The Mysterious Bell42 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 42

7 min read November 5, 2026

"बाप ने कहा था कि साइकिल मेरी नहीं, तेरी है। उसने मरते वक़्त मेरा हाथ पकड़ा था और कहा था — मोहन को दे देना। मैंने तब मना कर दिया था, उसकी साँस के साथ बहस नहीं करनी चाहिए थी। पर मैंने साइकिल अपने पास रख ली थी। मैंने सोचा, ये मेरे पास रहेगी तो बाप जैसे पास रहेंगे। पागलपन था। मैं साइकिल को बाप से अलग नहीं कर सकता था, और तुझे इससे जोड़ नहीं पा रहा था। जब तूने उसे उठाया, मैंने सुख की साँस ली। मैंने सोचा, देर से सही, चीज़ अपनी जगह पहुँच गई।"

मोहन ने उसकी तरफ़ देखा, और उस वक़्त उसकी आँखों में जो था वो गुस्सा नहीं था। वो कुछ था जो बहुत देर से बाहर आ रहा था — दुख नहीं, बस धुआँ जो सालों से आँखों में भरा पड़ा था।

"भैया," उसने कहा, बहुत धीरे।

"हाँ।"

"अब क्या करें?"

गिरधारी ने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। पहले नहीं रखा था। अब रखा। छोटी सी चीज़ थी, दो उँगलियाँ किसी के कंधे पर, पर उस कमरे में वो ऐसी गूँजी जैसे कोई बड़ा ढोल बजा हो।

"अब कुछ नहीं," गिरधारी ने कहा। "बस ये चेन जोड़ेंगे। बाक़ी तो पहले ही जुड़ गया।"

मैं हिला।

मेरी मुट्ठी में जो कड़ी थी, वो गरम हो गई। नहीं, गरम नहीं — कुछ और। जैसे कोई सिक्का आपकी हथेली पर रखकर चला जाए और उसकी गर्मी रह जाए। मैंने हाथ खोला। कड़ी काँप रही थी, हल्की, जैसे पिंजड़े से छूटने से पहले चिड़िया काँपती है।

और फिर मैंने देखा।

साइकिल की चेन बेंच पर पड़ी थी। दो टुकड़े। उनके बीच में खाली जगह थी, बिल्कुल उतनी जितनी एक कड़ी की होती है। और मेरी हथेली से वो कड़ी उठी। नहीं, मैंने उसे उठाया नहीं था। मेरी हथेली में कुछ नहीं था, और चेन जुड़ रही थी, धीरे-धीरे, जैसे साँस लेते हुए।

कड़ी चेन के उस हिस्से से चिपकी जहाँ उसे होना चाहिए था। धातु ने धातु को पहचाना। उन दोनों टुकड़ों ने एक दूसरे की तरफ़ सरका और मिल गए। एक छोटी सी आवाज़ हुई, जैसे चाय की प्याली में चम्मच रखा हो। और चेन पूरी हो गई।

मैंने अपने हाथ को अपनी आँखों के सामने किया। खाली था।

मेरी जेब से घंटी बजी।

एक बार। साफ़। छोटी।

और मेरे कान में उसकी आवाज़ आई — वही आवाज़, जो कभी पूरी बात नहीं कहती, चुभती नहीं, थपकी देती है।

"जुड़ा," उसने कहा।

मैंने आँखें बंद कर लीं। मैंने कुछ होने का इंतज़ार किया। कुछ बड़ा। कुछ चमकदार। कुछ ऐसा जिससे मैं समझ जाऊँ कि कुछ हुआ है।

कुछ नहीं हुआ। बस एक हल्की गर्मी, सीने के बीच से, बाएँ तरफ़, धीरे-धीरे बाहर फैल गई।

और फिर मैंने सुना — घंटी की आवाज़, बहुत धीमी, जैसे मुझसे ही बात कर रही हो, "दस।"

मैंने आँखें खोलीं।

"दस?" मैंने धीरे से कहा।

"पहला। तेरा।"

मैं ठिठका। "कैसे?"

"सच्ची माफ़ी से नहीं। सच्ची बात से। दोनों ने वो कहा जो अंदर सड़ रहा था।" घंटी एक पल रुकी। फिर बोली, "दस। थोड़ा कम था। बड़ा जोड़ था, पर देर से जुड़ा। समय भी गिना जाता है। समय पेड़ की तरह है — जितनी देर तक जड़ काटी जाए, जोड़ कमज़ोर रहता है।"

मैं कुछ समझा, कुछ नहीं। पर मैंने सिर हिलाया। "ठीक है।"

मैंने मुट्ठी भींची और ये सोचा कि चाहे कुछ समझ न आए, दस है। दस दिखते नहीं, पर मेरे अंदर हैं। मेरे अंदर कोई ऐसी जगह है जहाँ ये दस बैठे हैं। कहाँ, मुझे नहीं पता। पर हैं।

मैं अपनी जेब में हाथ डालकर खड़ा था, जब साइकिल के पास कुछ हिला।

उस्ताद थे।

मुझे पता ही नहीं चला कब दरवाज़ा खुला। नहीं जानता कि उन्होंने ताला कब खोला। वो बस अंदर आए, चुपचाप, अपने पुराने काले जूतों में, जिनकी एड़ी घिस गई थी। उन्होंने हम तीनों की तरफ़ नहीं देखा। सीधे साइकिल के पास गए। अपना चश्मा ठीक किया, झुके, और उसके ऊपर चेन को देखा।

