The Mysterious Bell382 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 382

7 min read November 5, 2026

मुझे बुरा नहीं लगा। सच कहूँ, तो हँसी आयी मुझे भी। अम्मा जैसी औरतें हँसी नहीं जीततीं — वो हँसी को ऐसे मोड़ देती हैं कि हँसने वाला खुद को छोटा पा लेता है।

"अम्मा," मैंने कहा, "घर तो मैं करता नहीं, बस जोड़ता हूँ।"

"तो जोड़ के दिखा।"

"यही तो सोच रहा हूँ।"

वो मुझे देखती रहीं। फिर धीरे से बक्से पर अपना हाथ रख दिया, जैसे कोई सोए बच्चे के सिर पर रखता है।

तभी टिंकू की आवाज़ आई।

"उस्ताद!"

मैं मुड़ा।

वो व्हीलचेयर के पास घुटनों के बल बैठा था और बीच में कुछ कर रहा था। मेरी टूलकिट — जो उसने मेरी साइकिल के पीछे बंधी सीट के नीचे से निकाल ली थी — खुली पड़ी थी। उसने रिंच निकाली थी, फिर पोंछा, फिर धुरी पर लगी ज़ंग पर हाथ रगड़ा।

"अरे, इसे छू क्यों रहा है?" मैंने कहा। "उससे हाथ खराब होगा।"

"हाथ तो ठीक हो जाएगा उस्ताद, पहिया नहीं हो रहा।"

और फिर, बिना परवाह किए, उसने जेब से एक पुरानी ग्रीस की डिब्बी निकाली — जो मैंने उसे दो हफ़्ते पहले दी थी, चेन पर लगाने को, "जितनी ज़रूरत हो उतनी ले" कहकर — और उसने उसमें से एक उँगली भर ग्रीस लेकर पहिये की धुरी पर लगा दी।

फिर अपने माथे को उसी उँगली से सहलाया।

ये क्या किया!

ग्रीस से उसका माथा काला हो गया। फिर वो चश्मा ठीक करने के लिए हाथ ले गया — चश्मा भी काला। फिर उसने मुझे देखकर हँसा — और दाँत अब खुद चमक रहे थे, बाकी चेहरा रात जैसा।

बच्चे हँस पड़े।

सानिया जो पीछे खड़ी थी, हँसते-हँसते दीवार पकड़कर झुक गई। गुड्डू ने अपनी टाट की टोपी माथे पर रखी और "जासूस बाबू की जय" चिल्लाया। रफ़ीक़ अपना टूटा चश्मा आँख पर चढ़ाकर टिंकू को देखने लगा और बोला, "अब तो ये काले साहब लग रहे हैं।" चिंटू ने सबसे ऊँची आवाज़ में कहा, "उस्ताद, ये आपका शागिर्द है या काला चोर?"

टिंकू ने बिना हिचके कहा, "चोर नहीं, मिस्त्री। चोर चुपके आता है। मिस्त्री को सब देखते हैं।"

शबनम आपा की आवाज़ पीछे से आई — वो भी अस्पताल के गेट पर आ खड़ी थीं, गुमटी किसी को सौंपकर।

"बारह साल की कमाई से पहली बार किसी मिस्त्री को सब देख रहे हैं!"

बूढ़ी माँ ने एक बार टिंकू की तरफ़ देखा।

और फिर — ज़रा देर के लिए — उनके चेहरे पर कुछ बदला। कुछ पिघला। कोई ऐसा जो सालों से जम गया था और अब एक बच्चे के काले माथे को देखकर, ज़रा-सा हिल गया।

पर ये सिर्फ़ एक पल था।

क्योंकि तभी उनका बेटा उठा।

उसने ज़मीन से हाथ टेके, उठा। धूल झाड़ी। फिर सीढ़ी की तरफ़ बढ़ा और अपनी माँ के सामने खड़ा हो गया।

"अम्मा —"

"चुप।"

"अम्मा, सुन तो —"

"मैंने सुना।" उन्होंने कहा। "तू बेचने की बात कर रहा है। बेच।"

सब चुप हो गए।

"पर पहले ये कुर्सी चले," उन्होंने कहा। "क्योंकि अगर मैं मरने से पहले ये बक्सा बेचे जाना देखूँगी, तो मुझे कम से कम उठने की ताक़त चाहिए। और अगर तू मुझे उठाकर ले जाएगा — तो याद रख, जब तू मुझे उठाएगा, तब तेरे पिता की तस्वीर तेरे हाथ से गिर जाएगी।"

आदमी ने एक लंबी साँस ली, और फिर वो व्हीलचेयर की तरफ़ मुड़ा।

टिंकू अभी भी उसके पास बैठा था। उसने एक पहिया जोड़ लिया था, दूसरा अभी भी मुड़ा हुआ था।

आदमी ने देखा। कुछ बोला नहीं। बस वहीं पास में बैठकर अपने हाथ पर सिर रख दिया।

मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा।

"भाई साहब —"

"मत बोलो," उसने कहा। आवाज़ रुँधी थी। "मुझे पता है तुम क्या बोलोगे। तुम बोलोगे कि बूढ़ी माँ की बात सुनो। पर तुमने उस काग़ज़ को नहीं देखा जो मेरी जेब में है। उस पर तारीख़ लिखी है। पंद्रह दिन बाद। उसके बाद ब्याज भी नहीं, सिर्फ़ —" वो रुका। "सिर्फ़ बक्सा, औज़ार, और मेरी माँ की साड़ी।"

मैं कुछ देर चुप रहा।

फिर मैंने अपना हाथ उसके कंधे से हटाया और व्हीलचेयर के पास बैठ गया।

टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।

"उस्ताद, धुरी जाम है।"

"धुरी जाम है तो जाम है," मैंने कहा। "तू ग्रीस क्यों लगा रहा था?"

