The Mysterious Bell – Chapter 324
मनोज ने उस्ताद को एक पल देखा।
फिर धीरे से सिर हिलाया।
“मैं पहुँचा दूँगा,उस्ताद।”
वो चला गया।
दोनों मज़दूर भी उसके पीछे।
मैं दीवार की तरफ़ मुड़ा।
हाफ़िज़ बाबा और बंसी बाबा अब भी पीपल के नीचे थे — मुझे दूर से दिख रहे थे, शायद टिंकू ने उन्हें बताया होगा कि मनोज आया है। दोनों की नज़रें गली की तरफ़ थीं।
जैसे कोई उन्हें बुला रहा हो।
“उस्ताद,” मैंने धीरे से कहा। “अब क्या?”
“अब यही।” उस्ताद ने मेरा कंधा पकड़ा। “तू चल। मैं पीछे आता हूँ। मुझे मेरी मशीन तक ले जा।”
“क्यों?”
“क्योंकि अगर दीवार आज गिरनी है, तो मुझे उससे पहले एक आख़िरी सिलाई करनी है।” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। “बंसी और निसार के बीच जो काग़ज़ और दुपट्टा की बात है, वो सिर्फ़ उन दोनों की नहीं है, अंकुश। वो उस काग़ज़ की भी है जो मेरे ट्रंक में है। वो उस दुपट्टे की भी है जो निसार ने बंसी के बेटे के मुँह पर लपेटा था — और वो दुपट्टा, मुझे नहीं पता कैसे, मेरे भाई के पास पहुँच गया था।”
मैं ठिठक गया।
“उस्ताद…”
“इलियास ने माँ की पेटी में रखा है।” उस्ताद की आवाज़ काँपी। “उसने बत्तीस साल पहले उस रात को देखा था। उसने देखा था कि आग के बाद किसने काग़ज़ उठाया और किसने दुपट्टा। उसने देखा था कि किसने उन दोनों के कान में बात डाली। और उसने कुछ नहीं कहा, क्योंकि उस वक़्त वो भी अपनी माँ की दवा के लिए जूझ रहा था। उसे लगा कि अगर वो सच बोलेगा, तो दुकान बंद हो जाएगी और दवा रुक जाएगी।”
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
“तो इलियास ने…”
“इलियास ने सच को अपनी जेब में बंद कर लिया।” उस्ताद ने मेरी आँखों में देखा। “और उसी दिन से उसकी जेब भारी है। जितने साल, उतना भार। तू जब उससे मिले, तो उससे यह मत पूछना कि उसने क्या किया। उससे यह पूछना कि उसने क्या देखा — और उसे कब तक अकेले ढोना है।”
मैंने सिर हिलाया।
मैं पीपल की तरफ़ लौटा।
पीपल के नीचे बंसी बाबा अब भी खड़े थे। हाफ़िज़ बाबा अब भी। दोनों की आँखों में वही गीली लकीरें।
टिंकू ने मुझे देखा।
“भैया,” उसने कहा। “मनोज नया काग़ज़ चिपका गया है। मैंने पढ़ लिया है।”
“क्या लिखा है?”
“पाँच बजे तक दोनों दुकानें सील। दोनों शटर पर ताला। और अगर ताला लगा तो दुकान में जो समान है वो नहीं निकलेगा, ” उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
मैंने काग़ज़ पढ़ा।
मेरी मुट्ठी अपने आप बंद हो गई।
मैंने दोनों बुज़ुर्गों की तरफ़ देखा।
“बंसी बाबा,” मैंने कहा। “आपने कुछ कहा था — कि जो चाबी देगा, उससे पहले दोनों को एक सच बोलना है। अब सील की धमकी आ गई है। पाँच बजे से पहले अगर हमें चाबी नहीं लौटानी, तो हमें वो सच अब बोलना पड़ेगा।”
बंसी बाबा ने लाठी कसकर पकड़ी।
“मैं नहीं बोलूँगा,” उन्होंने कहा।
“बाबा —”
“मैं नहीं बोलूँगा!” उनकी आवाज़ भर्राई। “इक्कीस साल मैंने चुप रहकर अपनी दुकान चलाई। जब-जब मैंने सोचा कि पूछ लूँ, तब मुझे अपने बेटे की जली हुई पीठ याद आ गई। तू क्या जाने, अंकुश — मैंने उस रात अपने बेटे को निसार की गोद से उठाया था, और निसार का बेटा…”
उनकी आवाज़ टूट गई।
हाफ़िज़ बाबा ने धीरे से कहा — “बंसी।”
“मत बोल मुझसे।”
“बंसी।”
“मैंने कहा मत बोल!”
बंसी बाबा ने लाठी ज़मीन पर पटक दी।
दोनों के बीच सन्नाटा छा गया।
मैंने तीन साँसें लीं।
“बाबा,” मैंने धीरे से कहा। “मैं आपसे एक बात कहूँ? मैं जानता हूँ कि आपको गुस्सा है। आपको इक्कीस साल का गुस्सा है, बत्तीस साल का ज़ख्म है। मैं वो नहीं मिटा सकता। मैं कोई जादूगर नहीं हूँ। मैं तो बस साइकिल ठीक करने वाला लड़का हूँ, जो इस गली में बैठकर लोगों की फटी चेन जोड़ता है।”
बंसी बाबा ने मेरी तरफ़ देखा।
“तो तू ये सब क्यों कर रहा है?”
