The Mysterious Bell – Chapter 313
और पीछे, उस्ताद की दुकान से, सिलाई मशीन की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। इस बार वो टिक-टिक पहले जैसी नहीं थी। इस बार लग रहा था कि कोई पुरानी घड़ी, पचास साल बाद, फिर से चलने की तैयारी कर रही है।
॥
मैं उस्ताद की दुकान से बाहर निकला ही था कि गली के मोड़ पर दो परछाइयाँ दिखीं। एक नीली शर्ट वाली, दूसरी कंधे पर पुरानी शॉल डाले। मैं ठिठक गया। सुबह के पौने पाँच बजे कोई गली में ऐसे खड़ा नहीं होता, जब तक कि उसे रात भर नींद न आई हो या उसके घर में कोई बीमार हो।
दुबे अंकल थे और भोला भाई।
“तुम दोनों यहाँ?” मैंने कहा।
“नींद नहीं आई,” भोला भाई ने कहा। “बीवी ने कहा, बैठे रहने से अच्छा है जाकर देख आओ कि गली में क्या हो रहा है।”
दुबे अंकल अपनी नीली शर्ट के बटन देख रहे थे, जैसे उन्होंने ही कोई गुनाह किया हो। “सात बजे ताले आने हैं। सो जाते, तो उठते कैसे?”
“तो आप सोने की जगह गली के मोड़ पर खड़े हो गए?”
“तेरी दुकान पर रोशनी दिखी,” दुबे अंकल ने कहा। “सोचा, देख आएँ।”
“रोशनी उस्ताद की दुकान की है,” मैंने कहा। “वो भी जगे हैं। अंदर चलिए, चाय बनती है।”
अंदर चले।
उस्ताद की दुकान में सुबह का वो उजाला आ रहा था जो किसी चीज़ को छुपाता नहीं, सिर्फ़ उसका रंग बदल देता है। मशीन वहीं थी, और उसकी सुई अब भी धीरे-धीरे हिल रही थी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी नींद में उँगली हिला रहा हो। ट्रंक खुला था। उसमें कपड़े में लिपटा बंडल रखा था। और मशीन के पास, लकड़ी के खूँटी पर, वो पुरानी सफ़ेद-काली तस्वीर टँगी थी, जिसमें दो जवान कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे।
टिंकू फ़र्श पर बैठा था, घुटनों पर सिर रखे, आधा सोया हुआ। उसके हाथ में उस्ताद का मोटा चश्मा था, जैसे उसने सोने से पहले भी उसे पकड़ना ज़रूरी समझा हो।
उस्ताद बैठे थे। चुप। उनके हाथ में कोई कपड़ा नहीं था, कोई औज़ार नहीं था, कोई सुई नहीं थी। पचास साल में पहली बार मैंने उन्हें ऐसे बैठा देखा — बिना काम के।
दुबे अंकल और भोला भाई अंदर आकर रुक गए। वो भी समझ गए कि यहाँ कुछ हुआ है।
“बैठिए,” मैंने कहा। “दोनों ज़मीन पर बैठ जाइए। बेंच खींचने की ज़रूरत नहीं।”
और तभी बाहर चप्पलों की आवाज़ आई, और शबनम आपा हाथ में पीतल की थाली लेकर अंदर घुसीं, जिस पर चार गिलास और एक केतली रखी थी।
“चार बजे चाय लाई थी, तुम लोगों ने छोड़ दी,” उन्होंने कहा। “अब पाँच बजे फिर लाई हूँ। इस बार गरम है, और मेरा हाथ भी जल गया है, तो पी लेना वरना मेरा हाथ बेकार जाएगा।”
उन्होंने गिलास रखे। फिर उस्ताद की तरफ़ देखा, फिर ट्रंक की तरफ़, फिर उस तस्वीर की तरफ़। और उनका हाथ केतली पर रुक गया।
“क्या हुआ?” उन्होंने पूछा। “यहाँ तो हवा तक चुप है।”
मैंने गिलास उठाया, एक घूँट पिया, और फिर जो कहना था, कह दिया।
“उस्ताद, एक बात पूछनी है।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“उस दिन गुमटी पर एक आदमी आया था,” मैंने कहा। “गले में घड़ी लटकी थी। पुरानी घड़ी, टूटे चमड़े के पट्टे वाली, काँटे रुके हुए। हाथ में पीला काग़ज़ था, जिस पर लाल अंगूठा था। मैंने उसे देखा था। और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी ख़ुद बज गई थी।”
उस्ताद का चेहरा नहीं बदला। पर उनकी साँस बदल गई।
“वो इलियास चाचा हैं न?”
कमरे में सन्नाटा छा गया। वैसा सन्नाटा जो बात नहीं करता, बैठ जाता है।
टिंकू की नींद खुल गई। उसने उस्ताद की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर अपने हाथ में पकड़े चश्मे की तरफ़, और उसने चश्मा धीरे से अपनी गोद में रख लिया।
भोला भाई ने गिलास नीचे रखा। “अंकुश,” उसने धीरे से कहा, “मेरा सनी साइट पर काम करता है न। वो कहता था कि दफ़्तार में एक चाचा आते हैं। उम्र में बड़े, चलते हैं तो लगता है जैसे हिसाब लेकर चल रहे हों। घड़ी गले में लटकी रहती है, काँटे रुके हुए। साहब उन्हें इलियास चाचा कहते हैं। मैंने उस दिन हँसी में उड़ा दिया था। सोचा, गली में एक इलियास है तो शहर में दूसरा क्यों नहीं होगा।”
“शहर में दूसरा नहीं है,” मैंने कहा। “एक ही है। और वो रणवीर के लिए काम करता है।”
उस्ताद ने कोई आवाज़ नहीं की।
“वो सफ़ेद गाड़ी से उतरता है,” मैंने कहा। “उसी गाड़ी से जिससे रणवीर उतरता है। वो उसके भवन से निकलता देखा गया है। वो उन लोगों में है जो मेरी दुकान की ज़मीन नाप रहे थे। वो उसी काग़ज़ को लिए फिरता है जिस पर हमारे घर का नाम लिखा है।”
उस्ताद मशीन की तरफ़ झुक गए।
उन्होंने दोनों हाथ मशीन के लोहे के पहिये पर रख दिए, जैसे कोई बूढ़ा बरगद की जड़ पकड़ लेता है। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर पहिया हिला नहीं। मशीन की सुई बंद हो गई। पूरी दुकान में अब सिर्फ़ चिड़ियों की आवाज़ आ रही थी।
फिर वो सीधे हुए।
मैंने सोचा था कि वो रोएँगे, या चिल्लाएँगे, या कहेंगे कि झूठ है, यह नहीं हो सकता। बुज़ुर्ग लोग ऐसा ही करते हैं।
पर उन्होंने कुछ और कहा।
“मुझे पता था।”
शबनम आपा की केतली हाथ से नीचे हो गई और थाली पर टकराई। कोई नहीं बोला।
“मुझे पता था,” उस्ताद ने दोहराया। “पचास साल में ज़रूरत पड़ती है, बाज़ार जाता हूँ, नए बाज़ार की तरफ़ से लोग आते हैं, कोई कहता है कि साहब के दफ़्तार में एक बूढ़ा रहता है जो काग़ज़ों का पहाड़ संभालता है। मैंने कभी पूछा नहीं कि उसका नाम क्या है। मैंने जानबूझकर कभी नहीं पूछा। क्योंकि अगर नाम पूछ लिया और वही निकला, तो फिर मेरे पास कोई बहाना नहीं बचता।”
उन्होंने ट्रंक से पीली तस्वीर उठाई। उँगली उस जवान पर रखी जो चौड़े चेहरे वाला था।
“मैंने खुद को यह झूठ सुनाया कि वो शहर छोड़कर चला गया। किसी दूसरे शहर में है, किसी गली में दुकान खोलकर बैठा है, और मुझसे अलग ही खुश है। यह झूठ सुनने में अच्छा लगता था। सच के मुक़ाबले में हर झूठ अच्छा ही लगता है, बेटा। सच बहुत ज़्यादा सच होता है।”
“उस्ताद…”
“मैं पचास साल से उस गली से नहीं गुज़रा,” वो बोले। “पीपल के पूरब वाली गली। मुझे पता है वो पीपल के पूरब ही रहता है, क्योंकि मेरी माँ उसे पूरब वाला छोर कहती थी। और मैं पूरब की तरफ़ जाने वाला हर रास्ता बंद करके चलता रहा। तुम कहोगे कि यह पचास साल का रास्ता है, अंकुश। पैरों का तो नहीं, दिल का है।”
दुबे अंकल ने अपना गिलास रखा और बोले, “अंकुश, एक बात बतानी है।”
“बोलिए।”
“कल रात दरोगा जी के साथ जो खड़े सिपाही थे, उनमें से एक मुँशी रामअवतार का भाँजा निकला। वो मुझे पुराना जानता है। थाने के बाहर चुपचाप बोला कि आज सात बजे जो आदमी आएगा, वो किसी सिपाही से नहीं, साहब के दफ़्तार से आएगा। ताले की चाबी उसके पास रहेगी। तीन काग़ज़ भी उसके पास रहेंगे रजिस्ट्री के। और उस आदमी का नाम उसने मुझे ज़ोर से नहीं बताया, बहुत धीरे बोला, जैसे हॉस्पिटल में बीमारी का नाम बोलते हैं। उसने कहा, इलियास चाचा।”
शबनम आपा ने केतली को लई पर उठाया और इतनी ज़ोर से रखा कि ढक्कन बज गया।
“यानी आज सात बजे उस्ताद को अपने भाई के सामने खड़ा होना पड़ेगा,” मैंने कहा।
उस्ताद ने तस्वीर वापस ट्रंक में रखी। उन्होंने ढक्कन बंद किया। फिर उसे खोलने की ज़रूरत नहीं थी, पर उन्होंने खोला, बंडल को ऊपर से नीचे किया, और फिर ढक्कन बंद कर दिया। वो हाथ जगह नहीं ढूँढ रहे थे। वो वक़्त नहीं ढूँढ रहे थे। वो ख़ुद को टाल रहे थे।
फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे डर था।
“मैं उसके सामने नहीं जाऊँगा।”
कोई नहीं बोला।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno