी रिपोर्ट नहीं चाहिए थी। उसे सिर्फ़ वो पन्ना चाहिए था जिस पर हस्ताक्षर की जगह थी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं, वो चमक जो उसे तभी आती है जब वो किसी सुराग के बहुत पास हो।
"हाँ," मैंने कहा। "और उसने बैग हमारे पास छोड़ दिया, इसका मतलब है कि बैग का हमारे पास होना उसके काम का है।"
तभी मेरी नज़र बैग के अंदर के कोने पर गई। वहाँ कुछ था। एक पर्ची, तह की हुई, बैग के अंदर की जेब में ठुसी हुई।
मैंने उसे दस्ताने से खींचा। खोला।
उस पर नीली स्याही में एक लाइन लिखी थी। छोटी लाइन, पर ऐसी कि मेरे हाथ ठंडे हो गए।
मैंने पढ़ा, और फिर ज़ोर से पढ़ा, ताकि मीरा और टिंकू भी सुन लें।
"बैग वहीं मिला जहाँ इसकी जगह थी। अब बताओ, चोर कौन?"
मीरा ने कैमरा थोड़ा और पास किया। "आगे कुछ?"
"और नीचे," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भारी हो गई, "छोटे अक्षरों में लिखा है — अब हर उँगली जो इस बैग पर है, वो अंकुश यादव की दुकान से निकली है।"
टिंकू ने साँस रोक ली।
मीरा ने धीरे से कहा, "ये तो सीधी बात है।"
"क्या?"
"ये सीधी बात है, अंकुश," उसने कहा। "ये पर्ची यह नहीं कह रही कि तुमने चोरी की। ये कह रही है कि चोरी का इल्ज़ाम तुम पर लगेगा। और ये लिखने वाला जानता है कि इल्ज़ाम सच से नहीं, काग़ज़ से बनता है।"
मैंने उस पर्ची को उलटा किया। उसके पीछे कुछ नहीं था। फिर मैंने उसे अपनी हथेली पर रखकर ठीक से देखा।
हाथ झुका हुआ था।
वो अक्षर दाएँ तरफ़ झुके थे। जैसे लिखने वाले का हाथ काँप रहा हो।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ बदल गई। "ये लिखाई वही है ना?"
उसने पर्ची को देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा। फिर अपने कैमरे drops करके जल्दी से अपनी कमीज़ की जेब से वो काग़ज़ का फटा कोना निकाला, जो शालिनी ने कल अंधेरे में बैग से खींचा था।
उसने दोनों को अपनी हथेली पर पास-पास रखा।
नीली स्याही। झुकी लिखाई। और एक जैसा वो काँपता हाथ।
"एक ही हाथ," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "एक ही आदमी ने ये दोनों लिखे हैं। जो नाम कल बैग में रखा था और जो लाइन आज इसमें रखी है — दोनों एक ही आदमी के हाथ के हैं।"
टिंकू ने धीरे से कहा, "मतलब चोर ने खुद अपना नाम बैग में रखा था?"
"नहीं," मैंने कहा। "मतलब चोर ने किसी और का नाम रखा था। और अब वो चाहता है कि वो नाम मेरे साथ जुड़ जाए।"
कमरे में एक पल के लिए चुप्पी छा गई। इतनी चुप्पी कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दी।
तभी गली के मुँह से एक आवाज़ आई।
पान चबाने की आवाज़।
वो आवाज़ मैंने सालों में पहचानी है। जैसे कोई चप्पल पत्थर पर रगड़ रहा हो, और साथ में कुछ चिपचिपा हो।
बबलू पांडे।
वो गली में आ रहा था। मोटा शरीर, गले में मोटी सोने की चेन, कमीज़ के दो बटन खुले, और मुँह में पान। वो मुस्कुरा रहा था। सुबह के छह बजे, किसी को मुस्कुराकर मिलना आम बात है। पर बबलू की मुस्कान वो नहीं थी। उसकी मुस्कान वो थी जो कह रही हो — मैं जानता हूँ जो तुम जानते हो, और इसीलिए आज तुम्हारा दिन अच्छा नहीं जाने वाला।
वो मेरी दुकान के पास आया और रुक गया। उसने अपनी कमर से हाथ नहीं हटाया। बस बैग पर नज़र डाली, फिर मेरे हाथ में दस्ताने देखे, फिर मीरा के कैमरे पर।
"अरे," उसने कहा। "सुबह-सुबह मेहनत। मज़ा आ गया।"
"बबलू भाई," मैंने कहा। "इतनी सुबह? आप रोज़ छह बजे उठते हैं?"
"उठने की बात और है," उसने कहा। "मुझे तो खबर मिली है कि आज कुछ मिला है। तो सोचा, देख आऊँ।"
"किसने खबर दी?"
वो हँसा। पान चबाया। और उसने अपनी जेब से पानदान निकालकर उसमें उँगली डाली, जैसे वो इस सवाल को सुनकर बोर हो गया हो।
"अरे भाई," उसने कहा, "गली में खबर और हवा दोनों एक ही तरह चलती हैं। किसी ने कुछ कहा, किसी ने सुना, और ये पूरी गली जान गई। तुझे क्या लगा, तेरी दुकान के पीछे से बैग निकलेगा और किसी को पता नहीं चलेगा?"
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा फैल गया।
"आपको कैसे पता कि दुकान के पीछे से बैग निकला है?"
वो रुका। एक पल के लिए। बहुत छोटा पल, पर मैंने देखा। उसके पान चबाने की गति एक सेकंड रुक गई, और फिर चलने लगी, पहले से तेज़।
"मैंने नहीं कहा," उसने कहा, "कि पीछे से निकला। मैंने कहा कि किसी को पता नहीं चलेगा। तूने खुद ही पीछे का ज़िक्र किया। अपनी बात का हिसाब रख, मिस्त्री।"
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