The Mysterious Bell349 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 349

7 min read November 5, 2026

"वो उसी गली में रहती है," डॉक्टर ने कहा। "अस्पताल से पाँच मिनट। दुकान आज भी उसके नाम पर है। शटर बरसों से गिरा रहता है।"

"तो फिर मैं कल सुबह जाकर…"

"अंकुश।" उन्होंने मेरी बात काटी। आवाज़ तेज़ नहीं थी, पर ऐसी थी कि मैं रुक गया। "वो काग़ज़ किसी को दिखाती नहीं।"

"क्यों?"

डॉक्टर ने लालटेन मेज़ पर रखी और अपने दोनों हाथ उस पर टिका दिए। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, हल्की सी, जैसे पुराने पंखे की तार।

"क्योंकि सलीम की मौत के बाद उसने कसम खाई थी," उन्होंने कहा। "उस रात, उसके जाने के बाद, वो अस्पताल के आँगन में बैठी थी। सुबह तक। किसी ने उसे पानी नहीं पूछा, क्योंकि सब अपनी-अपनी चीज़ों में लगे थे। और मैं…" उन्होंने साँस ली, "मैं उससे मिलने नहीं गया। मैंने सोचा, अभी नहीं, बाद में। बाद में कभी नहीं आया।"

"और कसम?"

"उसने कहा था — अब इस ज़मीन का नाम नहीं लूँगी। न काग़ज़ का, न उस ज़मीन का, न उस अस्पताल का। जिस ज़मीन पर मेरे सलीम ने अपनी आख़िरी साँस ली, उसका नाम मैं कभी नहीं लूँगी।"

कमरे में चुप्पी ऐसी बैठी जैसे कोई चीज़ फर्श पर गिरकर रुक गई हो।

"तो वो शर्तनामा," मैंने धीरे से कहा, "वहाँ पड़ा है। बंद दुकान के पीछे, टिन के बक्से में। बरसों से।"

"हाँ," डॉक्टर ने कहा।

"और वो उसे निकालेगी नहीं, क्योंकि उसे निकालने का मतलब है उस ज़मीन का नाम लेना।"

"हाँ।"

मैंने सामने रखी लोहे की कुर्सी खींची और बैठ गया। मेरे घुटने पर फटी जींस थी और उस पर धूल लग गई थी। मैंने धूल झाड़ी, फिर हाथ रोक दिया, क्योंकि उस वक़्त धूल झाड़ना बेवकूफ़ी लग रहा था।

"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"

"पूछो।"

"आपको क्या लगता है — काग़ज़ ज़रूरी है, या उस औरत की कसम?"

उन्होंने बहुत देर तक सोचा। इतनी देर कि मुझे लगा वो जवाब नहीं देंगे।

"बेटा," उन्होंने फिर कहा, "काग़ज़ वो चीज़ है जो अदालत में काम आती है। और कसम वो चीज़ है जो इंसान के अंदर काम आती है। आज तक मैंने जितने झगड़े देखे, वो काग़ज़ से जीते या हारे, पर सुलझे कसम से।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हें दोनों चाहिए। पर पहले वो चाहिए जो उसने बरसों पहले अपने अंदर बंद कर लिया है।"

मैंने सिर हिलाया। मेरे अंदर एक लाइन बन रही थी, टेढ़ी, पर साफ़। सकीना बी को काग़ज़ नहीं चाहिए। उसे उस काग़ज़ की वजह वापस चाहिए। और वजह वो नहीं जो मैं ले जाऊँगा। वजह वो है जो सलीम मियाँ के जाने के बाद इस अस्पताल में रोज़ होती है — एक औरत जो अपनी बहू के इलाज के लिए यहाँ आती है और उसे कोई पैसा नहीं पूछता।

मैंने जेब में घंटी हिलाई। इस बार बिना बजाए।

"डॉक्टर साहब, कल सुबह दस बजे सभा है। आप आएँगे?"

"मैं तो वहीं रहता हूँ," उन्होंने कहा। "मुझे बुलाने की ज़रूरत नहीं, याद रखने की ज़रूरत है।"

मैं उठा। दरवाज़े तक गया, फिर रुका और पलटा।

"आपने कहा था कि आप सिर्फ़ इंतज़ार कर रहे थे कि कोई पूछे।"

"हाँ।"

"तो मैं पूछ रहा हूँ, आपने मुझे इस कमरे में क्यों लाया?"

उन्होंने रजिस्टर की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। और उनका चेहरा पहली बार थोड़ा हल्का हुआ, जैसे बरसों की एक कसी हुई गाँठ कुछ ढीली हुई हो।

"क्योंकि तुम वो पहले आदमी हो," उन्होंने कहा, "जिसने इस अस्पताल में किसी चीज़ के लिए पैसा नहीं दिया, न काग़ज़ माँगा। सिर्फ़ पूछा। और मैंने सोचा, जो पूछता है, वो शायद सुन भी सकेगा।"

बाहर निकलकर मैंने दरवाज़ा बंद किया। गलियारा अब भी अंधेरा था, पर मुझे लगा कि अंधेरा थोड़ा कम है — शायद इसलिए कि आँखें अंधेरे की आदी हो गई थीं, या शायद इसलिए कि अब अंदर उतना डर नहीं था।

मैं नीचे वाले कमरे की तरफ़ चला। रास्ते में वही दो लोग बैठे थे। औरत ने मुझे देखा और पूछा, "बेटा, कल अस्पताल बंद नहीं होगा ना?"

