The Mysterious Bell – Chapter 373
उसके मोज़े में अब भी वो तीसरी चाबी थी। वो सीधा मेरे पास आकर खड़ा हो गया, चेहरा नहा-धोकर साफ़, बाल कंघी किए हुए और कपड़े इस्त्री जैसे। मुझे हँसी आ गई।
"ये क्या है?"
"उस्ताद, आज सभा है। मैंने सोचा साफ़ कपड़े पहन लूँ।"
"तो साफ़ कपड़ों में ही सच बोलेगा?"
उसने गंभीरता से कहा, "सच बोलने के लिए साफ़ कपड़े चाहिए। नहीं तो लगता है हम बहाना बना रहे हैं।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
आठ बजे मीरा आई। हाथ में कैमरा, कंधे पर फटा बैग, आँखों के नीचे काला घेरा। उसने मुझे देखा और बिना हेलो कहे बोली,
"राज़ा सलीम का कोई पता?"
"नहीं।"
"उसका नाम सूची में नहीं था, पर वो अंगूठी वाला है। अगर वो आज नहीं आया, तो हमारे पास रजिस्टर का सबूत अधूरा रहेगा।"
"वो आएगा।"
"कैसे पता?"
"घंटी ने कहा था, एक रजिस्टर, सौ अंगूठे। अगर सौ अंगूठों का दिन है, तो उँगली भी उसी दिन आएगी।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। वो बेंच के किनारे बैठ गई और अपना कैमरा चेक करने लगी।
आठ बजकर पंद्रह पर शबनम आपा आईं। एक हाथ में चाय की केतली, दूसरे में वही लोहे की चिमटी। उन्होंने केतली बेंच पर रखी और बिना पूछे हम सबको चाय देना शुरू कर दिया।
"आपा, इतनी सुबह?"
"बेटा, जिस गली का सच चल रहा हो, वहाँ चाय कोई नहीं पूछता। चाय आप ही आ जाती है।"
डॉक्टर इसरानी आठ बजकर पच्चीस पर आए। सफ़ेद कोट नहीं पहना था, इस बार साधारण कुर्ता और जैकेट। हाथ में वो पुराना मोटा रजिस्टर, जो कल उन्होंने दुकान के पीछे वाले कमरे में खोला था।
"सुशीला जी ने कहा है," उन्होंने मुझसे कहा, "वो नौ बजकर तीस मिनट पर आएँगी। आराम से आएँगी। काजल साथ होगी। और वो अपना काग़ज़ खुद माँगेंगी।"
"ठीक है, सर।"
"और अंकुश," डॉक्टर ने धीरे से कहा, "आज अगर कुछ भी गड़बड़ हुआ, तो मरीज़ को मेरे पास लाना। कोई भी मरीज़ हो। मैं किसी की जान दाँव पर नहीं लगाऊँगा।"
आठ बजकर चालीस पर दुबे अंकल आए। नीली शर्ट, हाथ में पुरानी कॉपी, कुर्सी नहीं लाए। उन्होंने सीधा पीपल की चबूतरी पर बैठकर अपनी हैसियत बता दी।
भोला भाई अपनी बीवी के साथ आए। वो बैसाखी के सहारे चल रही थीं, और भोला भाई उनका हाथ पकड़े हुए थे — ऐसे, जैसे किसी बहुत कीमती चीज़ को रास्ता दिखा रहे हों। सनी उनके पीछे था, हाथ में वो आधा फटा काग़ज़।
रमेश भाई और नसीम भाई साथ आए। दोनों के चेहरे पर वो शर्म थी जो झगड़े के अगले दिन होती है। कोई किसी से बात नहीं कर रहा था, पर दोनों चल रहे थे — साथ।
बूढ़े मरीज़ वाला काका नीम की छाया से निकलकर आया, हाथ में सटिया की पुड़िया।
किराने वाले बूढ़े काका के बेटे ने उन्हें उँगली पकड़कर चबूतरी तक पहुँचाया। चूड़ी वाली बाई अपने लाल धागों को उलझाती हुई आई और ज़मीन पर आँखें झुकाकर बैठ गई।
फिर आए सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। चारों एक कतार में आए, और सानिया के हाथ में लाल कवर वाली कॉपी थी।
आठ बजकर पचपन मिनट पर पीपल के नीचे पच्चीस से ज़्यादा लोग थे।
मीरा ने कैमरा तिपाई पर लगाया। लाल बत्ती जली।
और दुकान का शटर अभी भी बंद था।
मैंने शटर के सामने जाकर खड़े होकर देखा। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। न पोंछने की, न औज़ार रखने की। सिर्फ़ सन्नाटा।
घंटी बजी।
"वो अंदर है," उसने कहा।
"खोलेगा?"
"दस तक।"
"अगर दस बज गए?"
