The Mysterious Bell – Chapter 310
“मैं हूँ,” मैंने कहा।
“तू है,” उन्होंने कहा और मुस्कुराए। “पर कल तेरे पास अपनी लड़ाई होगी। मेरी लड़ाई मेरी है। तू सिर्फ़ मेरे साथ खड़ा रहना। बोलना मैं खुद बोलूँगा।”
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। फिर रुके। मुड़े। और उन्होंने घंटी की तरफ़ देखा, जो मेरी जेब में थी।
“एक बात और,” उन्होंने कहा। “जब वो घंटी तुझे कुछ कहे, तो उसकी बात पूरी मान लेना, भले वो कितनी भी अजीब लगे। यह चीज़ कभी पूरी बात नहीं कहती। यह सिर्फ़ सुराग देती है और चुप हो जाती है। बाकी काम तुझे खुद करना पड़ता है।”
“पता है,” मैंने कहा।
“नहीं पता है,” उन्होंने कहा। “तू अभी भी सोचता है कि यह चीज़ तेरी ताक़त है। यह तेरी ताक़त नहीं है, अंकुश। यह तेरा बोझ है। और बोझ अकेले उठाने से कमर टूटती है, हाथ नहीं लगते।”
वो बाहर चले गए। लाठी की आवाज़ दूर होती गई। ठक। ठक। ठक।
कमरे में लोग बैठे रहे। कोई उठा नहीं। कोई बोला नहीं।
फिर शबनम आपा ने धीरे से कहा, “मुझे नहीं पता था कि वो इतना बोल सकते हैं।”
“मुझे भी नहीं,” मैंने कहा।
दुबे अंकल ने अपनी कमर सीधी की और कहा, “अंकुश, यह बात अब गली की हो गई। उस्ताद की माँ, हमारी भी किसी की माँ है।”
“पर कल सुबह ताले के सामने यह बात नहीं उठेगी,” मैंने कहा। “कल सुबह हमारे पास तीन चीज़ें हैं। एक, हमारी दुकान का ताला। दो, उस्ताद की माँ की पेटी का ताला। तीन, वो औरत जो पाँच साल से पीला लिफ़ाफ़ा लिए आ रही है।”
“तीनों एक ही दिन?” भोला भाई ने कहा। “भगवान भी इतना एक साथ नहीं करता।”
“भगवान नहीं करता,” मैंने कहा, “पर सक्सेना करता है। और सक्सेना भगवान नहीं है। वो सिर्फ़ बहुत अच्छा वकील है।”
टिंकू उठा। उसने अपना टूटा चश्मा मेरी मेज़ पर रख दिया।
“उस्ताद,” उसने कहा, “मैं आज रात चश्मा ठीक नहीं कर पाऊँगा। हाथ काँप रहा है।”
“हाथ काँपे तो अक्षर टेढ़ा होता है,” मैंने कहा, “सच सीधा रहता है। तू कल सुबह कर देना।”
वो सिर हिलाकर बाहर चला गया। उसके पीछे सानिया और गुड्डू भी गए। बरामदे की लाइट बुझी, और घर की तरफ़ उनके चलने की आवाज़ आई।
शबनम आपा सबसे आख़िर में गईं। दरवाज़े पर रुककर उन्होंने कहा, “अंकुश, कल सुबह छह बजे उस्ताद की दुकान पर जाना। और जब वो पेटी खोलें, तो तू उनके पीछे नहीं, उनके बगल में खड़ा होना। पीछे खड़ा आदमी सिर्फ़ गवाह होता है। बगल में खड़ा आदमी साथी होता है।”
वो चली गईं।
मैं अकेला रह गया।
मैंने लालटेन की लौ धीमी की। फिर उसे वैसा ही कर दिया, क्योंकि अंधेरे में मैं अपनी ही सोच से डर रहा था।
मैंने मेज़ पर रखी घंटी उठाई। उसे हथेली पर रखा। उसका ठंडापन मेरे हाथ से सीधे मेरे सीने तक गया।
“अब बोल,” मैंने धीरे से कहा।
कुछ नहीं हुआ।
“बोल,” मैंने फिर कहा। “उस्ताद की माँ की आवाज़ कहाँ है? वो ताला कहाँ है? इलियास कहाँ है?”