“क्योंकि मेरी भी एक दुकान है,” मैंने कहा। “और पाँच बजे वो सील हो सकती है। और मेरे पापा, मेरी माँ, मेरी बहन — सब कुछ इसी गली में है। मैं अकेले सब नहीं बचा सकता, बाबा। मैं चाहता हूँ कि इस गली में जो दो आदमी हैं, वो मिलकर खड़े हों। वरना शाम पाँच बजे के बाद, हम सब चुपचाप खड़े रहेंगे, और देखेंगे कि दीवार गिर रही है।”
हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह रोक दी।
“मैं बेच दूँगा,” उन्होंने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा।
“क्या?” बंसी बाबा ने कहा।
“मैं अपनी आधी दुकान बेच दूँगा,” हाफ़िज़ बाबा ने कहा, आवाज़ साफ़ थी, और सख़्त। “पाँच बजे से पहले। साहब को। जो दाम देगा, दाम नहीं देगा — मैं बेच दूँगा।”
बंसी बाबा ने कदम आगे बढ़ाया।
“तू क्या कह रहा है?”
“जो तूने सुना। मैं अपनी दुकान बेच दूँगा। बत्तीस साल की चुप्पी की कीमत नहीं दे सकता, पर दीवार गिराने से पहले खुद हट जाऊँगा।”
“तू पहले नहीं बेचेगा!” बंसी बाबा की आवाज़ भर्राई।
“क्यों?”
“क्योंकि—” हाफ़िज़ बाबा ने धीरे से कहा, “क्योंकि तेरी दुकान बड़ी है। तू बेचेगा तो तू खाली हाथ रहेगा। मैं खाली हाथ हो सकता हूँ, तू नहीं।”
“तूने मेरे बेटे को आग से बचाया था, निसार।” बंसी बाबा की आवाज़ टूट रही थी। “उस दिन के बाद मैंने तुझसे आँख नहीं मिलाई। पर मैं जानता हूँ कि उस रात तूने अपनी बाँह जलाई थी। मैं जानता हूँ। और ये मुझे बत्तीस साल तक खाया है।”
हाफ़िज़ बाबा ने उनकी तरफ़ देखा।
“तो तूने पूछा क्यों नहीं?”
“क्योंकि मुझे डर था।” बंसी बाबा ने हथेली पर मुँह रख लिया। “डर था कि तू कहेगा कि मेरे बेटे की जान तेरे बेटे की जान से कम थी। डर था कि मेरी बीवी के बारे में जो बात गली में फैली, वो तूने भी मानी होगी। और सबसे बड़ा डर ये था — कि अगर तूने मानी, तो मुझे किसी पर भरोसा नहीं कर पाने की आदत हो जाएगी।”
हाफ़िज़ बाबा ने एक कदम बढ़ाया।
“मैंने नहीं मानी थी,” उन्होंने कहा। “कभी नहीं मानी।”
“तो कहा क्यों नहीं?”
“क्योंकि मेरे बेटे को खोने के बाद, मेरे पास कहने के लिए सिर्फ़ गुस्सा बचा था।”
दोनों के बीच चुप्पी।
गली की चुप्पी।
फिर हाफ़िज़ बाबा ने बंसी बाबा की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
“बंसी।”
“हूँ।”
“मुझे अपनी चाबी वापस दे।”
बंसी बाबा ने उनकी तरफ़ देखा।
“और तू मुझे मेरी।”
“हाँ।”
“पर पहले — काग़ज़ और दुपट्टा।” बंसी बाबा ने धीरे से कहा। “ये दोनों बातें अंदर बंद हैं। मैं आज सबके सामने कहूँगा कि मैंने उस काग़ज़ को जलाया नहीं था। और मैंने उस दुपट्टे को नहीं छिपाया था। मैंने बस गुस्से में चुप रहना चुना।”
हाफ़िज़ बाबा ने सिर हिलाया।
“और मैं कहूँगा कि मैंने तेरे घर के बारे में जो कहा था, वो गुस्से में कहा था। और मैंने उस दिन तेरे बेटे को निकालकर कोई बड़ा काम नहीं किया — मैं तो बस वो कर रहा था जो हर पड़ोसी करता है। मुझे पता था कि अगर तेरा बेटा नहीं बचा, तो तू मेरे बेटे के जाने से भी ज़्यादा टूट जाएगा।”
बंसी बाबा ने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया।
पर उनके कंधे काँप रहे थे।
मैंने धीरे से टिंकू की तरफ़ देखा।
टिंकू की आँखें भरी हुई थीं।
शबनम आपा ने थाली आगे बढ़ाई।
“अब?” उन्होंने कहा, आवाज़ असामान्य रूप से धीमी। “अब काफ़ी है? या और बोलोगे? मेरे यहाँ समोसा ठंडा हो रहा है।”
बंसी बाबा ने थाली की तरफ़ देखा।
“आपा, तेरे समोसे का हिसाब,” उन्होंने कहा, “हमेशा से तेरे पापा के हाथ का था।”
शबनम आपा हँसीं।
पर हँसी में गीली किरकिरी थी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno