The Mysterious Bell – Chapter 288
धूल मेरे चेहरे पर बैठी रही। मैंने उसे पोंछा नहीं। मुझे लगा, रहने दे, आज कुछ तो मेरा है जो मेरे साथ है — ये धूल।
फिर मैं अंदर गया, मेज़ पर पड़ी घंटी उठाई, दोनों हाथों में लेकर कान के पास ले गया।
कुछ नहीं।
मैंने हिलाया। पीतल के अंदर की गोली हिली, बजी — टन, टन — पर वो आवाज़ नहीं आई। वो आवाज़ जो कहती थी, "रुक, सोच, देख।" सिर्फ़ धातु की आवाज़ रह गई थी। जैसे किसी आदमी का शरीर सामने बैठा हो और आत्मा चली गई हो।
"अरे," मैंने कहा। "अरे, तू तो मेरी ही है ना?"
घंटी चुप।
मैंने उसे जेब में डाला। फिर निकाला, फिर डाला। तीन बार। चौथी बार मैंने खुद को रोका, क्योंकि दुकान के बाहर टिंकू खड़ा था और मुझे लगा कि अगर ये लड़का मुझे घंटी से बातें करते देखेगा तो सारी गली को बता देगा कि अंकुश भैया का दिमाग़ भी घंटी के साथ चला गया।
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चे छिपाते हैं और आँखों में दिख जाता है। "सब चबूतरी पर जमा हो रहे हैं। शबनम आपा दीये लेकर आई हैं। कह रही हैं कि आज बिजली नहीं जलनी चाहिए, आज दीया जलना चाहिए।"
"तो जलेंगे," मैंने कहा। "तू जा, कह दे कि मैं आ रहा हूँ। और सुन, छत पर मत चढ़ना। चाबी मोज़े में ही रहेगी।"
"मोज़ा गंध कर रहा है," टिंकू ने कहा।
"तो चाबी भी गंध करेगी। चलेगा।"
वो हँसा नहीं। आज वो हँसा नहीं। वो बस मुड़ा और चला गया, और मुझे लगा कि जिस दिन टिंकू हँसना बंद कर दे, उस दिन गली में कुछ बहुत बड़ा टूटा है।
मैंने हाथ धोए। पंचर वाले टब में पानी था, ऊपर तेल की पतली परत तैर रही थी। मैंने हाथ डाले, और पानी में अपना चेहरा देखा — टेढ़ा, थका, बाल बेतराब। मुझे अपनी शक्ल से गुस्सा आया। इस शक्ल ने कभी किसी को नहीं डराया, बस माँ को रुलाया है।
मैंने टब से हाथ निकाले, गमछे से पोंछे, और उस्ताद अली बक्श की दुकान की तरफ़ देखा। उनकी सिलाई मशीन से आज कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। दुकान का शटर आधा गिरा था। उस्ताद अंदर बैठे थे, चश्मा उतारकर हाथ में पकड़े हुए, और सामने मेज़ पर रखा था — एक जोड़ा कुर्ता, सिला हुआ, मोड़ा हुआ, पचास साल से किसी का इंतज़ार करता हुआ।
मैं वहाँ गया, दरवाज़े पर खड़ा हो गया।
"उस्ताद," मैंने कहा। "घंटी चुप है।"
वो नहीं बोले।
"उस्ताद, सुबह से चुप है। छूने पर भी, हिलाने पर भी, कान लगाने पर भी। मैंने कहा था कि जिस दिन गली शक करेगी, वो चुप हो जाएगी। तो क्या ये वो दिन है?"
उन्होंने चश्मा पहना, धीरे से, और मेरी तरफ़ देखा।
"घंटी शक से नहीं चुप होती, अंकुश," उन्होंने कहा। "घंटी उस दिन चुप होती है जिस दिन उसे लगे कि जिस काम के लिए वो आई थी, वो काम अब उसके बिना भी हो सकता है।"
"मतलब?"
"मतलब ये कि तू अब भी ये सोच रहा है कि सब कुछ उस घंटी से चल रहा है।" उन्होंने मेज़ पर रखे कुर्ते को हाथ लगाया। "और शायद यही वक़्त है जब तुझे समझ आए कि सब कुछ तेरे हाथ से चल रहा था, घंटी सिर्फ़ गिनती कर रही थी।"
"तो आज सात बजे मैं क्या करूँ?"
