The Mysterious Bell – Chapter 1
अरे, तुम आ गए? बैठो ना, चबूतरे पर बैठो। पेड़ की छाँव है, और आज सुबह-सुबह हवा भी चल रही है। मैं तुम्हें अपनी गली दिखाता हूँ। पर पहले एक बात साफ़ कर लूँ, ताकि बाद में तुम मुझ पर हँसो मत।
ये गली चौड़ी नहीं है। बिल्कुल नहीं। इतनी ही है कि दो साइकिलें आमने-सामने आ जाएँ तो दोनों को थोड़ा तिरछा होकर निकलना पड़ता है। एक तरफ़ दीवार, दीवार पर कोई पुराने ज़माने का नीला पेंट, जो अब जगह-जगह से उखड़कर ऐसे लगता है जैसे दीवार ने भी जीन्स पहन ली हो। दूसरी तरफ़ नाली, और नाली के ऊपर पत्थर का एक पुराना पुल। छोटा सा। दो कदम में पार। उस पुल के पत्थर अब भी मज़बूत हैं, बस बीच में एक जगह से घिस गए हैं, क्योंकि पचास साल से लोग वहीं से पैर रखते आए हैं।
गली के ठीक बीच में पीपल का पेड़ है। मोटा तना, ऊपर इतनी छाँव कि दोपहर में भी नीचे अंधेरा रहता है। पेड़ के नीचे पत्थर की चबूतरी है। सुबह वहाँ बुज़ुर्ग बैठते हैं, शाम को बच्चे। और मेरी दुकान ठीक उसके बगल में है। लकड़ी का बोर्ड, टेढ़ा टँगा हुआ, ऊपर सफ़ेद पेंट से लिखा है — साइकिल मरम्मत। नीचे छोटे अक्षरों में मेरा नाम, अंकुश यादव।
बोर्ड टेढ़ा है। साल में कम से कम चालीस बार मैं इसे सीधा करता हूँ, और हर बार वो फिर टेढ़ा हो जाता है। आज सुबह भी मैंने किया। कुर्सी पर चढ़ा, दोनों कोनों के कील निकाले, हथौड़े से ठोका, और एक कील सीधी जाकर मेरे अंगूठे पर लगी।
तुम सोच रहे होगे कि इतना सब बताने की क्या ज़रूरत है। तो सुनो, ज़रूरत है। क्योंकि जो आगे हुआ, वो इसी गली में हुआ। इसी बोर्ड के नीचे, इसी चबूतरे के पास, इन्हीं लोगों के बीच। और जब कोई कहानी गली से शुरू होती है, तो गली को ठीक से जानना ज़रूरी होता है। नहीं तो बाद में तुम्हें समझ ही नहीं आएगा कि मैं किस चीज़ के लिए लड़ रहा था।
मेरे बाईं तरफ़ उस्ताद अली बक्श की दर्ज़ी की दुकान है। सत्तर के ऊपर के आदमी हैं। सफ़ेद दाढ़ी, मोटा चश्मा, और कान पर हमेशा एक पेंसिल टँगी रहती है। उनकी सिलाई मशीन की आवाज़ सुबह से शाम तक टिक-टिक करती रहती है। कभी-कभी मुझे लगता है कि अगर उनकी मशीन एक दिन बंद रही, तो पूरी गली सो जाएगी। वो बोलते बहुत कम हैं। पर जो बोलते हैं, वो सीधे दिल में उतरता है।
दुकान के बगल में शबनम आपा की चाय और समोसे की गुमटी है। लोहे की गुमटी, ऊपर टीन का छज्जा, और अंदर से धुआँ, चाय की खुशबू और तेज़ ज़ुबान। आपा हाथ में लोहे की चिमटी लिए खड़ी रहती हैं और हर आने-जाने वाले को कुछ न कुछ सुना देती हैं। आज सुबह भी सुना रही थीं।
अंकुश, वो चबूतरे का पत्थर ढीला है। किसी को गिरा देगा। तू मिस्त्री है ना, तो ज़रा देख ले। मैंने कहा, आपा, मैं साइकिल ठीक करता हूँ, चबूतरा नहीं। तो वो हँसकर बोलीं, जब सब कुछ ठीक करता है, तो ये भी कर ले।
अब इस चायवाली की बात में एक दम है, ये तुम्हें बाद में समझ आएगा।
गली के मुहाने पर नूर अस्पताल है। पुराना दवाखाना, दो मंज़िला, पीली दीवारें, कुछ खिड़कियाँ टूटी हुईं। डॉक्टर निहाल इसरानी वहाँ बैठते हैं। साठ के ऊपर हैं, पर अब भी रोज़ मरीज़ देखते हैं और अब भी हर मरीज़ को नाम से बुलाते हैं। वही अस्पताल मेरे लिए सबसे ज़रूरी जगह बन जाएगा। पर उसके बारे में अभी नहीं।
चलो, चाय छोड़ो, मैं तुम्हें काम दिखाता हूँ।
सुबह के करीब साढ़े नौ बजे एक छोटा बच्चा आया। सानिया का भाई, चिंटू। दस साल का, नाक बहती हुई, घुटने पर पुरानी खरोंच, और साइकिल का टायर बिल्कुल बैठा हुआ। उसने साइकिल मेरी तरफ़ धकेल दी और बोला, भैया, पंचर।
मैंने कहा, ये साइकिल नहीं है, ये तो तेरे घर का बोझ है। पिछले महीने तीन बार पंचर करवाया था।
चिंटू ने आँखें बड़ी करके कहा, भैया, गली में नीम के पेड़ के नीचे काँटे पड़े हैं। कोई फेंक गया है।
मैं हँस पड़ा। ये बच्चे मुझे हर बार नई वजह बताते हैं। कभी काँटे, कभी रास्ते में पड़ी लोहे की पत्ती, कभी किसी का बदला। मैंने औज़ार उठाया, टायर खोला, अंदर की ट्यूब निकाली। हाथ पर ग्रीस लग गया, और मैंने बिना सोचे उसे अपनी जीन्स पर पोंछ लिया। जीन्स पहले से ही घुटने पर फटी हुई थी। अब वो फटन भी काली हो गई।
चिंटू ने पूछा, भैया, आप हमेशा गंदे कपड़े क्यों पहनते हो?
मैंने कहा, क्योंकि साफ़ कपड़े पहनकर साइकिल ठीक करने वाला आदमी गली में कोई नहीं मानेगा। लोग कहेंगे, ये तो बाहर से आया है।
वो ज़ोर से हँसा। फिर वहीं बैठ गया, पत्थर पर, और उसने वो लाइन कही जो आजकल बच्चे बहुत बोलते हैं। भैया, गली याद रखेगी।
मैं रुक गया। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसने तो यूँ ही कह दिया था, मज़ाक में। पर मुझे उस वक़्त नहीं पता था कि कुछ दिन बाद मैं सच में ये सोचूँगा कि गली मुझे याद रखेगी या नहीं।
मैंने ट्यूब पानी में डाली। बुलबुले आने लगे। चिंटू उँगली डालकर बुलबुले फोड़ने लगा। मैंने उसका हाथ हटाया और कहा, अरे भाई, गाड़ी नहीं है, इंसान है। ज़रा सब्र से पेश आइए।
वो फिर हँसा। और मैं सोचने लगा कि मैं ये लाइन रोज़ कितनी बार बोलता हूँ। गाड़ी नहीं है, इंसान है, सब्र से पेश आइए। शायद मैं खुद ही ये लाइन ज़िंदगी को बोलता रहता हूँ।
तभी गली के मुहाने से मीरा निकली।
तुमने उसे देखा नहीं है। जब देखोगे, तो पहले लगेगा कि कोई स्कूल की लड़की भाग रही है। छोटा कद, कंधे तक कटे बाल, कंधे पर फटा हुआ बैग, हाथ में कैमरा। वो अपना एक ऑनलाइन चैनल चलाती है। नाम रखा है — बस्ती की आवाज़। मुझे तो नाम में ही दम नहीं लगता, पर उससे कहना मत, वरना वो पूरा आधा घंटा खड़ी होकर समझाएगी कि नाम में क्या फ़लसफ़ा है।
उसने दूर से ही आवाज़ दी, अंकुश, सुना है तुम्हारी दुकान पर रात में कुछ अजीब होता है?
मैंने कहा, हाँ, रात में मैं सोता हूँ। बहुत अजीब बात है।
वो झुंझला गई। मज़ाक नहीं कर रही। आज सुबह गली के बच्चे बता रहे थे कि पिछली रात तुम्हारी दुकान की घंटी बजी थी, जबकि दुकान बंद थी।
मेरे हाथ रुक गए। बिल्कुल रुक गए। मैंने चिंटू की तरफ़ देखा, उसने कंधे झेला। मैंने मीरा की तरफ़ देखा और कहा, बच्चों को चाय की चिंता नहीं है, अब दुकान की घंटी सुनने लगे हैं। बड़ी तरक्की है।
वो मुझे घूरती रही। मीरा की आदत है, किसी की बात सच मानने से पहले वो उसे दस बार तोलती है। फिर बोली, ठीक है। पर जिस दिन कुछ होगा, मुझे पहले बताना। कैमरा उठा लूँगी।
मैंने कहा, कैमरा उठाने से पहले चश्मा उठा लेना। दूर से देखने में तुम्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता।
वो हँसकर चली गई। पर उसके जाने के बाद मुझे दो मिनट तक चाय की खुशबू नहीं आई। सिर्फ़ उसकी वो बात कान में बजती रही। घंटी। मेरी साइकिल की घंटी। जो मैं कई दिनों से दुकान के पीछे वाले कमरे में रखी हुई हालत में छोड़ आया था।
उस वक़्त मुझे क्या पता था कि वो घंटी कभी मेरी नहीं थी, और कभी सिर्फ़ मेरी ही रह जाएगी।
चलो, अभी घर चलते हैं।
हमारा घर उसी गली के आख़िर में है। दो कमरे, छोटा आँगन, और छत पर लोहे का सीढ़ी-दरवाज़ा जो बारिश में चरमराता है। चार लोग हैं — माँ, पापा, काजल और मैं।
माँ का दिन सुबह पाँच बजे शुरू होता है। पाँच बजे मैंने कभी चूल्हा बजते नहीं सुना, मैंने सिर्फ़ चूल्हे की फूँक की आवाज़ सुनी है। फूँ टपू, फूँ टपू। और उसके बाद जब पहली रोटी तवे पर पड़ती है, उसकी आवाज़ पूरे घर को उठा देती है।
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