The Mysterious Bell – Chapter 328
“अच्छा सुनो,” उसने कहा। “मेरे पास वक़्त नहीं है। एक घंटा। दो बजे तक तय कर लो। या भंडार अभी खोलो — लेकिन तब सबके सामने होगा, क्योंकि मैं खुद यहाँ खड़ा रहूँगा। या ताला लग जाएगा — और फिर एक काग़ज़ भी अंदर से नहीं निकलेगा। आपको सील तोड़ने का इल्ज़ाम मिल जाएगा, और वो इल्ज़ाम बत्तीस साल का झगड़ा नहीं होगा, मुकदमा होगा।”
मैंने मनोज की तरफ़ देखा।
“एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“आपको इल्ज़ाम से क्या लेना? आप तो सिर्फ़ सर्वे करने आए थे।”
वो एक पल रुका।
“नौकरी है,” उसने कहा। “नौकरी में हर आदमी अपनी बात नहीं रखता।”
“फिर आपको क्या पता कि सील तोड़ने का इल्ज़ाम किस पर लगेगा? आपने तो अभी से बता दिया।”
मनोज ने कुछ नहीं कहा।
और मुझे लगा — ये आदमी भी अंदर से डरा हुआ है। बस इसे धमकी देने की तनख्वाह मिलती है।
“ठीक है,” मैंने कहा। “एक घंटा।”
“अंकुश!” बंसी बाबा ने कहा।
“एक घंटा,” मैंने दोहराया, और उनकी तरफ़ देखकर धीरे से सिर हिलाया। “हमें बस इतना ही चाहिए।”
मनोज ने ताला उठाया, जेब में रखा, और काग़ज़ मोड़कर अपनी बगल में दबाया।
“एक घंटा,” उसने कहा। “और मैं गली के मुँह पर खड़ा रहूँगा। तुम लोग मिल-जुलकर तय कर लो।”
वो गाड़ी की तरफ़ बढ़ा।
फिर रुका।
“और अंकुश,” उसने बिना मुड़े कहा, “साहब ने यह भी कहा था कि तुम्हें बताना — तुम्हारी दुकान के काग़ज़ अभी भी उनके पास हैं। इसलिए ये ताले-चाबी के खेल में मत उलझो।”
वो चला गया।
जीप का फटा मफ़लर बजा, और गली की धूल उड़ी।
दुकान में सन्नाटा था।
शबनम आपा ने सबसे पहले तोड़ा।
“एक घंटा,” उन्होंने कहा, और आवाज़ में गुस्सा था। “एक घंटे में चार किलोमीटर की गली को कैसे जगाऊँगी?”
“आपा,” मैंने कहा, “आप कोई तमाशा नहीं कर रही हैं। आप सिर्फ़ चाय बना रही हैं। और आज आपकी गुमटी पर चाय मुफ़्त है।”
“मुफ़्त?”
“जी। जो भी आए, उसे एक कप चाय मिले। और साथ में एक बात — पाँच बजे नहीं, अब दो बजे। भंडार खुल रहा है।”
आपा की आँखें चमकीं।
“ये हो सकता है,” उन्होंने कहा। “चाय के साथ खबर अच्छी जाती है।” वो थाली उठाकर बाहर निकल गईं, और मैंने उनके जाने के बाद सुना — गली में उनकी आवाज़ गूँज रही थी, “अरे सुनते हो! सब गुमटी पर आओ! चाय मेरी, खबर अंकुश की!”
मैं हँसा। कभी-कभी गली की सबसे तेज़ ज़ुबान ही सबसे तेज़ काम करती है।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
“तू क्या करेगा?” मैंने पूछा।
“मैं क्या करूँ, भैया?”
“तू सीधा स्कूल जा। रामलाल चौकीदार के पास। उसे बता कि भंडार आज खुल रहा है, दो बजे।”
“रामलाल क्यों?”
“क्योंकि वो स्कूल के गेट पर बैठता है,” मैंने कहा, “और स्कूल के गेट से देखने पर गली का आख़िरी छोर दिखता है। मुझे उस छोर पर भी किसी की आँख चाहिए।”
टिंकू ने सिर हिलाया और भागा।
“और टिंकू!”
वो रुका।
“मोज़ा संभालकर रखना।”
वो हँसा और भाग गया। मुझे पता था वो मोज़े में क्या है, और मुझे पता था कि वो उसे कहीं नहीं गिराएगा। कभी-कभी सबसे छोटा लड़का सबसे बड़ी चीज़ संभालता है, और उसे पता भी नहीं होता।
मैं उस्ताद की तरफ़ मुड़ा।
“उस्ताद,” मैंने कहा। “भंडार का ताला दो चाबियों से खुलेगा। पर एक बात बताइए — अंदर क्या है?”
उस्ताद ने पीछे वाले कमरे की तरफ़ देखा।
“एक रजिस्टर,” उन्होंने कहा। “और उसके नीचे एक दुपट्टा। दोनों बत्तीस साल से वैसे ही हैं जैसे उस रात थे।”
“और तीसरी चीज़?”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
“तुम्हें कैसे पता कि तीसरी चीज़ भी है?”
