The Mysterious Bell – Chapter 432
माँ ने धीरे से कहा, "अंकुश, सुबह तक सब्र कर।"
मैंने सिर हिलाया। पर मेरे हाथ में पेचकस अब भारी लग रहा था — और मुझे पता था, यही भार सुबह पीपल तक ले जाना है।
॥
पेचकस मेरे हाथ में था, और मुझे लग रहा था जैसे किसी ने गली की सारी हवा इसी लकड़ी के हत्थे में भर दी हो।
कमरे में दीये की लौ हिल रही थी। माँ के हाथ में दीया था, और उनका हाथ काँप रहा था, इसलिए लौ भी काँप रही थी। पापा दरवाज़े के पास खड़े थे, एक हाथ चौखट पर, जैसे अंदर आने के लिए भी उन्हें सहारा चाहिए हो। काजल मेरे पीछे खड़ी थी और उसकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी।
उस्ताद अली बक्श ने अपना मोटा चश्मा उतारकर कमीज़ के पल्लू से पोंछा और फिर से लगाया।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "इसे खोलते वक़्त हाथ हिले नहीं।"
"उस्ताद, मेरे हाथ तो ऐसे ही नहीं हिलते," मैंने कहा। "मेरे हाथ साइकिल की चेन जोड़ते हैं, घड़ी के पुर्ज़े नहीं। पर आज रात ये हत्था खुलेगा।"
"सुबह तक सब्र कर," माँ ने फिर वही बात दोहराई, पर इस बार आवाज़ में हुक्म नहीं था, थकान थी।
"माँ," मैंने कहा, "सुबह पीपल पर सब जमा होंगे। उस वक़्त अगर ये बात मेरे सीने में बंद रही, तो मैं सबके सामने खड़ा कैसे होऊँगा? जो दूसरों के घर का सच खोलता फिरता है, उसके अपने घर का सच उसकी जेब में क्यों सोए?"
माँ ने कुछ कहना चाहा, फिर चुप हो गईं।
पापा ने दरवाज़े से कहा, "पीछे वाले कमरे में चलो। यहाँ दीये की रोशनी कम है और सामने से कोई आ जाए तो…"
उन्हें पूरा वाक्य कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी। हम सब समझ गए।
पीछे वाला कमरा। वही कमरा जहाँ मेरी चारपाई थी, जहाँ लोहे की अलमारी थी, जहाँ औज़ारों का ट्रंक था और जहाँ का पुराना बल्ब रात भर गुनगुनाता रहता था, जैसे उसे भी हर बात सुननी हो।
काजल ने ट्रंक के ऊपर से कपड़ा हटाकर एक मेज़ साफ़ की — मेरी वही छोटी मेज़ जिस पर रात में हिसाब की कॉपी रखता हूँ। माँ ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा निकाला, पुराना सूती कपड़ा, साफ़ धोया हुआ, और उसे मेज़ पर बिछा दिया।
"औज़ार ज़मीन पर मत रखना," माँ ने कहा। "जो चीज़ पचास साल से किसी के सीने में बंद थी, वो मेज़ पर रखी जाएगी, फ़र्श पर नहीं।"
पापा अंदर आए और दरवाज़ा बंद कर दिया। फिर सोचकर उसे आधा खुला छोड़ दिया। मुझे पता था क्यों — पूरी बंद गली में कान हमेशा किसी न किसी की खिड़की पर होते हैं।
तभी दरवाज़े पर हल्की खड़खड़ाहट हुई। टिंकू।
उसका सिर दरवाज़े की दरार से अंदर आया, बाल बिखरे, आँखें सूजी हुई, और हाथ में वही काला एक काँच वाला चश्मा।
"टिंकू, तू गया नहीं?" काजल ने कहा।
"दीदी, मैं गया था," उसने कहा। "पर घर के दरवाज़े पर पहुँचकर लगा कि मेरे पीछे कुछ छूट रहा है। माँ ने डाँटा भी, बोली कि सो जा। मैंने कहा कि मैं सो जाऊँगा, पर पहले उस्ताद के पास जाना है।"
"और वो मान गई?" मैंने पूछा।
"नहीं," टिंकू ने कहा। "मैं चुपचाप निकल आया।"
माँ ने एक लंबी साँस ली, फिर उसका सिर सहलाया और पीछे खड़ा कर दिया।
उस्ताद ने कुर्सी खींचकर बैठने की जगह बनाई, पर बैठे नहीं। वो मेज़ के पास खड़े रहे और अपनी जेब से एक छोटी, पतली छेनी निकाली — वही जो उनकी सिलाई मशीन की मरम्मत में काम आती है। फिर उन्होंने हाथ फैलाया।
मैंने पेचकस उनकी हथेली पर रख दिया।
उस्ताद ने उसे दीये की रोशनी में घुमाया। लकड़ी का हत्था चिकना था, पापा के हाथों की गरमी से पचास साल में ऐसा चिकना हुआ था जैसे पत्थर। उस पर “शंकर” खुदा था, छोटे टेढ़े अक्षरों में। और आख़िरी सिरे पर वही गोल लकड़ी की पट्टी, जिसे देखकर उस्ताद की भौंहें सिकुड़ीं।
