The Mysterious Bell – Chapter 1486
“हाँ,” रणवीर ने कहा, और उसकी आवाज़ अब बैठ गई थी। “यह हुआ था। और मैं अभी भी माफ़ी नहीं माँग रहा — क्योंकि माँ मर चुकी है, और मरे हुए से माफ़ी नहीं माँगी जाती। मैं सिर्फ़ यह कह रहा हूँ कि जो किया, वो मैंने किया। किसी और ने नहीं।”
चुभन उस पल और पतली हो गई।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। वो गरम थी — बर्फ़ जैसी नहीं, चूल्हे से उतरी कड़ाही जैसी। मैंने उसे हथेली पर रखा और उसने एक बार हल्की सी आवाज़ दी, बिना बजे।
जैसे कह रही हो — अब देख।
हवा ने आख़िरी बार आवाज़ उठाई। पर इस बार वो पहले जैसी नहीं थी। इसमें दम नहीं था। जैसे कोई बूढ़ा, जो सारी कहानियाँ सुना चुका हो, आख़िरी कहानी सुनाते-सुनाते थक गया हो।
“शबनम आपा ने रज़िया को पंद्रह साल बेकार में नीचा दिखाया…”
शबनम आपा ने कहा, “हाँ, दिखाया। और आज से नहीं।”
“गोविंद ने शंकर का अंगूठा लिया…”
गोविंद भाई ने कहा, “हाँ, लिया। और अब हिसाब दूँगा।”
“हरिप्रसाद चुप रहा…”
हरिप्रसाद ने कहा, “हाँ, रहा। और अब नहीं रहेगा।”
“उस्ताद मुँह नहीं खोला…”
उस्ताद ने कहा, “नहीं खोला। और अब खोलेगा।”
“मीरा…”
“हाँ,” मीरा ने कहा।
“रमा मैडम…”
रमा मैडम, जो अब तक मेज़ के पास बैठी थीं, वो उठीं — धीरे, लाठी के सहारे — और बोलीं, “पाँच साल मैंने माफ़ी से मुँह छिपाया। मुझे माफ़ी चाहिए या नहीं — यह अब मेरे हाथ में नहीं। पर मैं कहती हूँ — यह हुआ था। और मैंने माफ़ किया।”
फिर वो मीरा की तरफ़ मुड़ीं।
“मीरा,” उन्होंने कहा, “मैंने तुझे पाँच साल पहले माफ़ कर दिया था। मुझे पता नहीं था कि तू अब तक खुद को माफ़ नहीं कर पाई।”
मीरा की आँखें भर आईं।
“मैडम…”
“चुप,” रमा मैडम ने कहा। “चुप रहना तो पाँच साल तक सीख लिया। अब बोलना सीख।”
मैदान में पहली बार कुछ ऐसा हुआ जो घंटी से नहीं, किसी इंसान से आया। शबनम आपा ने रज़िया का हाथ और ज़ोर से पकड़ा। गोविंद भाई ने अपना चश्मा ठीक किया। काजल ने माँ की तरफ़ देखा, और माँ ने धीरे से उसका हाथ थपथपाया।
और तभी मैंने वो देखा।
थी — नहीं थी। जा रही थी।
हवा में जो चुभन अब तक रीढ़ में सुई की तरह टिकी थी, वो अब धीरे-धीरे खिंच रही थी — जैसे कोई तार हो, जिसे कोई पीछे खींच रहा हो। मैंने अपना कंधा झटका। सिर फिर भी भारी था। पर सुई नहीं थी।
कपूर की महक तेज़ हो गई।
लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।
“कपूर?” किसी ने कहा।
“कपूर जैसी महक,” किसी और ने कहा।
“नहीं, यह… यह तो वैसी ही महक है जैसी हमारे बाबा के संदूक में थी।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।
“कपूर,” उन्होंने कहा। “पुराने कपड़ों में रखते थे।”
मैंने एक लंबी साँस ली।
और तभी पीछे से — बिजलीघर की तरफ़ से — एक लंबी चटक आई।
पहली चटक के बाद जो दूसरी आई थी, वो लकड़ी की चौखट जैसी थी।
यह तीसरी थी।
और इस बार आवाज़ के साथ एक झटका भी आया — ज़मीन के नीचे से, पैरों के तलवों तक।
भीड़ में कुछ लोग झुक गए। दीये हिले। दो बुझ गए।
और रणवीर — रणवीर ने अपने सीने पर हाथ रखा और झुक गया।
उसकी साँस फूली हुई थी। उसने एक घुटने पर हाथ टिकाया।
मैं दौड़कर उसके पास गया — नहीं, मुझे नहीं पता क्यों। मेरे पैरों ने खुद चले। पापा मेरे पीछे आए।
“रणवीर,” मैंने कहा। “साँस लो। धीरे।”
उसने अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था। नहीं, पसीना था। दोनों एक जैसे लगते हैं — पर आज वो पसीना था।
“मुझे कुछ नहीं हुआ,” उसने कहा। “बस… सीने में जैसे कुछ बैठ गया।”
“तो बैठा रहने दो,” पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ सख़्त थी।
रणवीर ने उनकी तरफ़ देखा।
कुछ नहीं बोला।