“क्योंकि आपकी आवाज़ में एक रुकावट थी,” मैंने कहा। “आपने दो चीज़ें गिनीं, और फिर चुप हो गए। आदमी जब दो चीज़ें गिनकर चुप हो जाए, तो तीसरी ज़्यादा भारी होती है।”
उस्ताद मुस्कुराए। पहली बार आज।
“कभी-कभी तू मुझसे ज़्यादा बूढ़ा लगता है, अंकुश,” उन्होंने कहा। “तीसरी चीज़ एक लिफ़ाफ़ा है। वो लिफ़ाफ़ा जिसमें वो आदमी का नाम है, जिसने उस रात दोनों के कान में बात डाली थी।”
“और वो नाम…” मैंने शुरू किया।
“वो नाम,” उस्ताद ने कहा, “आज पहली बार खुलेगा। और मुझे डर है कि उस नाम को सुनकर गली खुश नहीं होगी।”
मैंने लंबी साँस ली।
“डर अब बाद में,” मैंने कहा। “पहले ताला।”
तभी बंसी बाबा ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
“अंकुश,” उन्होंने कहा। “मेरी चाबी दे।”
“अभी?”
“अभी। मैं इसे अपनी जेब में नहीं रखूँगा। मैं इसे उस्ताद के हवाले करूँगा। और उस्ताद भंडार खोलते वक़्त मुझे देगा।”
हाफ़िज़ बाबा ने भी हाथ बढ़ाया।
“मेरी भी।”
मैंने दोनों चाबियाँ उस्ताद के हाथ में रख दीं।
उस्ताद ने उन्हें अपनी मुट्ठी में बंद किया, और मुट्ठी हल्की काँप रही थी।
“पचास साल,” उन्होंने कहा। “पचास साल बाद मेरे हाथ में दो चाबियाँ हैं।”
“उस्ताद,” मैंने धीरे से कहा। “एक बात।”
“कह।”
“इलियास को खबर हो गई?”
उस्ताद ने सिर हिलाया।
“मनोज गया था ना?” मैंने कहा। “उसके ज़रिए आपने संदेश भेजा था।”
“हाँ,” उस्ताद ने कहा। “पर मनोज अब उसका संदेश लेकर नहीं जाएगा। अब मनोज को अपना काम करना है।”
“तो इलियास को कौन बताएगा?”
उस्ताद ने दुकान के बाहर देखा। गली में शबनम आपा की आवाज़ आ रही थी — “आओ, आओ, चाय पियो!” — और कुछ और आवाज़ें जुड़ गई थीं। लोग इकट्ठे हो रहे थे।
“इलियास को कोई नहीं बताएगा,” उस्ताद ने कहा। “इलियास खुद आएगा। क्योंकि उसके पास भी वो चाबी है, और वो भी बत्तीस साल से घूम रहा है। जो आदमी बत्तीस साल से चाबी जेब में रखे घूम रहा हो, वो सिर्फ़ दरवाज़े का इंतज़ार नहीं करता। वो इंतज़ार करता है कि कोई उसकी जेब से वो चाबी माँगे।”
मैंने सिर हिलाया।
“तो अब मैं चलूँ?”
“कहाँ?”
“अस्पताल,” मैंने कहा। “माँ को देखना है, और डॉक्टर इसरानी से उनके हाथ की परची भी लेनी है।”
उस्ताद ने मेरा कंधा पकड़ा।
“तू चलेगा तो गली कौन संभालेगा?”
“आप,” मैंने कहा। “और शबनम आपा। और टिंकू। और मीरा।”
“मीरा कहाँ है?”
मैं रुका।
यही तो मेरे दिल में एक सुआ-सा चुभ रहा था। सुबह से मीरा ने मुझे फ़ोन नहीं किया था। और मीरा वो लड़की है जो सुबह उठकर पहली चीज़ यही करती है कि मुझे तीन मैसेज करे और कोई एक नई खबर बताए।
“मैं उसे ढूँढता हूँ,” मैंने कहा।
मैंने फ़ोन निकाला। दो रिंग गईं, फिर आवाज़ आई — “भैया, मीरा दीदी गुमटी पर थीं। वो अपना बैग लेकर स्कूल के पीछे वाली गली की तरफ़ गई थीं।”
“कब?”
“आधे घंटे पहले।”
मैंने फ़ोन रखा।
“उस्ताद, मैं ज़रा…”
“जा,” उस्ताद ने कहा। “पर दो बजे से पहले लौट।”
“लौटूँगा।”
मैं दुकान से निकला और गली की तरफ़ भागा। गली में लोग इकट्ठे हो रहे थे — शबनम आपा की गुमटी पर भीड़ थी, भोला भाई शटर उठा रहे थे, और किराने वाले बूढ़े काका अपनी दुकान के बाहर खड़े किसी को कुछ बता रहे थे। गली की हवा बदल गई थी। अब वो डर की हवा नहीं थी। वो किसी चीज़ के शुरू होने की हवा थी।
मैं स्कूल के पीछे वाली गली में मुड़ा।
वहाँ मुझे मीरा मिली।
वो सुनीता के क्वार्टर के बाहर नीम के नीचे बैठी थी, और उसके सामने मंसूर खड़ा था — वो पतला आदमी, जो स्कूल के पीछे वाली गली में साइकिल की छोटी दुकान चलाता है, पीली कमीज़ और फटा झोला।
मंसूर रो रहा था।
नहीं — रो नहीं रहा था। वो रोने की कोशिश कर रहा था और रो नहीं पा रहा था। उसका चेहरा गीला था, आँखें लाल थीं, पर आवाज़ सूखी थी।
मीरा के हाथ में कैमरा था, पर वो बंद था।
मैंने देखा कि मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से सिर हिलाया — “अभी नहीं।”
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