"ये पट्टी घूमती है," उन्होंने कहा। "और जो घूमती है, उसके पीछे कुछ रखा जाता है।"
"उस्ताद, आपको कैसे पता?" पापा ने पूछा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ नहीं, पापा की तरफ़ देखा।
"क्योंकि ये पेचकस मेरी दुकान के सामने से गुज़रा है," उन्होंने कहा। "बहुत पुरानी बात है। उस वक़्त भी इसके हत्थे में कुछ था।"
"क्या था?" काजल ने पूछा।
"वो मुझे नहीं पता," उस्ताद ने कहा। "पर इतना पता है कि जो चीज़ थी, उसने दो भाइयों में ऐसी दरार डाली जो पचास साल में नहीं भरी।"
छेनी की नोक पट्टी के किनारे पर रखी गई। उस्ताद ने हल्का-सा दबाया, न हल्का, न ज़्यादा — जैसे कोई दर्ज़ी कपड़े को फाड़े बिना सीवन खोलता हो।
पट्टी घूमी। धीरे-धीरे। एक आधा चक्कर। फिर रुक गई।
"अंदर कुछ है," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ अचानक धीमी हो गई। "कुछ है, अंकुश। और ये हल्का नहीं है।"
मैंने मेज़ पर झुककर देखा। हत्थे के अंदर एक छोटी सी खोखली जगह थी, इंच भर की, और उसमें एक पतला-सा मुड़ा हुआ काग़ज़।
वो काग़ज़ पीला था, पर उस पीलेपन में भी कुछ अलग था — जैसे बरसों तक किसी के पसीने और साँस के बीच रहकर उसने रंग बदल लिया हो। किनारे मुलायम थे, जैसे सूखा हुआ पत्ता। और मोड़ इतने गहरे थे कि लगता था काग़ज़ खुद भूल गया है कि खुला कैसा दिखता है।
उस्ताद ने उसे दो उँगलियों से निकाला। फिर मेज़ पर रखकर, बिना जल्दी किए, एक-एक मोड़ खोलने लगे।
पहला मोड़ खुला — काग़ज़ का किनारा चटका, जैसे किसी बूढ़े की हड्डी।
दूसरा मोड़ — माँ ने दीया और पास कर दिया।
तीसरा मोड़ — पापा ने साँस रोक ली।
चौथा मोड़ — और काग़ज़ पूरा खुल गया।
उस पर नीली स्याही में लिखाई थी। साफ़, झुकी हुई, थोड़ी हड़बड़ाई हुई लिखाई। पाँच लाइनें। और उनके नीचे, अलग से, थोड़ी दूर पर, एक तारीख़।
उस्ताद ने झुककर पढ़ा। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने पढ़ा — इस बार धीरे, पर इतनी साफ़ कि कमरे की हर दीवार सुन ले।
“जो इसे पढ़े, वो दोनों खानदानों को सामने बुलाकर सच बोले। जो छिपाएगा, उसका जोड़ टूटेगा, और टूटा हुआ फिर कभी न जुड़ेगा। मैंने अपनी तरफ़ का सच लिख दिया। बाकी जो पढ़ रहा है, उसका है।”
उस्ताद रुके। उनका गला सूखा था, मैं सुन सकता था।
"और नीचे?" मैंने पूछा।
उन्होंने काग़ज़ को दीये के और करीब किया।
“भाई, माफ़ी माँगने की हिम्मत मुझमें नहीं रही। इसलिए ये काग़ज़ मशीन के नीचे रखे जा रहा हूँ। जो इसे पढ़े, वो मेरी तरफ़ से बोले — मैंने जो किया, वो मेरी मर्ज़ी से किया, किसी के कहने से नहीं।”
और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, एक नाम।
इलियास।
उस्ताद का हाथ खुला और पेचकस मेज़ पर गिरा। ठक। इतनी देर में कोई चीज़ इतनी ज़ोर से नहीं गिरी थी। फिर वो कुर्सी की तरफ़ लड़खड़ाए और बैठ गए, दोनों हाथ घुटनों पर, सिर झुका हुआ।
कमरे में एक भी आवाज़ नहीं थी। दीये की लौ भी जैसे साँस रोककर जल रही थी।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा और उनके पास बैठ गया। "उस्ताद, ये सलीम के हाथ की लिखाई है?"
उन्होंने सिर हिलाया। बस एक बार।
"है," वो बोले। आवाज़ ऐसी जैसे किसी कुएँ से आ रही हो। "ये मेरे भाई के हाथ की लिखाई है। मैं इसे किसी भी काग़ज़ पर पहचान लूँगा। उसका ‘मा’ ऐसा ही टेढ़ा आता था। बचपन में मैं उसकी कॉपी देखकर हँसता था — कहता था, तेरा ‘मा’ ऐसे क्यों गिरता है जैसे पहाड़ से उतर रहा हो।"
फिर उन्होंने अपना चश्मा उतारा और मेज़ पर रख दिया, और मैंने पहली बार देखा कि उस्ताद अली बक्श की आँखें बिना चश्मे की कितनी छोटी और कितनी थकी हुई लगती हैं।
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