फिर उन्होंने पिछला पहिया पकड़ा और उसे घुमाया।

पहिया घूमा। चेन चली। छोटी सी धातु की आवाज़ आई, जैसे कोई बच्चा हँसता हो। पहिया दो चक्कर घूमा, तीन, और उस्ताद की उँगलियाँ उस पर टिकी रहीं, गोल, हल्की, जैसे वो किसी बच्चे का सिर सहला रहे हों।

फिर उन्होंने पहिया रोका। हाथ पोंछे। और बिना कुछ कहे मुड़े।

"उस्ताद," मैंने कहा।

वो रुके, पर पलटे नहीं।

"माफ़ कर दीजिए," गिरधारी ने कहा, अचानक, बिना मेरे पूछे।

उस्ताद कुछ देर चुप खड़े रहे। फिर बोले, "माफ़ी भी हिसाब है, गिरधारी। मैंने तुम्हें कभी ग़लत नहीं समझा। तुमने मेरे पास से जो सीखा, वो तुमने कभी नहीं छोड़ा। बस जब चीज़ें टूटीं, तुम ताले बंद करके चले गए। आदमी को ताला बंद करके नहीं छोड़ना चाहिए, गिरधारी। आदमी को दरवाज़ा खुला छोड़कर जाना चाहिए, ताकि अगर कोई दूसरा आए तो अंदर आ सके।"

वो बाहर चले गए। दरवाज़ा खुला रह गया। ताला ज़मीन पर पड़ा था।

मैंने बाहर की तरफ़ देखा। उस्ताद की दुकान चल रही थी — टिक, टिक, टिक। और उस आवाज़ के पार गली की आवाज़ें आ रही थीं — किसी का बर्तन गिरना, किसी का बच्चा रोना, शबनम आपा की चिमटी की ठक-ठक।

और मैंने वो देखा जो मेरी गली में कभी नहीं होना चाहिए था।

मेरी दुकान खुली थी। बोर्ड लगा था — टिंकू ने लगाया था, मेरे कहे मुताबिक़। पर बोर्ड के नीचे, दुकान के अंदर, मेरी औज़ारों की अलमारी खुली थी, और टिंकू झुका हुआ था, हाथ में कुछ लिए, और उसके कंधे हिल रहे थे — वो डर के हिलते हैं, जिस तरह से चोरी करते वक़्त किसी का शरीर हिलता है।

मैंने आँखें झपकीं।

वो मुझे नहीं देख रहा था। वो अलमारी में झाँक रहा था, और उसका हाथ जो पकड़े था वो मेरी नई रिंच थी।

मेरी रिंच। वो जो मैंने पिछले महीने खरीदी थी, दो महीने की कमाई से।

मुझे कुछ नहीं सोचा। मैं सीधा उसकी तरफ़ चला। और मैंने वो किया जो कोई दुकानदार अपने शागिर्द के साथ करता है जब वो उसे चोरी करते पकड़े — मैंने उसकी कलाई पकड़ ली।

टिंकू चौंका। उसकी आँखें फैल गईं। रिंच उसके हाथ से फिसली और ज़मीन पर गिरी — ठन। उसकी आवाज़ गली में गई।

"उस्ताद," वो फुसफुसाया।

"मैं कुछ नहीं सुन रहा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ पहले से ज़्यादा ऊँची निकली, इससे भी ज़्यादा जो मैं चाहता था। "तू मेरी दुकान में है, मेरी अलमारी खोली है, मेरा सामान उठाया है, और तू मुझे 'उस्ताद' कहता है?"

टिंकू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसके घुटने पर जो पट्टी थी वो पुरानी थी और उसके किनारे पर सूखा खून था — नई खरोंच नहीं, पुरानी। वो ज़मीन पर बैठ गया। मैंने उसकी कलाई नहीं छोड़ी, पर मैंने उसे धीरे से बैठने दिया।

"मैंने बेचने के लिए नहीं उठाई थी," वो बोला।

"तो क्या करने के लिए उठाई थी?"

"मैं…" उसकी आवाज़ फँसी। "मैं इसे… मैं इसे अपने पास रखना चाहता था।"

"क्यों?"

वो चुप रहा। और फिर उसने अपना सिर उठाया, और उसकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रहा था। वो अपने आप को रोक रहा था, जो इस उम्र में रोने से भी ज़्यादा मुश्किल होता है।

"क्योंकि मुझे काम चाहिए," उसने कहा।

मैं ठिठका। "तू मेरे पास काम करता है।"

"नहीं, मुझे असली काम चाहिए। ऐसा काम जो मुझे दुकान पर रखे। ऐसा काम जो रोज़ हो। जिसके पैसे हों। जो कभी न छूटे।"

"तो ये औज़ार चुराकर तू अपने आप को ये दिखा रहा था कि तू दुकान वाला बन गया?" मेरी आवाज़ में तेज़ी थी, और ये तेज़ी मुझे भी अच्छी नहीं लग रही थी, पर रुकना भी नहीं चाहता था।

"मुझे डर लगा," टिंकू ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में कोई नाटक नहीं था। "मुझे डर लगा कि तुम मुझे किसी दिन कह दोगे कि अब स्कूल जा, यहाँ काम नहीं है।"

मैंने उसकी कलाई छोड़ दी।

"क्यों कहेगा?"

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