The Mysterious Bell366 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 366

7 min read November 5, 2026

उन्होंने मेरी तरफ़ मुड़कर देखा।

"उस आदमी की उँगली के नाखून के नीचे हमेशा स्याही भरी रहती थी। काली। जब वो रजिस्टर के पन्ने पलटता, नाखून से काग़ज़ पर लकीर बन जाती थी। हम सब मज़ाक करते थे — ऐ मुंशी जी, हिसाब तो ठीक है ना? हिसाब का क्या है, वो हमेशा मुस्कुरा कर टाल देता था।"

मेरे कानों में वो आवाज़ गूँजने लगी जो उस्ताद ने बनाई थी — एक मीठी, धीमी, टालने वाली आवाज़। मुझे ऐसे लगा जैसे मैंने वो आवाज़ कहीं सुनी है।

"और वो अब?" मैंने पूछा। "वो अब किसके लिए काम करता है?"

उस्ताद अली बक्श मुस्कुराए। पर वो मुस्कान नहीं थी। वो चेहरे पर आई हुई एक थकान थी जिसे लोग मुस्कान समझ लेते हैं।

"जिसके लिए काम करता है," उन्होंने कहा, "वही अस्पताल की ज़मीन खा रहा है।"

मैंने पीछे की तरफ़ देखा। अस्पताल की दीवार वहाँ से नहीं दिख रही थी, पर मुझे ऐसा लगा कि वो मेरे ठीक पीछे खड़ी है, और उसके अंदर पुराने पलंग पर माँ लेटी हैं।

"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने यह बात मुझे आज क्यों बताई?"

उन्होंने पेंसिल कान से निकाली और उसे हथेली में घुमाने लगे।

"क्योंकि एक बात है जो मैं पचास साल से सोच रहा हूँ और आज सुबह से मुझे नींद नहीं आ रही।" उन्होंने पेंसिल रोक दी। "मैंने तुझे कल यह कहा था कि घंटी मिरासी है, विरासत है, और मिरासी का हिसाब भारी होता है। आज मैं तुझे उस हिसाब की पहली लाइन बताता हूँ।"

उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर, एकदम धीमे से, जैसे गली को भी न सुनना चाहिए, कहा।

"मेरे भाई इलियास ने उस रात जो आख़िरी चीज़ कही थी, वो ये थी — भाई, अब नहीं। ये घंटी हमारी नहीं, हम इसके लिए छोटे हैं। और मैंने उसे टाल दिया। मैंने कहा — तू डर गया। और वो चला गया।"

उस्ताद ने नल की तरफ़ देखा।

"अब मैं तुझे देखता हूँ तो लगता है — शायद वो सही था। और शायद टालने वाला ही गलती करता है।

मैं कुछ कहने ही वाला था कि उन्होंने हाथ उठाया।

"रुक। आज तू मुझसे उम्र नहीं माँग रहा, तू वक़्त माँग रहा है। तो सुन।

उस रजिस्टर की बात मैंने आज सुबह सुनी। मेरा भांजा नए बाज़ार की गुमटी पर काम करता है। वहाँ चाय पीते दो आदमी बैठे थे। एक कह रहा था — बड़े साहब ने आदमी भेजा है, पता करो ये घंटी वाला क्या है, कहाँ से आया। दूसरा कह रहा था — साहब को घंटी से डर नहीं, साहब को घंटी के काग़ज़ से डर है। और तीसरा बोला — जो मुंशी साहब कल सभा में अपना रजिस्टर लेकर आ रहे हैं, उन्हें क्या कहेंगे?"

मेरी साँस रुक गई।

"उस्ताद, ये मुंशी कौन…"

"वही।" उस्ताद ने मेरी आँखों में देखा। "काली अंगूठी वाला। उसका नाम सलीम है।"

मैंने कहा, "पर सलीम तो…"

"हाँ," उस्ताद ने काटा। "सलीम अहमद बाईस साल पहले मर गया। ये सलीम उसी की मौत की तरह की नकल है।" उन्होंने पेंसिल घुमाया। "ये रज़ा सलीम है, उसी सलीम अहमद का रजिस्टर और अंगूठी — दोनों इसके पास हैं। और जिस रात सलीम अहमद की जान गई, उस रात काग़ज़ किसी के हाथ में गया — तो तुझे क्या लगता है, वहाँ बैठा एक मुंशी अपना रजिस्टर भूलकर आ गया होगा?"

मैं खामोश रहा।

"और अब सुन सबसे बड़ी बात," उस्ताद ने कहा। "ये रज़ा सलीम कल तेरी सभा में आएगा। खुद आएगा। और अपने साथ वो रजिस्टर लाएगा जिसमें हर मोहर का हिसाब है।"

मेरे हाथ से उस्ताद का चश्मा गिरने ही वाला था।

"क्यों?"