"जो तेरे हाथ से हो सके।" उन्होंने कुर्ता उठाया, मोड़ा, फिर रख दिया। "और जो तेरे हाथ से न हो, उसे दूसरे के हाथ में देने की हिम्मत रख।"
मैं बाहर निकला।
गली में दीयों की गंध आ रही थी — मिट्टी के दीयों में डाला हुआ सरसों का तेल, और बाती की वो पहली जलन जिसमें हल्की सी धुएँ की महक होती है। बच्चे दौड़ रहे थे। सानिया चबूतरी के किनारे पर मिट्टी के दीये जमा रही थी, और रफ़ीक़ उन पर माचिस चला रहा था, और चिंटू हर दीये को छूकर देख रहा था कि गरम है या नहीं।
चबूतरी पर आज कोई कुर्सी नहीं थी।
मैंने बच्चों से कहा था, कोई कुर्सी नहीं, कोई मंच नहीं। और गली ने मान लिया था, जो अपने आप में एक चमत्कार था, क्योंकि इस गली में कुर्सी के बिना कोई बैठक नहीं हुई, कोई पंचायत नहीं हुई, कोई शादी नहीं हुई।
लोग आ रहे थे — पहले डरते हुए, दरवाज़ों से झाँककर, फिर धीरे-धीरे आगे। शबनम आपा गुमटी बंद करके आई थीं, हाथ में लोहे की चिमटी और एक पीतल की थाली में दस दीये। उन्होंने दीये मेरे हाथ में नहीं दिए, खुद चबूतरी के किनारे रखे।
"आज तेरी सभा है," उन्होंने कहा, "पर दीया मेरे हाथ का जलेगा। हो सकता है तेरे हाथ अभी ठंडे हैं।"
मैं हँसा। "आपा, आपके हाथ कभी नरम नहीं रहे।"
"नरम हाथों से समोसा नहीं तलता," उन्होंने कहा, और मेरी तरफ़ देखे बिना पहला दीया जला दिया।
फिर आए बंसी बाबा, रहमत बाबा, हाफ़िज़ निसार अहमद, पंडित ब्रजकिशोर, इब्राहीम चाचा, बृजमोहन बाबा, बाबा कलीम, पंडित रामदीन, नबी चाचा, श्यामलाल काका, मक़बूल चाचा, रामस्वरूप काका, बाबा क़ादिर, लाला बद्रीप्रसाद, बाबा इक़बाल, लाला बद्रीनाथ। चबूतरी भर गई। जो बैठने की जगह नहीं मिली वो किनारे खड़े हो गए, और पीछे औरतें खड़ी हो गईं, और सबसे पीछे बच्चे दीवार पर बैठ गए, पैर लटकाकर।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी उठाकर लाए और उसे चबूतरी से थोड़ा दूर, पीपल के नीचे रख दिया। उस कुर्सी के एक पैर के नीचे पुरानी ईंट का टुकड़ा था, और वो ईंट का टुकड़ा मेरे दिल को अच्छा लगा — जैसे कोई चीज़ ठीक तो नहीं हुई, पर हिलना बंद हो गई हो।
रामलाल और अजय कोने में खड़े थे। अजय की जेब से घड़ी की टिक-टिक आ रही थी, और वो आवाज़ उस शाम में सबसे अजीब चीज़ थी — एक ऐसी आवाज़ जो कह रही थी कि कुछ चल रहा है, जबकि बाकी सब रुका हुआ था।
उस्ताद अली बक्श आए, और उनके साथ वो लाठी वाला अजनबी आदमी भी आया, जो स्टोर में मेरे पास खड़ा था। उसने किसी से हाथ नहीं मिलाया। वो सीधे पीपल के तने के पास जाकर खड़ा हो गया, दोनों हाथ लाठी पर, और ऐसे देखने लगा जैसे कोई पुराना हिसाब देख रहा हो।
मैंने अपनी जेब में घंटी को फिर छुआ। ठंडी।
और मैं चबूतरी के बीच में खड़ा हो गया।
"आप सब आए हैं," मैंने कहा। "मैंने कहा था कि आज कोई काग़ज़ नहीं, कोई अंगूठा नहीं, कोई वकील नहीं। आज सिर्फ़ बात होगी। और मैं अपनी बात सबसे आख़िर में करूँगा। पहले जिसको बोलना है, वो बोले।"
कुछ देर कोई नहीं बोला।
दीये जल रहे थे, और उनकी लौ में हवा का एक हल्का सा कंपन था, जैसे गली भी साँस रोककर बैठी हो।
फिर सुनीता दीदी उठीं।
वो पीछे खड़ी थीं, औरतों के बीच, और मैंने उन्हें पहचाना नहीं था, क्योंकि उन्होंने साड़ी का पल्लू सिर पर खींच रखा था, और चेहरा छिपा हुआ था। वो बीच में आईं। उनके हाथ में एक कटोरी थी, जो उन्होंने ज़मीन पर रख दी, जैसे कोई अपना सब कुछ रख रहा हो।
और फिर उन्होंने बोलना शुरू किया।
"मेरा नाम सुनीता है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो बोलीं। "मैं इस स्कूल के पीछे वाले क्वार्टर में रहती हूँ और वहीं, स्कूल की रसोई में बर्तन धोती हूँ। मेरा बेटा राहुल है, चौदह साल का। तीन महीने से उसका दाख़िला नहीं हुआ। मैं उसे रोज़ बैग देती हूँ और वो रोज़ स्कूल की गली से मुड़ जाता है, और मैं रोज़ उसे देखती हूँ और कुछ नहीं कहती।"
चबूतरी पर सन्नाटा छा गया।
"अठारह तारीख़ को बबलू साहब का आदमी मेरे क्वार्टर पर आया," उन्होंने कहा। "उसने कहा — सुनीता दीदी, इतना परेशान क्यों हो रही हो? बच्चे का दाख़िला हो जाएगा, और तुम्हें किरायानामा भी मिल जाएगा, और ये भी मिल जाएगा।" उन्होंने अपनी हथेली खोली, जैसे आज भी उसमें कुछ रखा हो। "दो हज़ार रुपये। मैंने कहा, मुझसे क्या काम है? उसने कहा — बस एक बात कहनी है। रमा मैडम के पास जाकर कहना कि तुमने मीरा को स्कूल के पास पैसों की बात करते देखा देखा है।"
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