The Mysterious Bell – Chapter 348
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आप मुझे रिकॉर्ड के कमरे में ले जा रहे हैं या मेरा रिकॉर्ड बंद करने?"
वो हँसे, पर हँसी में वो चीज़ नहीं थी जो लोग हँसी कहते हैं।
"मेरे यहाँ रिकॉर्ड पुराने होते हैं," उन्होंने कहा। "मरीज़ नए आते हैं, काग़ज़ पुराने हो जाते हैं। और काग़ज़ को किसी ने नहीं देखा तो काग़ज़ भी बूढ़ा हो जाता है।"
उन्होंने एक लोहे के दरवाज़े पर चाबी घुमाई। दरवाज़ा खुला तो अंदर से एक गंध निकली — सीलन, गीला काग़ज़, और उसके ऊपर थोड़ी-सी दवा की गंध, जैसे कोई बंद कमरे में सालों तक साँस ले रहा हो।
लालटेन की रोशनी अंदर पड़ी तो मैंने देखा — तीन लोहे के रैक, ऊपर से नीचे तक, और उन पर फाइलों के ढेर। कुछ फाइलों की जिल्द गल चुकी थी, कुछ के कोने मुड़े हुए थे, कुछ पर पानी की लकीरें ऐसे चढ़ी थीं जैसे कोई नदी उन पर से गुज़री हो और लौटकर न आई हो।
"ये सब क्या है?" मैंने पूछा।
"जो कोई नहीं देखता," डॉक्टर ने कहा। "मरीज़ों के परचे, दवाओं का हिसाब, ज़मीन के काग़ज़, और वो बातें जो किसी ने काग़ज़ पर लिख दीं और फिर भूल गए।"
उन्होंने लालटेन मेरे हाथ में थमाई और खुद एक रैक के सामने खड़े हो गए। उनकी उँगलियाँ फाइलों पर फिसलने लगीं, बिना जल्दी के, जैसे कोई हिसाब बराबर कर रहा हो।
"अंकुश," उन्होंने बिना मेरी तरफ़ देखे कहा, "जब मैं यहाँ आया था, तब मेरी उम्र पैंतीस के आसपास रही होगी। ये अस्पताल पहले से था। लोग कहते थे कि ये ज़मीन दान में मिली है। गली के लोगों ने मिलकर दी है। किसी ने पैसे दिए, किसी ने ज़मीन की पट्टी, किसी ने सिर्फ़ मेहनत।"
"और वो दान का काग़ज़ आपको दिखाया गया?" मैंने पूछा।
उन्होंने सिर हिलाया। "कभी नहीं। मैंने पूछा भी। दो बार पूछा। पहली बार मुझे कहा गया — काग़ज़ किसी भरोसेमंद आदमी के पास है। दूसरी बार कहा गया — तुम डॉक्टर हो, काग़ज़ देखकर क्या करोगे।"
वो रुके और मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने उस वक़्त चुप रहना ठीक समझा। मुझे लगा काम बड़ा है, काग़ज़ छोटा है। और मैं मरीज़ देखने में लग गया। पच्चीस साल निकल गए।" उन्होंने अपना टेप वाला चश्मा ठीक किया। "आज तुम्हारी माँ की खाँसी सुनकर लगा कि काग़ज़ छोटा नहीं होता। काग़ज़ वो चीज़ है जो बाद में सबसे बड़ी निकलती है।"
मैंने लालटेन ऊँची की। रैक के बीच में एक मोटा रजिस्टर पड़ा था — लाल किनारे वाला, ऊपर धूल की मोटी परत, जैसे उस पर सालों से कोई हाथ नहीं फिरा हो।
"ये?" मैंने कहा।
डॉक्टर ने देखा और उनका चेहरा थोड़ा बदला।
"ये खाता है," उन्होंने कहा। "पुराना खाता। इसमें अस्पताल का हिसाब लिखा जाता था — किसने क्या दिया, किसने क्या लिया, किसका क्या बाकी रहा।"
मैंने उसे उठाया। भारी था। धूल से छींक आने को थी, मैंने मुँह दबाया और उसे पास की मेज़ पर रखा। पन्ने पलटने लगे — पीले, नरम, कुछ ऐसे कि हाथ लगाओ तो लगे कि अभी टूट जाएँगे। हर पन्ने पर नीली स्याही में लिखी लकीरें, कुछ जगह स्याही फैली हुई, कुछ जगह पानी की बूँद ने अक्षर धो दिए थे।
फिर मेरा हाथ रुक गया।
बीच में एक पन्ना कटा हुआ था। चाकू से, सीधी लकीर में, ऊपर से नीचे तक। किनारा ऐसा साफ़ था जैसे किसी ने जल्दी में काटा हो और फिर भूल गया हो कि काट दिया है। और उसी कटे पन्ने के नीचे, अगली लाइन में, एक नाम लिखा था।
मैंने पढ़ा। मेरी आवाज़ धीमी निकली।
"सलीम अहमद।"
डॉक्टर इसरानी ने लालटेन की रोशनी में वो नाम देखा और उनका हाथ मेज़ के किनारे पर टिक गया।
कुछ पल कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ पानी की बूँद टपकती रही। फिर उन्होंने अपने टेप वाले चश्मे को उतारा, दोनों हाथों से अपना चेहरा रगड़ा और उनकी आवाज़ ऐसी निकली जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कुंडी खुली हो।
