The Mysterious Bell309 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 309

7 min read November 5, 2026

“कसूर घंटी का नहीं था,” उस्ताद ने कहा। “कसूर हमारा था। घंटी ने सिर्फ़ कीमत ली।”

वो फिर पहिया घुमाने लगे। टिक। टिक। टिक।

“तंत्र की एक बात है,” उन्होंने कहा। “अगर तुम इसे अपने फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करो, तो यह तुम्हारी सबसे प्यारी चीज़ ले लेता है। ताले में बंद कर देता है। वो चीज़ तुम्हें दिखती नहीं, बस उसका एहसास रह जाता है कि कुछ खो गया है।”

मेरे हाथ ठंडे हो गए। मेरे घुटने पर रखा रजिस्टर मुझे भारी लगने लगा।

“आपकी कौन सी चीज़ बंद हुई, उस्ताद?” मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी और की हो।

उस्ताद ने मशीन के पास रखी एक लकड़ी की पेटी की तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर उन्होंने अपना हाथ अपनी जाँघ पर रखा, जैसे कुछ छिपा रहे हों।

“मैं तुम्हें कल बताऊँगा,” उन्होंने कहा। “सुबह, ताले के सामने।”

“नहीं,” मैंने कहा। और मेरी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो मुझे खुद पसंद नहीं आई। “नहीं, उस्ताद। आज रात। आप खुद बोले थे कि ज़्यादा देर नहीं होगी। अगर आज रात कुछ नहीं बोलेंगे, तो सुबह आप जो भी बोलेंगे, वो आधा होगा। आधी बात वही होती है जो डरकर बोली जाए।”

उस्ताद एक पल मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर हँसे। धीमी हँसी, जिसमें न मज़ाक था, न खुशी, बस थकान।

“तू अपने पापा पर गया है,” उन्होंने कहा। “जब बोलता है, तो सीधा आदमी के सीने पर।”

“मैंने पापा को बोलते ज़्यादा नहीं देखा,” मैंने कहा।

“तो सुन, पापा को देख। वो जब चुप होता है, तब भी बोल रहा होता है। बस तेरी ज़ुबान उसे सुन नहीं पाती।”

वो फिर पहिये पर हाथ रखकर बैठे। फिर उन्होंने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, जैसे आदमी खुद से कह रहा हो।

“माँ की आवाज़।”

कमरे में कुछ नहीं हिला।

“मुझे माँ की शक्ल याद है,” उस्ताद ने कहा। “मुझे उनके हाथ याद हैं, जो गरम रोटी पर घी लगाते थे। मुझे उनकी साड़ी का रंग याद है, जो हल्का नीला था और धोते-धोते सफ़ेद हो गया था। मुझे याद है कि वो सिलाई करते वक़्त गाती थीं। पर मुझे याद नहीं कि वो क्या गाती थीं।”

उन्होंने मशीन पर हाथ रखा।

“यह मशीन उनकी थी,” उन्होंने कहा। “मुझे यह मशीन याद है। मुझे उनका गाना भी याद है, पर आवाज़ नहीं। जब मैं आँखें बंद करके सोचता हूँ, तो एक सुर आता है और फिर टूट जाता है। जैसे किसी ने रेडियो की आवाज़ धीमी कर दी हो।”

“मैंने पचास साल से बहुत कोशिश की,” उन्होंने कहा। “लेकिन वो लौटती नहीं।”

और फिर उन्होंने पहिया घुमाया। टिक। टिक। टिक।

“और जिस दिन उसने मेरी बात नहीं मानी,” उन्होंने कहा, हाथ पहिये पर, आँखें मशीन पर, “उस दिन हमारी माँ की आख़िरी याद एक ताले में बंद हो गई। और वो ताला आज तक नहीं खुला।”

मशीन रुकी।

उस्ताद ने हाथ नीचे रखा।

कमरा ऐसा लगा जैसे साँस लेना भूल गया हो।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रहा था, आँखें बड़ी, होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। उसने अपना टूटा चश्मा अपनी छाती से लगा लिया, जैसे कहीं वो भी न छिन जाए।

“उस्ताद,” मैंने कहा, “वो ताला कहाँ है?”

“कपड़े में लिपटा हुआ,” उन्होंने कहा, “मेरे ट्रंक में रखा है। माँ की सिलाई की पेटी। उसी पर ताला लगा है। मैंने पचास साल में एक बार भी उसे खोलने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मुझे पता था कि चाबी मेरे पास नहीं है।”

“चाबी किसके पास है?”

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था — सवाल नहीं, एक बहुत पुराना जवाब, जो बाहर आने की तैयारी में था।

“इलियास के पास,” उन्होंने कहा।

शबनम आपा ने धीरे से कहा, “इलियास?”

“मेरा छोटा भाई,” उस्ताद ने कहा। “जिसके हाथ में घंटी बोलती थी, और जिसके हाथ में माँ की आवाज़ भी बंद हुई थी।”

मैं चुप हो गया। मेरी जेब से घंटी मिलने को हो रही थी, पर उस्ताद ने ऐसा देखा कि मैंने हाथ नहीं बढ़ाया।

“उस्ताद,” दुबे अंकल ने कहा, आवाज़ बहुत ही धीमी थी, “वो आदमी पचास साल से ग़ायब है। कोई नहीं जानता कि कहाँ है।”

“मैं जानता हूँ,” उस्ताद ने कहा। “वो दूर नहीं है। वो अपने जैसे किसी और के भेस में घूम रहा है। और वो अपनी घड़ी लेकर आया है, जो रुकी हुई है। मैंने उसे सुना है। दूर से घंटी बजी है। मेरी नहीं, उसकी। उसकी घंटी आज भी चलती है।”

मुझे वो रात याद आई। जब मैंने उस्ताद को रात दो बजे उठाया था और वो दूर की घंटी सुनकर बैठ गए थे।

“तो कल सुबह,” मैंने कहा, “ताले के सामने आप क्या करेंगे?”

“जो पचास साल में नहीं किया,” उन्होंने कहा। “बोलूँगा। सबके सामने।”

“और माफ़ी?”

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार उनकी आँखों में वो तेज़ी आई, जो किसी बूढ़े के अंदर जवानी की तरह बची रहती है।

“अंकुश,” उन्होंने कहा, “माफ़ी माँगना सीख लिया है। पर माफ़ी भी एक चीज़ है जो तुम खुद से नहीं दे सकते। तुम दूसरे के लिए रास्ता बना सकते हो। चलना उसको पड़ेगा।”

“और अगर वो न चले?”

“तो मैं उसके दरवाज़े पर बैठा रहूँगा,” उस्ताद ने कहा। “मेरे पास और क्या काम है?”

भोला भाई ने अपना रूमाल जेब में रख दिया। शबनम आपा ने फ़र्श पर बैठकर घुटने सीधे किए, जैसे कोई लंबी बात सुनने की तैयारी कर रही हों।

“उस्ताद,” टिंकू ने अचानक कहा, “आपने कभी सोचा कि अगर कल सुबह सब कुछ ठीक हो जाए, तो आपके पास बात करने को क्या बचेगा?”

कमरे में मुझे हँसी आ गई। पहली बार। टिंकू ने हैरान होकर मेरी तरफ़ देखा।

“मज़ाक मत करो, उस्ताद,” वो बोला। “मैं सीरियस हूँ।”

“मैं भी सीरियस हूँ,” मैंने कहा। “और इसीलिए हँस रहा हूँ। यह सवाल ऐसा है कि दुकानदार से पूछो कि अगर सब कुछ बिक जाए, तो वो करेगा क्या।”

उस्ताद ने टिंकू की तरफ़ देखा।

“टिंकू,” उन्होंने कहा, “सब ठीक नहीं होगा। यह तुम अपने उस्ताद से सीख लो। तंत्र इंसान की जान नहीं बचा सकता। यह बीमारी ठीक नहीं करता। जो चला गया, उसे लौटा नहीं सकता। यह सिर्फ़ जोड़ जोड़ता है। जोड़ने के बाद टिकाना तुम्हारा काम है।”

“तो माँ की आवाज़?” मैंने पूछा। “वो कभी नहीं लौटेगी?”

उस्ताद ने अपना मोटा चश्मा उतारा, आस्तीन से पोंछा, फिर लगाया।

“उसका तरीक़ा है,” उन्होंने कहा। “जोड़ने का। और यह जोड़ मैं अकेला नहीं कर सकता।”

वो धीरे से उठे। मैंने लाठी बढ़ाई। उन्होंने पकड़ ली। फिर वो मेरे पास आकर खड़े हुए और उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।

“कल सुबह सात बजे,” उन्होंने कहा, “तेरी दुकान पर ताले वाले आएँगे। उससे पहले, छह बजे, तू मेरी दुकान पर आ जाना।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं तुझे वो पेटी दिखाऊँगा,” उन्होंने कहा। “कपड़े में लिपटी हुई। और शायद उस वक़्त तू समझ जाए कि तेरे घर का सबसे पुराना दरवाज़ा और मेरी माँ की पेटी, दोनों एक ही ताले से बंद हैं।”

मेरी साँस रुक गई।

“क्या मतलब?”

“मतलब यह कि जिस हाथ ने मेरी माँ की याद बंद की,” उस्ताद ने कहा, “उसी हाथ ने तेरे दादा का काग़ज़ बनाया था। और वो हाथ आज भी ज़िंदा है। मैंने उसे देखा है। उसके जूते चमकते हैं।”

कमरे में ऐसी चुप्पी छाई कि मुझे अपने ही दिल की धड़कन कानों में सुनाई देने लगी।

“उस्ताद,” मैंने कहा, “आप किसकी बात कर रहे हो?”

वो मशीन की तरफ़ मुड़े। अपना हाथ पहिये पर रखा। और एक बार घुमाया।

टिक। टिक। टिक।

“आज रात बस इतना सुन ले,” उन्होंने कहा, “कि मैंने यह बात कभी किसी को नहीं बताई। न अपने घर में, न मोहल्ले में, न उस मंदिर में जहाँ मैं पिछले पचास साल से हर मंगलवार जाता हूँ। जो मैंने आज तुझे बताया, वो सिर्फ़ इसलिए बताया कि कल सुबह मेरे पास जो कहना है, उसके लिए मुझे एक आदमी चाहिए जो पहले से जानता हो कि बात कहाँ से शुरू हुई थी।”

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