मैं रुक गया। उसके हाथ में वो पुरानी पर्ची थी, जो उसने शायद तीन बार मोड़ी थी और चार बार सीधी की थी।

"दीदी," मैंने कहा, "जब तक आप जैसे लोग यहाँ आते हैं, कोई अस्पताल बंद नहीं कर सकता।"

वो हँसी, पर उसकी हँसी में भी सवाल था। वो जानती थी कि मैं चौबीस साल का एक लड़का हूँ जिसकी अपनी दुकान पर सील का नोटिस लगा है। पर फिर भी उसने सिर हिलाया और पर्ची सीधी कर ली।

नीचे वाले कमरे में काजल पलंग के पास कुर्सी पर बैठी थी और उसकी नर्सिंग की किताब उसकी गोद में खुली थी, पर आँखें किताब पर नहीं थीं। माँ सो रही थीं। कमरे में सिर्फ़ उनकी साँस की आवाज़ थी — थोड़ी धीमी, थोड़ी खींची हुई, पर साफ़।

मैंने दरवाज़े के पास खड़े होकर कहा, "काजल, सकीना बी को जानती है?"

उसने किताब बंद की। "कौन सकीना बी?"

"दवा की दुकान वाली। अस्पताल से पाँच मिनट की दूरी पर।"

काजल ने कुछ सोचा। "वो बंद दुकान? मैंने एक बार देखा था। शटर के नीचे से एक बिल्ली निकली थी। और अंदर अंधेरा था, ऐसा अंधेरा जो अंदर नहीं, बाहर लगता है।" वो थोड़ी देर रुकी। "क्यों?"

"कल सुबह मुझे वहाँ जाना है। सभा से पहले।"

"सभा नौ बजे है? मुझे लगा दस बजे है।"

"दस बजे है।" मैंने कहा। "पर मुझे नौ बजे वहाँ होना है।"

काजल ने मुझे घूरा। वो घूरने में उस्ताद है — माँ से मिली है ये चीज़।

"अंकुश," उसने कहा, "तू अकेला जा रहा है ना?"

"मैंने किसी को नहीं कहा।"

"तो मैं कह रही हूँ। अकेला मत जा।" उसने किताब अपनी छाती से लगा ली। "तुझे पता है, जिस दिन पापा भारद्वाज भवन से रोते हुए निकले थे, मैंने सोचा था कि मैं बड़ी हो जाऊँगी तो सब ठीक कर दूँगी। फिर मैं बड़ी हो गई और मुझे समझ आया कि सब ठीक नहीं होता। पर एक चीज़ होती है — अकेले नहीं होता।"

मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा, जैसे पापा आज मेरे कंधे पर रखकर गए थे। वो हाथ मुझे अब तक महसूस हो रहा था, जैसे वो मेरे कंधे से हटा ही न हो।

"ठीक है," मैंने कहा। "मैं टिंकू को साथ ले जाऊँगा।"

"टिंकू? वो तेरह साल का है!"

"वो तेरह साल का है, इसलिए उसे कोई कुछ नहीं कहेगा। बड़े आदमी देखकर लोग पूछते हैं — क्या चाहिए। बच्चा देखकर नहीं पूछते। और इस वक़्त हमें कोई पूछे नहीं, यही चाहिए।"

काजल ने एक लंबी साँस ली, फिर सिर हिलाया। "ठीक है। पर परची मेरे पास रहेगी। मैं सुबह नौ बजे फार्मेसी पहुँच जाऊँगी। दस बजे से पहले। उसके बाद पीपल पर आ जाऊँगी।"

"माँ का ध्यान रखना।"

"तू अपना रख," उसने कहा। "मेरे पास ध्यान रखने की पूरी ट्रेनिंग है। तेरे पास सिर्फ़ साइकिल है।"

मैं बाहर आया। अस्पताल का आँगन खाली था। पीली दीवार पर चढ़ी दरार अब भी वहीं थी, जो मैंने पिछले दिन देखी थी — पोस्टर के किनारे से नीचे जाती हुई, जिस पर रणवीर भारद्वाज हाथ जोड़े खड़े थे और नीचे लिखा था कि नई शुरुआत, नए सपने। मैंने दरार को छुआ। पलस्तर मेरे हाथ में आया — सूखा, बुरादा जैसा।

मैं अस्पताल के गेट की तरफ़ बढ़ा। और तभी मेरी जेब से एक आवाज़ आई।

टिन।

बस एक। धीमी, जैसे कोई बहुत दूर से उँगली उठाकर इशारा कर रहा हो।

मैं रुक गया और घंटी जेब से निकाली। पीतल अब गर्म था।

"क्या?" मैंने फुसफुसाया।

"दुकान से आ रही है," घंटी ने कहा। "आवाज़ सिर्फ़ सुनने से नहीं मिलेगी। जाना पड़ेगा।"

"कल सुबह जाऊँगा।"

कुछ पल चुप्पी रही। फिर वही रूखी आवाज़, थोड़ी धीमी।

"सुबह देर हो सकती है।"

मैंने आसमान की तरफ़ देखा। तारे साफ़ थे, जैसे किसी ने उन्हें पोंछकर रखा हो। मुझे लगा कि अगर आज रात मैं नहीं गया, तो सुबह दस बजे पीपल के नीचे मैं वही लड़का रहूँगा जो काग़ज़ों के सामने खड़ा होकर बोलता है, पर कुछ लेकर नहीं जाता। और मुझे कुछ लेकर जाना था।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho