The Mysterious Bell2 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 2

7 min read November 5, 2026

मैं ऊपर से उतरा। माँ साड़ी का पल्लू कमर में खोंसकर खड़ी थीं, माथे पर चंदन का टीका, और सामने बीस टिफ़िन की कतार। घर से टिफ़िन सेवा चलती है। यानी जो आज खाना खा रहा है, उसका हिसाब माँ की उस कॉपी में है। कॉपी पुरानी है, किनारों से उखड़ी हुई, और हर पन्ने पर लाल पेन के निशान।

मैंने पीछे से झाँका और कहा, माँ, आज क्या बना है?

बिना रुके, बिना पलटे, उन्होंने कहा, दाल, चावल, और तेरे लिए सवाल नहीं।

मैं हँस पड़ा। माँ की यही बात है। मुझे बहुत पसंद है। उन्होंने कड़ाही में हाथ का झटका दिया और फिर वो लाइन बोली जो वो हर हफ़्ते बोलती हैं। सुन, मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता। और बात में भी नहीं।

मैंने कहा, माँ, हम तो तुम्हारे ही खून के हैं। हमने कहाँ से पानी मिलाया।

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। एक सेकंड भर। और उस एक सेकंड में मुझे लगा कि उन्होंने मेरी आँखों में कुछ देख लिया। फिर वो फिर तवे पर झुक गईं।

तभी कोने से आवाज़ आई। धातु की छोटी सी आवाज़, जैसे कोई पेंच रगड़ रहा हो।

पापा बैठे थे। शंकर यादव, पचपन साल, कमर झुकी हुई, कमज़ोर आँखें, और चश्मा जिसका एक कान टेप से बँधा है। हाथ में कोई पुराना औज़ार। वो चुपचाप उस चश्मे का कान ठीक कर रहे थे। पूरे सुबह में एक शब्द नहीं बोले। न मैंने सुना, न काजल ने।

मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि पापा ने कितने साल से चुप हैं। वो बोलते हैं, पर इतना कम कि हमें उनकी आवाज़ की आदत नहीं है। जब कभी वो एक पूरा वाक्य बोल देते हैं, घर में सब रुककर उनकी तरफ़ देखते हैं, जैसे किसी ने अचानक रेडियो चालू कर दिया हो।

पर उस सुबह मैंने उनके हाथ ज़रूर देखे। जब वो चश्मे का कान ठीक कर रहे थे, उनके हाथ काँप रहे थे। हल्का-हल्का। ऐसे जैसे कोई बहुत कोशिश करके ठीक कर रहा हो।

मैंने पूछना चाहा। पर पूछा नहीं। और यही मेरी सबसे बड़ी गलती रही।

तभी सीढ़ियों से काजल उतरी। अठारह साल की, पतली, बाल बेतरह बँधे हुए, एक हाथ में नर्सिंग की मोटी किताब और दूसरे हाथ में चप्पल। वो दौड़ते हुए आई और रास्ते में चप्पल पहनते हुए बोली, भैया, माँ की रिपोर्ट!

मैंने कॉपी में देखने की एक्टिंग की। कौन सी रिपोर्ट?

उसने मेरे सिर पर किताब मारी। वही रिपोर्ट जो डॉक्टर इसरानी ने लिखी है। टेस्ट! सब टेस्ट! मैंने कहा था ना, मैं उनसे बात करूँगी।

माँ ने तुरंत कहा, काजल, चुप।

काजल रुक गई। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर माँ की तरफ़। और मैंने उसके चेहरे पर वो भाव देखा जो हमारे घर में आम है — कुछ कहना है, पर कहना नहीं है।

मैंने माहौल हल्का करने के लिए कहा, अरे, टेस्ट होते रहते हैं। दो-चार, दस-बारह। माँ की क्या बात है, ये तो लोहे की कड़ाही हैं।

माँ ने कहा, हाँ, और तू चूल्हे की फूँक। अब जा, दुकान खोल।

मैं चला गया। पर तीन कदम चलकर मैंने पीछे देखा। माँ ने काजल के हाथ से वो काग़ज़ लेकर अपने पल्लू के नीचे दबा दिया था। ऐसे जैसे कोई चीज़ छुपा रही हो।

दिन भर मुझे वही काग़ज़ दिमाग में घूमता रहा।

दुकान पर आज काम भी खूब था। दोपहर में उस्ताद अली बक्श आए। अपनी दुकान से उठकर, धीरे-धीरे कदम रखते हुए, जैसे हर कदम नापकर रख रहे हों। वो मेरी दुकान के सामने रुके और चुपचाप मेरे हाथ देखने लगे। ऐसे दस सेकंड। मैंने पूछा, क्या हुआ उस्ताद? कुछ सिलना है?

वो बोले, तेरी उम्र में मैं भी ऐसे ही बैठता था। हाथ में तेल, आँख में ज़िद। फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली और कहा, पर मैंने एक चीज़ छोड़ दी थी। और उसे छोड़ने के बाद मेरा आधा घर भी छूट गया।

मैं समझा नहीं। मैंने कहा, क्या चीज़ छोड़ दी, उस्ताद?