"क्योंकि रज़ा सलीम की उम्र अब पचास पार है, और जब आदमी की उम्र पचास को पार करती है तो वो अपने किए हुए की बोझ उठाना शुरू कर देता है।" उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। "और क्योंकि जिस रात सलीम मरा, उस रात के बाद से रज़ा सलीम एक भी रात चैन की नींद नहीं सोया। वो काँपता है बेटा। मुझसे ज़्यादा काँपता है।"

मैंने सिर झुका लिया।

"और यह भी जान ले," उस्ताद ने कहा, "जो रजिस्टर में हर मोहर का हिसाब हो, उसमें शर्तनामे की मोहर भी होगी। और उस मोहर के नीचे तेरे दादा जगदीश यादव का नाम भी होगा।"

मैंने अपने गले में लटकी चाबी को महसूस किया। ठंडी थी।

"उस्ताद," मैंने कहा, "मुझे एक बात का जवाब चाहिए। सीधा।"

"पूछ।"

"वो काग़ज़, जो असली शर्तनामा है — वो पापा के पास क्यों है? आप जानते हैं ना? आपको पता है।"

उस्ताद अली बक्श ने एक लंबी साँस ली। उन्होंने पेंसिल जेब में रखी, चश्मा पहना और गली की तरफ़ देखा जहाँ मेरी दुकान का आधा शटर अभी भी उठा हुआ था और पापा उसके नीचे बैठे, हाथ में कोई औज़ार लेकर, कुछ नहीं कर रहे थे।

"वो काग़ज़ उसके पास इसलिए है," उन्होंने कहा, "क्योंकि उस रात सलीम ने वो काग़ज़ शंकर को दिया था। बाईस साल पहले। और शंकर लौटकर उसे सकीना बी के डिब्बे में रख आया था, पर तब तक रणवीर भारद्वाज वहाँ से वो काग़ज़ उठा चुका था। तो तेरे पापा उस रात डरकर नहीं गए, बेटा — उन्होंने पहले वो काग़ज़ लिया था। और जब देखा कि काग़ज़ गायब है, तो दूसरा रास्ता सोचा।"

"क्या रास्ता?"

"ये कि असली काग़ज़ का एक टुकड़ा किसी के पास रहेगा। और वो उनके पास रहेगा।"

मैंने कहा, "तो जो अंगूठा उन्होंने लगाया था, वो किस काग़ज़ पर लगाया था?"

उस्ताद ने जवाब में कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराए।

"अंकुश," उन्होंने कहा, "जिस दिन तू अपने पापा से यह सवाल पूछेगा और वो उसका जवाब देगा — उस दिन तेरी घंटी को कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। घंटी सिर्फ़ वहाँ बोलती है जहाँ इंसान चुप हो जाता है।"

मैं वहीं खड़ा रह गया।

और तभी मेरी जेब से घंटी ने बहुत धीमे से कुछ कहा — इतना धीमे से जैसे मेरे ही कान के अंदर कोई फुसफुसा रहा हो।

"सलीम का रजिस्टर, तेरे दादा का नाम।"

मैंने घंटी को जेब के अंदर से दबा दिया और उस्ताद की तरफ़ देखा।

"उस्ताद," मैंने कहा, "कल दस बजे की सभा में जो भी आएगा, जो भी बोलेगा, वो सच बोलेगा। ये मैं व्यवस्था कर दूँगा।"

उस्ताद ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ भारी था।

"तू एक बात समझ ले," उन्होंने कहा। "सच बोलना सबसे बड़ी ताक़त है, ये तुझे सब कहेंगे। और ये भी कि सच बोलना सबसे आसान काम है। दोनों ग़लत है।"

"फिर क्या सच है?"

"सच है — सच बोलने के बाद जो रिश्ता बचता है, वो सबसे बड़ा काम है।" उन्होंने अपना हाथ खींच लिया। "तू अपने पापा से बात कर। मैं चलता हूँ। कल सुबह दस बजे पीपल के नीचे।"

"उस्ताद।"

वो रुके।

"एक चीज़ और माँगनी है। आपके पास माँ की सिलाई पेटी की चाबी है। आपने कहा था — वो चाबी अकेले नहीं खुलती। मैं क्या करूँ?"

उस्ताद ने पलटकर देखा। उनके चश्मे के पीछे आँखें चमक रही थीं।

"तू सही सवाल पूछ रहा है बेटा," उन्होंने कहा। "जब तक तू सही सवाल पूछता रहेगा, मदद पीछे नहीं रहेगी। और उस पेटी की चाबी वो नहीं, वो इलियास देगा जो मेरे भाई का घर है। जल्दी कर।"

वो गली के मोड़ की तरफ़ चले गए।

मैंने उनके जाने के बाद एक बार पीछे देखा।

दुकान के आधे उठे शटर के नीचे पापा बैठे थे। उनके हाथ में पेचकस था और वो उसे उल्टा-सीधा घुमा रहे थे। भीड़ उनके आस-पास खड़ी थी, पर कोई पास नहीं आ रहा था, जैसे वो आदमी अभी किसी बात की सज़ा काट रहा हो और सज़ा में तन्हाई ही हो।

और पीछे, अस्पताल के पीछे वाले प्लॉट से, मशीन की आवाज़ फिर आई।

इस बार बहुत धीमी।

इतनी धीमी कि लगा जैसे कोई मशीन नहीं, कोई जानवर साँस ले रहा हो — और वो साँस बताने आई हो कि वो रुका नहीं है, बस इंतज़ार कर रहा है।

मैंने जेब से घंटी निकाली और उसे एक बार बजाया।

घंटी ने एक ही बात कही।

"कल दस बजे, एक रजिस्टर, सौ अंगूठे।"

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