"क्योंकि जाम है तो खुलेगी।"

मैंने सोचा। ये बच्चा कभी-कभी वो बात कह देता है जो बड़े लोग किताबों में ढूँढते हैं और नहीं मिलती।

"सही बोल रहा है," मैंने कहा — और खुद उस धुरी पर झुक गया।

मेरे हाथ पहिये पर गए। ज़ंग उँगली में चुभी। मैंने एक बार साइकिल के पिछले पहिये से रिंच निकाली, फिर उस पहिये के बोल्ट खोले, फिर ज़ंग पर एक बूँद तेल डाला — जो मेरी साइकिल की चेन के लिए लाया था — और उसे धैर्य से अंदर भिगोने दिया।

औरत मुझे देख रही थी।

मैंने एक बार गर्दन उठाई। उनकी आँखें मुझ पर थीं। और उनके हाथ अब भी बक्से पर थे। पर उँगलियाँ ढीली थीं।

"तुम इसे ठीक कर दोगे?" उन्होंने पूछा।

"कोशिश करूँगा, अम्मा।"

"क्यों?"

मैं रुका।

"क्योंकि मेरी माँ भी आज एक टूटी कुर्सी पर बैठी हैं। और किसी ने उनके लिए भी एक दिन पहिया ठीक किया था।"

औरत ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही, और फिर — मुझे लगा — उन्होंने बक्से पर से एक हाथ उठाया और अपनी साड़ी के पल्लू से आँख पोंछी।

मेरी जेब में घंटी थी।

वो अब तक चुप थी। एक बार भी नहीं बोली थी। मुझे लगा शायद वो सलीम के सामने जैसे चुप हुई थी — वैसे ही अब भी चुप है। पर जब मैंने पहिये को पूरा घुमाया, और वो पहला हल्का चरचराकर घूमा, और टिंकू ने खुशी में चिल्लाकर कहा, "उस्ताद, घूम गया!" — तब घंटी ने ज़रा-सा बजकर इतना कहा —

"देख।"

और चुप हो गई।

पहिया घूम गया। पर कुर्सी चलने के लिए काफ़ी नहीं था। दूसरा पहिया भी मुड़ा था, पीठ का एक हिस्सा टूटा था, और उसका हैंडल भी ढीला था।

मैं उठा।

टिंकू को अपनी टूलकिट समेटने को कहा, पर वो अपनी हथेली को कमीज़ पर रगड़ रहा था — जिससे कमीज़ भी ग्रीस से काली होती जा रही थी।

"टिंकू, वो पीछे पानी का नल है। जाकर मुँह धो।"

"उस्ताद, ग्रीस पानी से नहीं जाती।"

"तो गली में आकर धो लेना — साबुन से। अभी जा।"

वो गया।

मैंने उस आदमी की तरफ़ मुड़कर देखा।

वो सीढ़ी की पहली पायदान पर बैठा था, सिर झुकाए, हाथों में कुछ मसल रहा था — शायद वही काग़ज़, शायद कुछ और। उसकी माँ अब भी बक्सा लिए बैठी थीं।

भीड़ धीरे-धीरे छँट रही थी।

फिर मुझे मीरा याद आई।

मैंने अपना सिर उठाया। अस्पताल की बेंच पर — नीचे वाले कमरे के बाहर — काजल और मीरा, दोनों बैठी थीं। मीरा अपना कैमरा गोद में रखे थी, काजल उसके कंधे पर हाथ रखे थी। दोनों की नज़रें यहीं थीं।

मीरा उठी। मेरे पास आई।

"अंकुश, काजल को माँ की दवा के बारे में फार्मेसी से पता चला — नई खेप अभी नहीं आई। डॉक्टर इसरानी के पास जाना होगा।"

मैंने सिर हिलाया।

"मैंने सुना," मैंने कहा। "मैं जा रहा हूँ।"

पर मैं मुड़ा नहीं।

मैं फिर उस बूढ़ी माँ की तरफ़ देख रहा था।

और फिर मेरी नज़र उस बक्से पर गई — उसके कोने पर, जहाँ ज़ंग ने कुछ गोल सा बना दिया था। एक आकार। एक वृत्त।

मेरा दिल एक कदम आगे बढ़ गया।

"अम्मा," मैंने कहा। आवाज़ मेरी अपनी थी, पर धीमी। "इस बक्से में कितने औज़ार हैं?"

उन्होंने ऊपर देखा।

"क्यों?"

"बस, पूछ रहा हूँ।"

उनकी नज़र मुझ पर थी।

"बारह," उन्होंने कहा। "बारह औज़ार हैं। और तेरहवीं चीज़।"

"तेरहवीं क्या?"

कुछ देर चुप।

"तेरहवीं चीज़ का नाम मैं नहीं जानती," उन्होंने कहा। "वो बक्से में नहीं है। वो मेरे पति के सीने में था। और वो उनके साथ अस्पताल से चला गया।"

मैं खड़ा रहा।

उस दिन जो टिंकू ने सड़क पर कहा था — याद आया। "उस्ताद, रुकिए, चाय वाले भैया हैं।" जाने क्यों वो याद आया। शायद इसलिए कि जब बात कुछ और हो रही होती है, तब छोटी बातें भी याद आ जाती हैं।

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