और मैंने अपनी जेब में घंटी को गरम होते महसूस किया — इतनी गरम कि मुझे हाथ जलने का डर हुआ। मैंने घंटी बाहर निकाली।
वो मेरी हथेली पर चमक रही थी — नीली नहीं, पीली, धीमी, जैसे दूध में हल्दी घोली हो।
और उसने एक बार बजा।
एक बार।
पर उसकी आवाज़ में जो भराव था, वो पहले कभी नहीं सुना था — जैसे पीतल ने पूरा एक साँस लेकर बजा हो, आधा नहीं।
“अब जो बचा है, वो तेरे हाथ में है,” घंटी ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहले जैसी रूखी-रूखी लय नहीं थी। थोड़ी नरम थी। थोड़ी — कैसे कहूँ — भरी हुई।
मैंने घंटी को हथेली में बंद कर लिया।
और फिर वो हुआ।
रणवीर की जेब से कुछ गिरा। धातु की आवाज़ नहीं आई। काग़ज़ की भी नहीं।
एक टूटा हुआ काला टुकड़ा ज़मीन पर पड़ा — छोटा, अधजला, जैसे कोई पुरानी किताब का कोना हो, या किसी ताले की जली हुई पीठ।
मैंने उसे उठाना चाहा।
मेरे हाथ ने छुआ।
और वो राख बन गया।
पूरा नहीं — बस उतना, जितना छूआ। फिर हवा ने उसे उड़ा दिया — धूल की तरह, आटे की तरह, किसी पुरानी स्मृति की तरह।
रणवीर ने अपनी जेब की तरफ़ देखा।
उसका चेहरा एक पल के लिए ऐसा हुआ, जैसे किसी ने उसके हाथ से चाबी निकाल ली हो।
“क्या था वो?” मैंने पूछा।
वो नहीं बोला।
उसने अपनी हथेली देखी। नीली लकीर… लकीर तो अब भी थी, पर बहुत फीकी। जैसे पेंसिल से खींची गई रेखा, जिसे कोई रबर से मिटा रहा हो।
और मैदान की हवा साफ़ हो गई।
सच में साफ़।
वो चुभन — पूरी तरह गई।
लोगों ने साँस ली। किसी ने ज़ोर से। किसी ने धीमे। एक बच्चा रो पड़ा, और उसकी माँ ने उसे सीने से लगाया।
बूढ़ा — वो लकड़ी के जूतों वाला बूढ़ा — अब भी वहीं खड़ा था।
उसने अपनी पीली कॉपी धीरे से बंद की।
फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
न मुस्कुराया, न सिर हिलाया। बस देखा।
और फिर वो मुड़कर चल दिया — बिना आवाज़, बिना जल्दी, जैसे कोई पुराना कर्ज़दार अपना हिसाब रखकर जा रहा हो।
मैंने उसे रोकना चाहा। पैर उठे। पर उस्ताद ने मेरा कंधा पकड़ लिया।
“मत जा,” उन्होंने कहा। “अभी नहीं।”
“कौन है वो, उस्ताद?”
“जो है, वो कल खुद बताएगा,” उन्होंने कहा। “आज रात तेरे पास और काम हैं।”
उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा — जहाँ मंसूर के ताले के दोनों हिस्से थे।
“और उससे पहले,” उन्होंने कहा, “उस खाली लाइन को भरना है।”
मैंने सिर हिलाया।
मैंने एक बार पूरे मैदान को देखा।
माँ काजल के सहारे खड़ी थी, और उनके हाथ में वो पुरानी पीली कॉपी थी — माँ की हिसाब की कॉपी — जिसे उन्होंने आज किसी से नहीं छीनवाया।
पापा मेरे बगल में खड़े थे, और उनका हाथ मेरे कंधे पर था।
शबनम आपा और रज़िया एक साथ खड़ी थीं — दोनों की कलाइयों पर हरी चूड़ी, और दोनों की आँखों में वही पानी, जो सुलह का होता है।
गोविंद भाई अपनी फाइल सीने से लगाए खड़े थे।
हरिप्रसाद अपनी आधी उँगली आसमान की तरफ़ उठाए हुए खड़ा था — जैसे किसी को सलाम कर रहा हो।
मीरा कैमरा उठा रही थी — पर इस बार उसने प्रसारण नहीं चालू किया। उसने बस उसे सीने से लगाया।
उस्ताद अपनी सिलाई मशीन के पास खड़े थे और उनकी उँगली सफ़ेद कपड़े पर थी, जिसे उन्होंने आज ही ढका था।
टिंकू मेरी कमीज़ पकड़े खड़ा था, और उसकी आँखों में वो सवाल था, जो तेरह साल की उम्र में सबसे ज़्यादा होता है — अब क्या?
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और मंसूर के ताले का दाहिना हिस्सा निकाला।
वो ठंडा था।
मैंने उसे वापस रखा।
फिर मैंने भीड़ की तरफ़ देखा और कहा —
“आज रात सब घर जाएँ। कल दो बजे से पहले हम उस लाइन पर नाम लिखेंगे। और उससे पहले…”
मैं रुका।
“उससे पहले, उस पुराने बिजलीघर में जाकर छह बक्सों से बात करनी है।”
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