वो मुस्कुराए, मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोले, बाद में। पहले तू वो काग़ज़ वाली बात सँभाल। तेरी माँ के पास ख़त्म हो रहा है।

मैं वहीं ठिठक गया। उस्ताद अली बक्श चले गए, घूमकर अपनी मशीन की टिक-टिक शुरू करने। और मैं वहीं खड़ा रह गया। उन्हें कैसे पता? किसी ने कुछ कहा? माँ ने कहा?

शाम को गली में शोर हुआ। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू, चारों जासूस, एक साथ दौड़ते हुए आए। हाथ में पतंग की डोर, चेहरे पर उत्साह। गुड्डू चिल्लाया, भैया, स्कूल की छत से देखा, बाज़ार के पीछे वाले खाली प्लॉट पर चार बड़े ट्रक आए हैं! मिट्टी डाल रहे हैं!

मैंने कहा, तो? मिट्टी तो डलती रहती है।

सानिया ने आँखें सिकोड़कर कहा, पर भैया, उन ट्रकों पर लिखा था — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।

मेरी उंगलियाँ रुक गईं। उस्ताद अली बक्श की मशीन एक पल के लिए रुकी। शबनम आपा की चिमटी हवा में ठहर गई। और फिर आपा ने बिना मेरी तरफ़ देखे कहा, तेरे पापा से कहना, आज समोसा बाकी है। घर ले जाए।

पर उनका लहजा बदल गया था। वो जानती थीं। गली जानती थी। बस गली बोल नहीं रही थी।

रात हुई।

मैंने दुकान बंद की, दो पंचर ठीक किए, एक चेन जोड़ी, और दुकान के पीछे वाले छोटे कमरे में आया। वहाँ एक लकड़ी का बक्सा है जिसमें औज़ार हैं, एक नंगना बल्ब है, और कोने में पुरानी साइकिल खड़ी है। मेरे पापा की साइकिल। जो अब कोई नहीं चलाता, और जिसे मैंने भी कभी ठीक से नहीं चलाया। उसके हैंडल पर एक घंटी थी। छोटी, पीतल की, थोड़ी काली पड़ी हुई।

उस रात मैंने उस घंटी को देखा और मुझे मीरा की बात याद आई। दुकान बंद थी और घंटी बजी थी। मैंने हाथ बढ़ाया, फिर हटा लिया। मैंने खुद से कहा, अंकुश, तू मिस्त्री है, भूत नहीं। सो जा।

सोने से पहले मैं ऊपर गया। माँ सो चुकी थीं। कमरे में हल्की रोशनी थी, और मेज़ पर वो कॉपी खुली पड़ी थी। हिसाब की कॉपी। उसके नीचे से एक काग़ज़ का कोना झाँक रहा था।

मैंने उसे धीरे से खींचा।

दो पन्नों की पर्ची थी। ऊपर डॉक्टर इसरानी की लिखाई — साफ़, सीधी, बिना घुमाए। नीचे टेस्ट के नाम, एक के बाद एक, कतार में। और उनके आगे खाली जगह जहाँ रिपोर्ट आनी थी।

और सबसे नीचे, दाहिनी तरफ़, एक आँकड़ा। रुपयों का आँकड़ा।

मैं वहीं खड़ा रह गया।

तुम सोच रहे होगे कि इतनी सी बात से क्या होगा। रुपये हैं, कमा लेंगे। दुकान है, काम है, हाथ हैं। तो सुनो आगे।

मैंने उस आँकड़े को तीन बार देखा। फिर चौथी बार। फिर मैंने जेब से अपना पर्स निकाला, खोला, और उसमें जो था वो गिना। और मुझे वो सच देखना पड़ा जो मैंने किसी को नहीं बताया। वो पैसा मेरे पास नहीं था। दुकान के हिसाब से भी नहीं था। घर के हिसाब से तो बिल्कुल भी नहीं।

मैंने पर्स बंद किया। कॉपी वापस उसी जगह रखी। मैंने उस काग़ज़ को वैसे ही सरका दिया जैसे वो पड़ा था, ताकि माँ को पता न चले कि मैंने देखा है। और मैं दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा।

और तभी मेरी नज़र उस पर्ची के पीछे पड़ी।

पीछे भी कुछ लिखा था। माँ की लिखाई। माँ कभी पीछे नहीं लिखतीं। वो सामने लिखती हैं, सीधा, साफ़। पर उस रात उन्होंने पीछे लिखा था, छोटे अक्षरों में, लाल पेन से, जैसे कोई चुपके से कोई बात रख रहा हो।

मैंने पर्ची पलटी और पढ़ा।

अंकुश को मत बताना, वो सब अकेले उठा लेता है।

मैं वहीं खड़ा रहा। बल्ब जल रहा था। माँ की साँसें धीमी और बराबर चल रही थीं। नीचे गली से किसी की साइकिल की घंटी बजी, दूर, बहुत दूर, किसी और गली में।

मैंने पर्ची जेब में रखी। मैंने बल्ब बंद किया। और मैं चुपचाप सीढ़ियों से नीचे उतर गया।

उस रात मैंने दुकान के पीछे वाले कमरे में पुरानी साइकिल के सामने खड़े होकर खुद से एक बात कही, जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।

मैंने कहा, अंकुश, तू अकेले उठा लेता है। अब उठा।

और तभी, बिना किसी हवा के, बिना किसी के हाथ लगे, उस पुरानी साइकिल की पीतल की घंटी बजी।

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