"सलीम मियाँ," उन्होंने कहा। "अस्पताल का कंपाउंडर।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भीगी हुई थीं, और मैंने पहली बार देखा कि इस बूढ़े आदमी की आँखें इतनी साफ़ हैं, जैसे बरसों की धूल धुल गई हो।
"कंपाउंडर?" मैंने कहा।
"मेरे साथ काम करता था," डॉक्टर ने कहा। "दवा की शीशियाँ रखता था, मरीज़ों की पर्ची संभालता था, मुझसे भी ज़्यादा उनकी तकलीफ़ समझता था। गली के बच्चे उसे चाचा कहते थे। और…" उन्होंने साँस ली, "और सकीना बी उसकी बीवी है।"
कमरे में हवा कम लगने लगी। मैंने पीछे जाकर दरवाज़ा थोड़ा खुला किया। बाहर से रात की आवाज़ आई — कहीं दूर कोई टेम्पो, कुत्ते का एक बार भौंकना, और गुमटी के बर्तन की आवाज़, जैसे गली अभी भी सोई नहीं है।
"इसी रात उसकी मौत हुई थी?" मैंने पूछा।
डॉक्टर ने सिर हिलाया। "उसी रात। और मैं वो रात कभी नहीं भूला।" उन्होंने उँगली से कटे पन्ने की जगह छुई, जैसे उसे सहला रहे हों। "मैं उस वक़्त नीचे था। सीढ़ियों के पास। उसने मुझे आवाज़ दी — डॉक्टर साहब, एक मिनट। मैंने कहा, अभी आया। और फिर…"
वो रुके। उनका गला रुँध गया, पर उन्होंने खुद को संभाला, क्योंकि वो इस शहर के उस पुराने डॉक्टर थे जो रोते हुए भी सीधे खड़े रहते हैं।
"और फिर मैं गया ही नहीं," उन्होंने कहा। "एक मरीज़ आया था। मैं उसके पास बैठ गया। जब वापस आया तो खबर आ चुकी थी।"
मैंने रजिस्टर के उस पन्ने की तरफ़ देखा। कटे पन्ने के नीचे सलीम अहमद का नाम था, और उसके आगे सिर्फ़ दो शब्द — "कोई बाकी नहीं।"
"ये किसने काटा?" मैंने पूछा।
"यही तो," डॉक्टर ने धीरे से कहा। "मैंने भी यही पूछा था, जब मैंने पहली बार ये खाता खोला। बीस साल पहले। उस वक़्त भी ये पन्ना ऐसा ही कटा था। किसी ने मुझे कुछ नहीं बताया। मैंने सोचा, हिसाब का पन्ना होगा, गलत लिखा होगा, किसी ने फाड़ दिया।"
"पर ये हिसाब का पन्ना नहीं है," मैंने कहा।
"नहीं है," उन्होंने कहा। "जिस पन्ने पर ज़मीन दान में मिलने की बात होती, वही पन्ना है। और उसे चाकू से काटकर जो लाइन बची, वो सिर्फ़ एक नाम बची — जिसने सबसे पहले अंगूठे लगाए थे।"
मैंने पीछे हटकर उस पन्ने को पूरा देखा। काटने वाले ने पूरी लाइन काट दी थी, पर नाम नहीं छेड़ा। जैसे किसी ने सोचा हो — नाम रहने दो, नाम से डर नहीं लगता। लोग नाम पढ़ लेंगे, पर शर्त नहीं पढ़ पाएँगे।
मैंने जेब में हाथ डाला और पीतल की घंटी निकाली। मेरा हाथ काँप नहीं रहा था, पर अंदर से लग रहा था जैसे कोई चीज़ मुझे धीरे-धीरे धकेल रही हो। मैंने घंटी बजाई।
टिन… टिन…
आवाज़ उस सीलन भरे कमरे में अजीब लगी। डॉक्टर चौंककर मेरी तरफ़ देखने लगे, पर मैंने उन्हें रोका नहीं।
और फिर वो आवाज़ आई। धीमी, रूखी, किसी टूटी मेज़ के नीचे से आती हुई।
"जो पन्ना कटा है… उसकी आवाज़ अभी दवा की दुकान से आ रही है।"
मैं चुप खड़ा रहा। डॉक्टर ने मेरी तरफ़ देखा, फिर घंटी की तरफ़।
"तुमने कुछ कहा?" उन्होंने पूछा।
"मैंने नहीं," मैंने कहा।
वो कुछ देर मुझे देखते रहे। फिर उन्होंने कुछ नहीं पूछा। शायद साठ के पार पहुँचकर आदमी ये सीख जाता है कि हर चीज़ का जवाब नहीं माँगना चाहिए। कभी-कभी सिर्फ़ ये जानना काफ़ी होता है कि जवाब मौजूद है।
मैंने घंटी जेब में रखी और पूछा, "डॉक्टर साहब, सकीना बी अब कहाँ रहती हैं?"
वो कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने लालटेन उठाई और दीवार पर पड़ी रोशनी को सरकाया। रोशनी एक तस्वीर पर पड़ी — बिना तारीख़ वाली, पुरानी, जिसमें एक औरत हँस रही थी। वो उनकी बीवी थीं, मैं जानता था। अस्पताल की दीवार पर जो पीला रंग है, वो उन्हीं की पसंद का था — काजल ने बताया था।
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