The Mysterious Bell312 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 312

7 min read November 5, 2026

कोने से एक आवाज़ आई।

“उस्ताद, वो कौन हैं?”

मैं चौंककर पीछे मुड़ा।

टिंकू छोटी स्टूल पर बैठा था। मोज़े में हाथ, टूटा चश्मा गोद में, आँखें पूरी खुली हुईं। उसे कब से वहाँ बैठा देखा, पता नहीं। बच्चे कभी-कभी इतनी चुप्पी से आ जाते हैं कि लगता है दीवार से बाहर निकले हैं।

“तू कब आया?” मैंने कहा।

“जब आप मेज़ पर लालटेन रख रहे थे,” उसने कहा। “आपने देखा ही नहीं।” फिर उसने चश्मा आगे बढ़ाया। “उस्ताद जी, यह आपका चश्मा ठीक कर दिया। मैंने रात में कर लिया। हाथ काँप रहा था, पर फिर मैंने सोचा — काँपने वाला हाथ भी अगर टेढ़ा कर दे, तो आदमी को देखने की आदत हो जाती है।”

उस्ताद ने चश्मा लिया। उसे अपनी आँखों पर रखा। फिर नीचे उतारकर देखा।

“हुनर है तुझमें,” उन्होंने कहा। “हुनर को बर्बाद मत करना। यह सबसे ज़्यादा बर्बाद होने वाली चीज़ है।”

टिंकू हँसा, फिर फौरन गंभीर हो गया, क्योंकि उसे याद आया कि वो यहाँ चश्मा लेकर नहीं, सवाल लेकर आया था।

“उस्ताद जी,” उसने फिर पूछा, “वो कौन हैं? आपके भाई?”

उस्ताद कुछ नहीं बोले।

मैं भी कुछ नहीं बोला। मुझे लगा कि यह सवाल मेरा नहीं है।

उस्ताद ने अपनी कमीज़ की जेब में हाथ डाला। कुछ ढूँढ़ा। फिर दूसरी जेब में। फिर अंदर वाली जेब में, जो आमतौर पर कोई नहीं खोलता।

उन्होंने एक चीज़ बाहर निकाली।

एक छोटी तस्वीर।

सफ़ेद-काली। किनारों से मुड़ी हुई। ऊपर एक कोना चिपका हुआ, जैसे किसी दीवार पर बहुत दिन लगी रही हो।

मेरा दिल ज़ोर से धड़का।

क्योंकि यह वही तस्वीर थी। वही फोटो जो मुझे पापा के पुराने संदूक में मिली थी। दो जवान आदमी। कंधे पर हाथ। एक दुबला, चश्मे वाला, शर्मीली मुस्कान। और दूसरा चौड़े चेहरे वाला, खुली हँसी वाला, जैसे कैमरे से कह रहा हो कि जल्दी कर भाई, मुझे दुकान खोलनी है।

उस्ताद ने उँगली तस्वीर पर रखी।

“इसका नाम इलियास है।”

कमरे में इतनी खामोशी हो गई कि सिलाई मशीन की टिक-टिक भी रुक गई, हालाँकि पहिया नहीं रुका था।

मेरा मुँह सूख गया।

“इलियास,” मैंने दोहराया।

“हाँ,” उस्ताद ने कहा। “इलियास अली बक्श। मेरा छोटा भाई। जिसे मैंने पचास साल पहले खोया। और जो आज भी, मेरी ही गली में, मेरे ही शहर में, मेरे ही नाम से नफ़रत करके ज़िंदा है।”

मैं उठ खड़ा हुआ।

“उस्ताद,” मैंने कहा, “आपने कहा था कि उसकी घंटी आज भी चलती है। दूर बजती है।”

“हाँ।”

“और उसके गले में घड़ी है? रुकी हुई? पचास साल से?”

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सिकुड़ीं।

“तूने उसे देखा है,” उन्होंने कहा।

“मैंने एक आदमी को गुमटी पर देखा है,” मैंने धीरे से कहा। “सफ़ेद टोपी। झुकी हुई कमर। और गले में एक पुरानी घड़ी, जिसके काँटे रुके हुए थे। वो अपने साथ एक कपड़े में लिपटा बंडल लाया था। उस बंडल में एक पीला काग़ज़ था। नीली स्याही। और नीचे एक लाल अंगूठा।”

उस्ताद का हाथ काँपने लगा।

“और उस दिन,” मैंने कहा, “मेरी जेब में घंटी थी। और उसने बजी। बिना किसी के छूने के। बिना किसी के हिलाने के।”

उस्ताद ने तस्वीर को देखा। फिर मुझे देखा। फिर दोबारा तस्वीर को।

“अच्छा,” उन्होंने कहा। एक लंबी साँस। “तो वो आ गया।”

“वो क्यों आया होगा?”

“क्योंकि वो भी बूढ़ा हो गया,” उस्ताद ने कहा। “और बूढ़ा आदमी अपने सबसे पुराने झगड़े को अपने साथ लेकर नहीं मरना चाहता। वो चाहता है कि कोई उसे छुड़ा दे। पर वो खुद मुँह नहीं खोल सकता, क्योंकि पचास साल से उसने अपनी ही ज़ुबान से कह रखा है कि वो नहीं बोलेगा। अब अगर बोलेगा, तो खुद को झूठा साबित करेगा। और आदमी के लिए सबसे मुश्किल काम यही है — खुद को झूठा साबित करना।”

“तो वो किसी और से करवाना चाहता है,” मैंने कहा।

“हाँ,” उस्ताद ने कहा। “तू भला उसके हाथ में आया।”

मैंने घंटी जेब से निकालकर मेज़ पर रख दी।

“उस्ताद,” मैंने कहा, “आज सुबह सात बजे तीन ताले खुलने वाले हैं। मेरी दुकान का ताला, उस दरोगा के काग़ज़ का ताला, और आपकी माँ की पेटी का ताला।”

“पेटी का ताला मेरे पास नहीं खुलता,” उन्होंने कहा।

“मुझे पता है,” मैंने कहा। “पर आज सात बजे चौथा ताला भी वहीं आने वाला है। वो जो आपने पचास साल पहले अपने हाथ से लगाया था।”

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

शबनम आपा ने खाली गिलास उठाया। और उठते-उठते बोलीं, “उस्ताद, मैं एक बात कहूँगी, बुरा मत मानना। आपने पचास साल चुप रहकर किसी का क्या भला किया? न अपना, न भाई का, न माँ का। बस एक तस्वीर ताले में बंद रही और दो आदमी ज़िंदा रहकर भी एक-दूसरे के लिए मुर्दा बन गए। अब मेरी बात मानो, तो आज सात बजे आ जाओ।”

“क्यों?”

“क्योंकि आज सात बजे तीन ताले खुल रहे हैं,” शबनम आपा ने कहा। “कम से कम एक का उद्घाटन आपके हाथ से हो जाएगा।”

उस्ताद हँसे। इस बार ज़ोर से। उनकी हँसी में कुछ टूटने जैसी आवाज़ थी, जो अच्छी भी लग रही थी।

बाहर आसमान हल्का होने लगा था। गली में पहली आवाज़ आई — किसी ने मोहाने वाला पुराना नल खोला, और पानी की धार पत्थर के टैंक में गिरी। फिर किसी ने पेपर फेंका। चिड़िया बोलीं।

“अंकुश,” उस्ताद ने कहा, “एक बात याद रखना। तू यह मत सोचना कि यह घंटी तेरी है। यह किसी एक आदमी की नहीं है। यह दो लोगों के बीच की चीज़ है। बीच से जो टूट गई, वो दोबारा बीच में ही जुड़ेगी। जिस दिन तुझे लगे कि तू अकेले सब ठीक कर लेगा, उस दिन घंटी चुप हो जाएगी।”

“आपने भी तो अकेले रहकर पचास साल काट दिए,” मैंने कहा।

“और मेरी घंटी इसीलिए चुप है,” उन्होंने कहा।

टिंकू उठा। उसने चश्मा उस्ताद के हाथ से लेकर उन्हें पहना दिया। बड़े तामझाम से। जैसे नर्सिंग की किताब में पढ़ा हो कि बुज़ुर्गों के साथ नरमी से पेश आना चाहिए।

“उस्ताद जी,” उसने कहा, “आपका भाई इलियास चाचा अगर सात बजे आएं, तो मैं उनकी साइकिल का पहिया ठीक कर दूँगा। मुफ़्त में।”

“मुफ़्त में कुछ नहीं होता, टिंकू,” उस्ताद ने कहा।

“तो भरोसे के बदले,” टिंकू ने कहा। “जैसे अंकुश भैया करते हैं।”

मैंने सामान समेटा। उस्ताद ने कपड़े में लिपटा वो बंडल फिर उठाया और धीरे से ट्रंक में रख दिया। फिर ट्रंक का ढक्कन बंद किया, पर ताला नहीं लगाया।

“उस्ताद,” मैंने दरवाज़े पर रुककर कहा, “आपकी माँ की आवाज़ उस पेटी में है, यह आपने कहा था।”

“हाँ।”

“और पेटी की चाबी इलियास के पास है।”

“हाँ।”

“तो आज सात बजे दो चीज़ें एक साथ हो सकती हैं,” मैंने कहा। “पेटी भी खुले और तस्वीर भी।”

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चश्मे पर सुबह की पहली किरण पड़ी और वो चमक उठा।

“अंकुश,” उन्होंने कहा, “तू मुझसे भी ज़्यादा जल्दबाज़ है।”

“मुझे पता है,” मैंने कहा। “पर मैं जल्दबाज़ नहीं होता तो यह दुकान आज तक शटर खोलकर नहीं बैठती।”

मैं बाहर निकला।

गली में सुबह उतर रही थी। पीपल के नीचे चबूतरी पर किसी ने पहला चबूतरी-आसन बिछा दिया था। दूर किसी के घर से चूल्हे की आवाज़ आ रही थी। और मेरी दुकान की तरफ़ देखकर मुझे याद आया कि सात बजे वहाँ दरोगा, सूची और उसकी मुहर आने वाली है।

मैंने जेब से घंटी निकाली।

“अब बोल,” मैंने कहा। “कुछ तो बोल।”

घंटी चुप रही।

पर जब मैंने उसे वापस जेब में डाला, तो उसने एक बार बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “आज तू पहले अपने घर का ताला खोल।”

मैं रुक गया।

“और मेरा?” मैंने पूछा।

“तेरा ताला भी उसी दरवाज़े के पीछे है,” घंटी ने कहा। “जो दरवाज़ा तू पच्चीस साल से नहीं खोला।”

मैंने घंटी जेब में रखी और तेज़ कदमों से दुकान की तरफ़ चल दिया।

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