और फिर घंटी बजी।
एक बार। बहुत धीमी।
और उसने कहा, “ताला वहीं है जहाँ तू जाने से डर रहा है।”
तीन शब्द। और चुप।
मैंने घंटी को जेब में रखा और रजिस्टर के उस खाली पन्ने की तरफ़ देखा।
कल सुबह सात बजे। छह बजे उस्ताद की दुकान।
मैंने पन्ने पर उँगली रखी। मन किया कि कुछ लिखूँ। पर कुछ लिखा नहीं, क्योंकि मुझे लगा कि अभी वक़्त नहीं है। पहले वो ताला खुले, जिसके पीछे एक बूढ़ी औरत की आवाज़ बंद है। फिर इस पन्ने पर नाम लिखेंगे।
मैंने लालटेन बुझाई।
अंधेरे में मुझे लगा कि कोई मशीन दूर कहीं टिक-टिक कर रही है, पर शायद वो सिर्फ़ मेरा दिल था।
॥
रात के तीसरे पहर मैं उठ बैठा। चारपाई पर करवट बदली तो उसकी चरमराहट ने पूरे कमरे को जगा दिया। बल्ब गुनगुना रहा था, रोशनी नहीं दे रहा था। मैंने मेज़ पर हाथ रखा। घंटी वहीं थी। ठंडी, जैसे कोई पत्थर जो कभी धूप में बैठा ही न हो।
“अब बोल,” मैंने कहा।
खामोशी।
“अच्छा, नहीं बोलना।” मैंने घंटी जेब में डाली। “बोलने वालों को नींद आ जाती है। चुप रहने वालों का बोझ हम ढोते हैं।”
मैंने लालटेन जलाई और शटर की कुंडी खोली।
बाहर गली में वो खास अंधेरा था जो सुबह से पहले होता है। न ठंडा, न गरम। बस एक तरह का खालीपन। पीपल का पत्ता भी नहीं हिल रहा था। दूर कहीं कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया, जैसे उसे खुद शर्म आ गई हो।
मैंने पीछे वाली गली पकड़ी।
मुझे पता नहीं था कि छह बजे से पहले उस्ताद की दुकान पर जाकर मैं क्या कहूँगा। पर जब किसी चीज़ की वजह न हो और फिर भी पैर उस तरफ़ चल पड़ें, तो समझ लो कि वजह खुद रास्ते में मिलेगी।
उस्ताद की दुकान का शटर आधा उठा हुआ था।
अंदर लालटेन जल रही थी। और सिलाई मशीन टिक-टिक कर रही थी। रात के चार बजे। बिना कपड़े। बिना सुई। सिर्फ़ पहिया घूम रहा था।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा।
उस्ताद बैठे थे। उनकी गोद में कुछ था, कपड़े में लिपटा। उनका एक हाथ उस पर रखा था, जैसे कोई बच्चा सो रहा हो और जगाने का डर हो।
“अंदर आ,” उन्होंने बिना देखे कहा। “दरवाज़े पर खड़ा आदमी सिर्फ़ साया बनता है।”
मैंने लालटेन मेज़ पर रखी और सामने वाली लकड़ी की छोटी स्टूल खींच ली।
“आपको नींद नहीं आई?” मैंने पूछा।
“मेरी नींद पचास साल पहले एक ताले में बंद हो गई,” उन्होंने कहा। “अब आती है तो सिर्फ़ दोपहर में, जब कोई ग्राहक न हो।”
मैं हँसा। फिर रुक गया, क्योंकि उनके चेहरे पर हँसी नहीं थी।
“उस्ताद,” मैंने कहा, “कल आपने कहा था कि आपकी माँ की आवाज़ सिलाई की पेटी में बंद है। मैं सारी रात सोचता रहा कि आवाज़ को पेटी में बंद कौन करता है।”
“तंत्र करता है,” उन्होंने कहा। “और तंत्र तो सिर्फ़ हाथ है। पेटी में बंद करने वाला आदमी था।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। लालटेन की रोशनी उनके मोटे चश्मे पर पड़ रही थी, और चश्मे के पीछे उनकी आँखें इतनी साफ़ दिख रही थीं जितनी दिन में कभी नहीं दिखतीं।
“तूने कभी सोचा,” उन्होंने कहा, “कि घंटी तेरे पास कैसे पहुँची?”
“मेले में मिली,” मैंने कहा। “कबाड़ी बूढ़े से। जंग लगी साइकिल के साथ।”
“वो तेरी सोच है,” उन्होंने कहा। “सच यह है कि यह घंटी पहले मेरे पास थी।”
मेरा हाथ रुक गया।
“पचास साल पहले,” उन्होंने कहा, “मेरे पास भी ऐसी ही एक घंटी थी। उसी रंग की। उसी बनावट की। बस उस पर फूल नहीं खुदा था। फूल वाली घंटी मेरे भाई के पास थी। हम दो भाई थे। दो घंटियाँ थीं। और हम दोनों सोचते थे कि हम दुनिया के सबसे होशियार आदमी हैं।”
उन्होंने मशीन का पहिया धीरे से घुमाया। टिक-टिक। टिक-टिक। जैसे कोई पुरानी घड़ी बोल रही हो।
“यह दुकान उस ज़माने में दो हिस्सों में चलती थी। आधी में मैं कपड़ा सीता था, आधी में वो लोहा पीटता था। गली के लोग आते थे और कहते थे — उस्ताद, यह टूट गया। और हम दोनों घंटी बजाकर पूछते — कौन टूटा है? चीज़ या आदमी?”
मैंने कहा, “और घंटी क्या कहती थी?”
“घंटी कभी नाम नहीं लेती थी,” उस्ताद ने कहा। “वो सिर्फ़ इतना कहती — ‘पहले वो दो जो बोलना बंद कर बैठे हैं।’ फिर हम दोनों को जाना पड़ता। किसी के घर में घुसना पड़ता। किसी को बैठाना पड़ता। किसी की माफ़ी लेनी पड़ती। और सच कहूँ तो हमें वो काम बहुत पसंद था। मज़ेदार था।”
“मज़ेदार?” मैंने कहा।
“हाँ। तब हम दोनों जवान थे। जवान आदमी को लगता है कि रिश्ते जोड़ना खेल है। बूढ़े आदमी को पता चलता है कि यह खेल नहीं, खेत है। जो बोया, वही काटना पड़ता है।”
वो चुप हो गए।
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