"तब भी वो तेरे पापा ही होंगे।"
नौ बजे शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा। नौ बजकर दस पर मीरा ने समय देखा। नौ बजकर पंद्रह पर दुबे अंकल ने कॉपी बंद कर दी और आँखें पीपल की तरफ़ कर लीं।
नौ बजकर पच्चीस पर काजल माँ की व्हीलचेयर लेकर आई।
माँ पतली लग रही थीं। उनका गुलाबी दुपट्टा सर से खिसका हुआ था, हाथ गोद में, आँखें सीधी दुकान के शटर पर।
मैं दौड़कर गया।
"माँ, आपको आराम—"
"चुप कर।" उनकी आवाज़ कमज़ोर थी, पर ज़ुबान वही। "मैं आराम करने नहीं आई। मैं आज अपना काग़ज़ माँगने आई हूँ। जिस आदमी ने मेरी दवा के लिए अंगूठा लगाया, वो मेरा पति है। उसका सच मेरे बिना पूरा नहीं होगा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"पापा अंदर हैं," मैंने कहा।
"पता है।"
नौ बजकर पचास।
पीपल के नीचे एक-एक करके सब चुप हो गए। बच्चे भी। गुड्डू ने कुछ कहना चाहा, सानिया ने उसकी कलाई पकड़ ली।
नौ बजकर पचपन पर मुझे घंटी सुनाई दी।
"अब।"
मैंने शटर की तरफ़ देखा।
और ठीक दस बजे गली के मुँह पर सफ़ेद गाड़ी का सामने वाला हिस्सा दिखा।
गाड़ी से पहले एक जूता उतरा। सफ़ेद, चमकता हुआ, आधा धूल से दूर। फिर दूसरा। फिर सफ़ेद कुर्ता। फिर मीठी आवाज़, जो दूर से भी सुनाई देती है।
चंद्रेश सक्सेना।
उनके पीछे मनोज था, हाथ में काग़ज़ों का बंडल सीने से चिपकाए। सक्सेना के हाथ में वो पीली फाइल थी, जिसके कोने सोने जैसे थे, और जੋह उन्होंने नहीं खोली, बल्कि सीधे हवा में उठा दी, जैसे कबूतर उड़ाने वाले हाथ में पिंजरा उठाते हैं।
वो पीपल के पास आकर रुके।
"बहुत भीड़ है," उन्होंने मीठी आवाज़ में कहा। "मुझे खुशी है। अच्छा है। सच बोलने के लिए गवाह चाहिए। और मैं सिर्फ़ गवाही नहीं, खाता भी लाया हूँ। कोई किसी से खफ़ा न हो। ये तो प्रक्रिया है, बेटा।"
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"अंकुश, तुम्हारे पापा?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"दस बज गए, बेटा। मुझे याद है मैंने कहा था — काग़ज़ से पहले सच। अब सच आया? या काग़ज़ खुद आकर अपना रास्ता ढूँढ ले?"
मीरा ने कुछ कहना चाहा। मैंने हाथ से रोका।
सक्सेना ने पीली फाइल हवा में थोड़ी ऊँची उठाई।
"इसमें एक ही पन्ना नहीं है," उन्होंने कहा। "तीन पन्ने हैं। एक पर ज़मीन, एक पर अंगूठा, और एक पर वो शर्त जिसने इस पूरे अस्पताल को बाँध रखा है। कोई आदमी बताए, तो सही। अंगूठे का मालिक कहाँ है?"
फिर थोड़ी देर रुककर, आवाज़ में वही मिठास डालकर, उन्होंने कहा,
"देखते हैं, अब कौन अंगूठा छिपाता है।"
उसी पल दुकान के अंदर से आवाज़ आई।
शटर उठने की आवाज़।
धातु चरचराई, और शटर आधा ऊपर गया। किसी ने अंदर से ज़ोर लगाया था। और शटर के नीचे से पहले चप्पलों की जोड़ी दिखी — वही पुरानी, जो हमेशा जोड़ी में रखी जाती है — फिर कमर तक धूल से भरा कुर्ता, फिर चश्मा, जो आज कान पर टेप से नहीं, बल्कि ठीक से टिका हुआ था।
पापा।
उनके हाथ में वो पुरानी फाइल थी। पीली नहीं, भूरी — किसी कपड़े में लिपटी, जिसके कोने से काग़ज़ का हिस्सा बाहर झाँक रहा था। और उनकी दूसरी हथेली, जिससे उन्होंने फाइल थामी हुई थी, साफ़ थी। ग्रीस नहीं, धूल नहीं, कोई पुराना दाग़ नहीं।
जैसे उन्होंने पूरी रात सिर्फ़ औज़ार नहीं पोंछे थे। अपनी हथेली भी साफ़ की थी।
वो शटर के नीचे झुककर बाहर आए, और पीपल की छाया में खड़े हो गए।
पूरी गली चुप हो गई।
सक्सेना की मुस्कान वहीं रुक गई, जैसे किसी ने उसे सुखा दिया हो।
पापा ने एक बार गली को देखा। माँ को देखा। फिर मुझे। फिर सक्सेना की तरफ़ देखा और बोले — दो शब्द, उनकी आदत के मुताबिक़ बहुत छोटे।
"मैं आ गया।"
मेरे अंदर कुछ टूटकर जुड़ गया।
और उसी पल, दुकान के अंधेरे में, पापा के पीछे, एक आदमी दिखा।
पहले सिर्फ़ सफ़ेद कुर्ते का किनारा। फिर सफ़ेद जूते, जिन पर गली की धूल नहीं, सिर्फ़ दुकान का अंधेरा चमक रहा था। फिर एक हाथ — उँगली पर वो काली अंगूठी।
और वो मुस्कुरा रहा था। धीरे से। बिना जल्दी के।
जैसे वो पिछले कई दिनों से इसी वक़्त का इंतज़ार कर रहा हो।
घंटी मेरी जेब में खुद बजी।
"देख," उसने कहा। "पीछे वाला आ गया।"
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