The Mysterious Bell – Chapter 383
और तभी —
आदमी उठा।
अचानक उठा। वो हाथ जो अब तक सिर पर थे, उन्हें नीचे किया, फिर एक कदम आगे बढ़कर उसने बक्से की तरफ़ हाथ बढ़ा दिया।
"अम्मा," उसने कहा।
उसकी माँ ने बक्सा नहीं छोड़ा।
"मैं इन्हें बेचूँगा," उसने कहा।
उसकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। वो धीमी थी। पर थी ठोस — जैसे किसी ने गीली मिट्टी को अचानक ईंट बना दिया हो।
"मैं इन्हें बेचूँगा," उसने दोहराया। "पर पहले ये कुर्सी चले।"
वो उसे ले जाने से पहले, उस कुर्सी पर बैठकर उसे माँ को ले जाना होगा।
"अम्मा," उसने कहा, "अगर तुम कहो कि ये कुर्सी ठीक हो जाएगी, तो मैं इस बक्से को तेरे कमरे में वापस रख दूँगा और बाहर जाकर अपनी मेहनत से कुछ और ढूँढूँगा।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा।
फिर मेरी तरफ़ देखा।
फिर टिंकू की तरफ़ — जो अब भी मुँह धोकर लौटा था, गाला धोया, पर माथे पर अब भी एक हल्का काला निशान था।
"तुम बता," उन्होंने कहा — मुझसे। "ये कुर्सी चलेगी?"
और मैं खड़ा रहा।
मैंने पहले कुर्सी देखी। फिर बक्सा। फिर उसका बेटा। फिर उसकी माँ।
"अम्मा," मैंने धीरे से कहा, "इसे चलने में सिर्फ़ पहिया नहीं लगेगा।"
"तो?"
"कुछ और भी लगेगा।"
"क्या?"
और जवाब में — जैसे मेरे कंधे के पीछे से कोई आवाज़ आई हो, बिल्कुल जेब से, बहुत मद्धम —
"एक कुर्सी," घंटी ने कहा। "दो टूटे दिल।"
बूढ़ी माँ ने मेरी जेब की तरफ़ देखा। कुछ नहीं बोलीं। पर उनका हाथ बक्से पर था, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जैसे उन्होंने वो आवाज़ सुनी हो — या सिर्फ़ सुना होने का भ्रम हुआ हो, और वो भ्रम वो किसी को नहीं बताएँगी।
क्योंकि ये बात जानने के लिए उस घंटी को जानना पड़ता है।
और उस घंटी को कोई नहीं जानता — सिवाय उनके, जो इसे हर रोज़ जेब में रखते हैं।
मैंने गर्दन हिलाई। अचानक सूरज की रोशनी तेज़ लगी।
टिंकू मेरे पास खड़ा हो गया।
"उस्ताद," उसने धीरे कहा, "ये कुर्सी घर ले चलें?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"ले चलें," मैंने कहा। "पर पहले किसी से पूछना पड़ेगा — ये कुर्सी किसकी है।"
मैं उस बूढ़ी माँ की तरफ़ मुड़ा।
"अम्मा," मैंने कहा, "ये कुर्सी किसकी है?"
उन्होंने बक्सा छाती से लगाया रहा, सिर उठाया।
"ये मेरे पति की थी," उन्होंने कहा। "अस्पताल में पड़े थे, उस ज़माने की है। मरने के बाद यहीं छोड़ दी। कोई नहीं उठाता। कोई नहीं बेचता।"
"तो अब?" मैंने कहा।
कुछ पल चुप।
"अब?" उन्होंने कहा। "अब जो इसे चलाए।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
फिर उसने अपनी कमीज़ की जेब से, वही पुरानी ग्रीस की डिब्बी निकाली — और अपनी हथेली पर उँगली से एक लकीर खींच दी, जैसे कोई मिस्त्री शपथ लेता है।
"उस्ताद," उसने कहा, "ये मेरा पहला काम है।"
और फिर — मुझे याद रहेगा — उसने अपना सिर ऊँचा किया, और उस काले निशान वाले माथे के नीचे, आँखों में वो चमक थी जो गली के बच्चों की आँखों में तभी आती है जब उन्हें लगता है कि कोई उन्हें बड़ा आदमी समझ रहा है।
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"चल," मैंने कहा। "पहले माँ की दवा। फिर कुर्सी।"
हम मुड़े।
और मेरे पीछे, बूढ़ी माँ ने अपनी आवाज़ में, पहली बार, इतना ही कहा —
"बेटा —"
मैं रुका।
"तू कल आ जाना। यहीं सीढ़ी के पास। मैं तेरे लिए बैठी मिलूँगी।"
मैंने सिर हिलाया।
"आ जाऊँगा, अम्मा।"
और मैं आगे बढ़ा — अस्पताल की तरफ़।
पर अंदर जाते वक़्त, एक पल के लिए, मेरी नज़र उस बक्से पर पड़ी — और उस ज़ंग लगे कोने पर, फिर से।
और मुझे लगा — वो तेरहवीं चीज़, जो उनके पति के सीने में थी और अस्पताल से साथ चली गई थी —
वो कहीं मेरे दादा के रजिस्टर में लिखी न हो।
॥
दवा की खिड़की पर जो आदमी बैठा था, उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। उसके कान पर कलम थी, चश्मे का एक काँच धागे से बँधा हुआ था, और सामने मोटा रजिस्टर खुला पड़ा था। मैंने परची खिड़की के भीतर सरका दी।
"यादव?" उसने कहा, बिना सिर उठाए।
"जी।"
"नई खेप रुकी है।"
"कब तक?"
"जब तक काग़ज़ साफ़ न हो।"
मैंने अपनी उँगली खिड़की की जाली पर रखी और एक पल के लिए आँखें बंद कर लीं। काग़ज़। हर बात का जवाब काग़ज़। माँ की साँस, माँ की दवा, माँ का पलंग — और जवाब में हमेशा एक काग़ज़।
"भाई साहब," मैंने कहा, "दवा काग़ज़ नहीं पढ़ती। दवा बीमारी पढ़ती है।"
उसने पहली बार सिर उठाया। थका चेहरा था, ऐसा जैसे वो भी इस जाल में फँसा हो, पर अपनी नौकरी बचाने के लिए ऊपर वालों की तरफ़ देख रहा हो।
"बेटा," उसने धीरे से कहा, "मेरे हाथ में सिर्फ़ रजिस्टर है। दवा ऊपर वाले रैक में बंद है।"
मैंने सिर हिलाया।
"ठीक है," मैंने कहा। "रजिस्टर संभालो।"
मैं मुड़ा और सीढ़ियों की तरफ़ चला।
पीछे से उसकी आवाज़ आई — "सुनो —"
मैं रुका।
"डॉक्टर साहब ऊपर हैं। वो कुछ कर पाएँ, तो करें। मेरी तरफ़ से कह देना।"
मैंने हाथ उठाया, पीछे देखे बिना।
नीचे उतरकर मैंने देखा — बूढ़ी माँ अब भी सीढ़ी की पहली पायदान पर बैठी थीं, बक्सा सीने से चिपका हुआ, और आँखें उस दरवाज़े पर जहाँ से लोग आते-जाते थे। उनका बेटा चार कदम दूर, दीवार की तरफ़ मुँह किए खड़ा था, दोनों हाथ जेब में, और कंधे ऐसे झुके हुए जैसे किसी ने उन पर बोरी रख दी हो।
टिंकू मेरे पीछे खड़ा था, कंधे पर औज़ारों का थैला और हाथ में व्हीलचेयर का ढाँचा, जो चलते-चलते उसकी टाँग से टकरा रहा था।
"उस्ताद," उसने फुसफुसाकर कहा, "कुर्सी ऐसे लटक रही है जैसे कोई मुर्दा।"
"तो उसे ज़िंदा करना पड़ेगा," मैंने कहा।
"कब?"
"पहले बात।"
टिंकू ने मुझे देखा, फिर माँ को, फिर बेटे को।
"बात?" उसने कहा। "उस्ताद, ये लोग तो बात करने के मूड में नहीं हैं।"
"इसीलिए तो," मैंने कहा।
मैंने दोनों को उठाया और पीछे वाले बरामदे में ले गया। वो बरामदा अस्पताल का सबसे पुराना हिस्सा था — जहाँ पहले लोग बैठकर अपनी बारी का इंतज़ार करते थे, और अब टूटी बेंचें रखी थीं। छत पर पंखा लटका था, जिसके ब्लेड पर धूल की मोटी परत थी, जैसे सालों से कोई छत को भूल गया हो। एक तरफ़ जालीदार खिड़की थी, जिससे धूप आड़ी-तिरछी पट्टियों में आ रही थी, और उन पट्टियों में धूल के कण ऐसे तैर रहे थे जैसे हवा में कोई बहुत धीरे से साँस ले रहा हो।
फ़र्श पर पुरानी टाइलें थीं, दो-तीन उखड़ी हुई, और एक जगह पानी टपकने से काला निशान बन गया था। दीवार पर पीली रंगत थी, जिस पर नीचे की तरफ़ कोई चारपाई सरका देता था तो रगड़ के निशान रह जाते थे।
मैंने एक बेंच का पाया ठीक से ज़मीन पर रखा — वो हिल रही थी — और उस पर कपड़ा बिछाया।
"अम्मा," मैंने कहा, "यहाँ आ जाइए।"
वो बैठीं। बक्सा उनकी गोद में आ गया। उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, ऐसे जैसे कोई बच्चा गिर जाने के डर से चादर का कोना पकड़ता है।
"और तुम," मैंने बेटे से कहा, "सामने बैठो।"
"मैं खड़ा हूँ," उसने कहा।
"मुझे पता है। बैठो।"
वो खड़ा रहा। मैंने उसकी तरफ़ देखा, उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
टिंकू ने व्हीलचेयर का ढाँचा लाकर उन दोनों के बीच, फ़र्श पर, टेढ़ा खड़ा कर दिया — जैसे बीच में कोई मेज़ रख दी गई हो, जिस पर कुछ रखा जाना है।
फिर मैंने कहा।
"अम्मा, तुम्हारे बेटे ने ये सामान दस हज़ार में बेचने का सोचा है। मैं उसे रोक नहीं सकता, मेरा कोई हक़ नहीं है। पर मेरे यहाँ एक नियम है — और वो मेरा नहीं, मेरे उस्ताद का है, जो पचास साल से इस गली में सिलाई करते हैं।"
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