The Mysterious Bell – Chapter 431
मेरी आवाज़ भर आई, पर मैं रुका नहीं।
"मुझे हर बात सबसे आख़िर में बताई जाती है। स्कूल में भी। अरे, दुकान की जो हालत थी वो भी पता चली आज — कि जब मैं यहाँ पंद्रह साल का था, दुकान बंद हो चुकी थी, और ये काग़ज़ पर पापा की थी। पाँच साल से तो पापा यहाँ औज़ार पोंछते आ रहे हैं — और मुझे कभी नहीं बताया कि यह दुकान उनकी है!"
पापा उठे। उनका शरीर धीमा था, पर उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली — ठंडे हाथों से, धीरे से।
"बेटा।"
"क्या?"
"मुझे माफ़ कर दे।"
मैं रुक गया।
"मैं तुझे सबसे आख़िर में बताता था," पापा ने कहा, "क्योंकि तू सबसे छोटा था। पर वो सच नहीं है। तू सबसे छोटा नहीं था, तू सबसे दूर था। तेरे पास से मैं गुज़रता था, देखता था तू रिंच उठाता, दुकान सँभालता, और मुझे लगता — ये लड़का मेरे सच का बोझ न उठा पाएगा। मैं तुझे कमज़ोर समझता रहा, और तू उतना ही मज़बूत होता गया। ग़लती मेरी थी।"
मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा।
"डर सच नहीं बोलता, बेटा," पापा ने कहा। "डर चुप रहता है। और चुप्पी — चुप्पी इंसान को बचाती नहीं, वो बस उसे अकेला कर देती है। मैं पाँच साल अकेला रहा, इस घर में रहते हुए।"
मुझे कुछ कहना था, पर गला अटक गया।
तभी दरवाज़े पर खड़ी परछाईं हिली।
मैंने पलक उठाकर देखा — उस्ताद अली बक्श खड़े थे। उनका मोटा चश्मा और सफ़ेद दाढ़ी आधे अंधेरे में थे। हाथ में कुछ लपेटा हुआ था — एक छोटी पोटली, जो उन्होंने दरवाज़े के बाहर रख दी, जैसे पहले कुछ नहीं।
"उस्ताद," माँ ने कहा। "आइए।"
वो अंदर आए, अपना चश्मा ठीक किया, और सीधे पापा की तरफ़ बढ़े।
"शंकर," उन्होंने कहा। "पेचकस दो।"
पापा ने रुककर उनकी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, "मेरे खानदान के औज़ारों का हत्था कभी सादा नहीं होता।"
माँ ने घूमकर उनकी तरफ़ देखा।
"क्या मतलब?"
"हमारे पुराने सिलसिले में सुनार, लोहार, दर्ज़ी — किसी के औज़ार पर काम का नाम खुदता है। पर उस खुदाई के नीचे," उस्ताद ने अपनी उँगली पेचकस के चिकने हत्थे की तरफ़ बढ़ाई, "हर हत्थे के अंदर एक खोखली जगह होती है। छोटी सी। इंच भर। किसी में पैसा, किसी में काग़ज़, किसी में दुआ का कोई लफ़्ज़। पर खोखली जगह होती हर हत्थे में है — चाहे वो पचास साल पुराना हो, चाहे आज का।"
पापा ने पेचकस अपने सीने से हटाया।
"उस्ताद," पापा ने कहा, "मैंने ये पेचकस तीस साल से पकड़ा है। इसे बनाने वाले मास्टर ने मुझे कभी नहीं बताया—"
"क्योंकि बताना नहीं होता," उस्ताद ने कहा। "आदमी को खुद पता चलना होता है कि उसकी चीज़ में कब, किस वक़्त, क्या छिपा है।"
उस्ताद ने पेचकस उनसे लिया। उनकी उँगलियाँ पेचकस पर धीरे-धीरे चलीं, जैसे वो किसी चीज़ को टटोल रही हों। फिर वो हथेली पर उसे परत-परत देखने लगे।
"अंकुश," उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखे बिना कहा, "लोहार का एक औज़ार उठा। छेनी।"
मैं उठकर दुकान गया। मेज़ पर पड़ी औज़ार की पेटी खोली और हल्की छेनी लेकर लौटा। उस्ताद ने उसे दीये की लौ में देखा, फिर पेचकस के हत्थे के आख़िरी सिरे पर रख दिया।
"अब सुनो, सब।"
उन्होंने छेनी को इतना हल्का रखा, जितना छेनी से कोई अपनी ही नाखून को छूए। फिर धीरे से मोड़। एक बार। दो बार। और फिर जोर दिया — धीरे पर सीधा।
हत्थे के सिरे पर बनी लकड़ी की गोल पट्टी, जिसे मैं बस चिकना लकड़ी मानता था, एक छोटी सी आवाज़ के साथ घूम गई — जैसे पुराने ताले की चाबी अपनी जगह बैठ जाए।
पापा ने साँस रोक ली।
उस्ताद ने पेचकस उलटकर हमारी तरफ़ किया। हत्थे के अंदर की खोखली जगह दिख रही थी। छोटी, इंच भर, और उसमें —
उसमें एक पतला, मुड़ा हुआ काग़ज़ था।
मैंने देखा। माँ ने देखा। काजल ने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया। पापा ने आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई चीज़ उनके सामने से गुज़रने वाली हो और वो उसे पकड़ नहीं पा रहे हों।
उस्ताद ने काग़ज़ बाहर निकाला और धीरे से खोला। बहुत पुराना था — रंग पीला पड़ चुका था, किनारों से परत छूट रही थी — पर स्याही अब भी साफ़ थी। नीली स्याही।
"क्या है ये?" माँ ने पूछा।
उस्ताद ने उस काग़ज़ पर उँगली रखी।
"एक हिसाब," उन्होंने कहा। "और एक माफ़ी। दोनों एक ही काग़ज़ पर लिखे हैं।"
मैंने आगे बढ़कर झाँका। काग़ज़ पर जो लिखा था, वो आज की तारीख़ की भाषा नहीं थी — पुरानी लिखाई, जैसे कोई इसे लिखते वक़्त हड़बड़ी में हो या रो रहा हो।
"ये मेरे पास कैसे पहुँचा?" पापा ने पूछा। "मैंने ये काग़ज़ कभी नहीं लिखा।"
उस्ताद ने काग़ज़ ऊपर उठाया। दीये की लौ काग़ज़ पर पड़ी और स्याही में एक अक्षर चमका — बहुत ही छोटा, फिर भी साफ़।
"यहाँ कोई नाम लिखा है," उस्ताद ने कहा, "जो इसे इस पेचकस में रखने वाले का नहीं है। यह नाम उस आदमी का है जिसने इसे रखा — और फिर पचास साल से लोगों से छिपाया।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी उनमें नहीं देखा था। दया नहीं। डर नहीं। अपराधबोध।
"उस्ताद," मैंने कहा। "क्या आप ये काग़ज़ जानते हैं?"
उन्होंने काग़ज़ मेरी हथेली पर रख दिया और पलटकर दरवाज़े की तरफ़ मुँह कर लिया।
उनकी आवाज़ में पहली बार सालों की मिट्टी थी।
"इलियास का हाथ जो पचास साल पहले मुझसे मेरी ही दुकान की मशीन पर सिलाई करके गया था," वो बोले, "उसका निशान आज भी उस काग़ज़ पर है।"
और फिर उस्ताद ने एक ऐसी बात कही जिस पर मैं तैयार नहीं था।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"ये पेचकस खोलो। और अगर मेरा अंदाज़ा सही है," उन्होंने कहा, "तो इस हत्थे के अंदर वो बात बंद है जिसने पचास साल पहले दो भाइयों को अलग किया।"
मैंने पेचकस हाथ में लिया। हल्का था — जैसे अब भी कुछ न बोले, बस इंतज़ार करे।
"और आज," उस्ताद ने कहा, "अगर सच में तेरा जोड़ केंद्र है, तो ये पहली परीक्षा है उसकी — कि तू अपने घर के सच को भी उसी तरह सह सके, जैसे दूसरों का सहता है।"
मैंने उस काग़ज़ को दोबारा देखा। नीली स्याही, मुड़ा हुआ काग़ज़, और नीचे — मैंने अपनी नज़र सिकोड़कर देखा — नीचे एक छोटी सी लकीर थी।
उस लकीर के ऊपर जो नाम था, वो पढ़ते ही मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।
वो नाम था — शंकर।
नहीं, मेरे पापा का नाम नहीं। बस अक्षर वही थे।
वो नाम था — शंकरलाल।
मैं मुड़ा। पापा ने काग़ज़ देखा और उनका चेहरा राख जैसा हो गया।
"शंकरलाल," पापा ने धीरे से दोहराया। "ये नाम मेरे पिता का नहीं था। मेरे दादा का भी नहीं।"
"ये तेरे दादा जगदीश यादव के बड़े भाई का नाम है," उस्ताद ने कहा। "जो पचास साल पहले गली से उसी रात गायब हुए जिस रात साझा दुकान जली थी। और जिसका नाम आज तक किसी काग़ज़ पर नहीं आया — सिर्फ़ इस हत्थे में।"
मैंने पेचकस और कसकर पकड़ लिया।
अब मुझे पता था, आज रात के बाद, सुबह पीपल पर, उस रजिस्टर के साथ — एक और नाम खुलेगा। और वो नाम उस सात अंगूठों वाली शर्त में आठवाँ बनकर घुसेगा, चाहे सलीम बक्श कुछ भी बोले।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा और फुसफुसाई, "अंकुश, ये सब क्या है?"
मैंने दीये की लौ की तरफ़ देखा।
"पता नहीं," मैंने कहा। "पर आज रात के बाद ये बात किसी पेचकस के अंदर नहीं रहेगी।"
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